After Corona (Hindi)

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Corona is about to end now. But world economy have to face it's after effects for a long time. In this crucial time, how a country will perform will determine its success or economy failure. So here I want to put my point of view on what we Indians can do to overcome from its impact fastly as well as to prepare any future calamity in advance.



कोरोना संकटकाल के दृष्टा

आज पूरा विश्व एक बहुत बड़े संकटकाल से गुजर रहा है। सभी देशों की अर्थव्यवस्थाएं बुरी तरह से प्रभावित हो चुकी हैं। प्रत्येक इंसान अंदर से भविष्य को लेकर डरा हुआ है। एक बहुत बड़ा बदलाव आ रहा है। आज इस संकट से न केवल वर्तमान सोच बल्कि आने वाली कई पीढ़ियों की सोच भी प्रभावित होगी।

ये बहुत ही शांति की बात है कि भारत के लोग स्वयंमेव सेवाभावी हैं, ईश्वर का भजन करते हैं और आज के इस संकटकाल में नरेंद्र मोदी जी जैसे उन्नत नेता के संरक्षण में हैं। मोदी जी ने सही समय पर सही निर्णय लेकर देश को आने वाले एक बहुत बड़े संकट से बाल बाल बचाया है और वैश्विक स्तर पर उदाहरण पेश किया है। लेकिन कोई भी नेता जन सहयोग के बिना अधूरा होता है। आज सभी उनके फैसले के साथ खड़े हैं और घरों में हैं। आम जन और अनेक धनिक धन से तो अनेक तन से सेवा कार्यों को पूरा कर, अपना कर्तव्य अपनी जान की परवाह किये बिना निभा कर, अपने देश के गरीब और पीड़ित वर्ग की सहायता कर रहे हैं और मन से तो सभी मोदी जी की इस लड़ाई में उनके और उनके फैसलों के साथ खड़े ही हैं। अब बात इस पर विचार करने की है कि आगे क्या होना चाहिए और हमें हमारे देश के लिए, इस संसार के लिए क्या करना चाहिए।

अपनी भाषा, अपना धर्म, अपना देश, अपने लोग

हमें बताते हुए हर्ष होता है कि जापान के लोग कर्मठ होते हैं और अपने देश को सबसे ऊपर रखते हैं, कि फ्रांस के लोग ईमानदार होते हैं... ये सब क्या है? ये किसी देश के नेता की नहीं, उस देश के लोगों की तारीफ है जो उन्होंने अच्छे व्यवहार से देश के लिए संग्रहित की है और जिसके द्वारा आज न केवल उनके देश को अपितु हर देशवासी को सम्मान मिलता है।

आज वैश्विक पटल पर मोदी जी के कारण देश की छवि बहुत ऊंची उठ गई है। अब ये हम लोगों की व्यक्तिगत और सामूहिक जिम्मेदारी है कि हम भी उसे सम्हाल कर और आगे ले जायें। मोदी जी के नेतृत्व में हमें एक बार और मौका मिला है जब हम अपनी भूलों को सुधार सकते हैं। आइये विचार करें कि क्या किया जा सकता है---

  • ईमानदारी और पूरी निष्ठा से अपना कार्य करें।
  • समय की कद्र करें, व्यवस्थित रहें।
  • सदा सकारात्मक और खुश रहें।
  • देशहित में कार्य करें और देशवासियों को अपने घर का सदस्य मानकर ही व्यवहार करें।
  • सादा जीवन पद्धति अपनाएं और दिखावे से बचें।
  • अनुचित का सदा विरोध करें, पर शांति और सभ्यता से।
  • किसी भी प्रकार की गंदगी कहीं भी न फैलाएं। देश को अपना घर मानें।
  • पौष्टिक भोजन लें और थोड़ा अधिक बना कर नित्य कुछ लोगों (जरूरतमंदों) को भी खिलायें।
  • घर के सदस्यों को समय दें, खुश रहें और खुश रखें।
  • अपनी मातृभाषा में बोलना और लिखना शर्म की नहीं गर्व की बात है, सो उसे ही बढ़ावा दें।
  • अपनी संस्कृति का गहन अध्ययन करें और आने वाली पीढ़ी को भी उससे अवगत करायें। याद रखें आपका व्यवहार और आपकी संस्कृति ही आपको सफलता दिला सकती है विश्व में।
  • देश और देशवासियों के बिना आप कुछ नहीं, वो ही हमारा मान, सम्मान, अभिमान, रक्षा कवच सब कुछ है, इसलिए अपना पूरा प्रयास उसके विकास में लगाने से ही हमारा विकास संभव है।

अब आगे क्या रणनीति हो

कोई भी युद्ध अपनी समस्त ऊर्जाओं को उसी समय लगा देने से नहीं जीत जाता। जहाँ युद्ध में अग्रिम पंक्ति में देश के सिपाही जान का जोखिम उठाकर लड़ रहे होते हैं, वहीं देश के अन्य वर्ग युद्ध समाप्ति के बाद देश को असमय आई बाधा से शीघ्र आगे बढ़ाने के उपायों के बारे में सोच रहे होते हैं। आइये हम भी आज उसी वर्ग में शामिल हों और विचार करें---

सिर्फ अर्थव्यवस्था ही नहीं, हमें भी पीछे जाना होगा

आज सम्पूर्ण विश्व के विचारक कह रहे हैं कि वैश्विक अर्थव्यवस्था 10 से 20 साल पीछे चली जाएगी। मुझे लगता है कि शायद वो इससे भी ज्यादा पीछे चली जाएगी। तो इससे निबटने के लिए हमें भी अपने पुराने जीवन जीने के दौर में लौटना होगा। शायद 40 साल पीछे ताकि न केवल हम अर्थव्यवस्था को पटरी पर ला पायें, अपितु आने वाली पीढ़ी को उन गलतियों से बचा लें जो हमने की हैं। ये प्रकृति ने हमें एक बार फिर पुराने जीवन में जाने का और उसे नई तरह आगे लाने का जो समय दिया है उसका हमें सम्मान करना चाहिए। मैं ये कतई नहीं कह रही कि हम खर्चे बिल्कुल बंद कर दें या अपनी खुशियों के साथ समझौता ही करते रहें, बल्कि हमें उन खर्चों को सही दिशा देने की आवश्यकता है। आइये देखें कि आज वो कौनसे क्षेत्र हैं, जहाँ हम जीवन की अधिकांश पूंजी और ऊर्जा लगाते हैं ---

  1. बच्चे
  2. परिवार का स्वास्थ्य
  3. दैनिक खानपान
  4. साज श्रृंगार
  5. गृह सज्जा
  6. सुविधायुक्त जीवन
  7. पर्यटन
  8. मनोरंजन
  9. उत्सव
  10. सामाजिक सरोकार
  11. भविष्य के लिए बचत
  12. रुचि एवं आदतें
  13. धर्म कर्म

मैं इनमें से किसी भी क्षेत्र में पूँजी लगाने का विरोध नहीं कर रही, पर कैसे, कितनी और कहाँ लगाएँ, ये अवश्य विचार का विषय है। सो अपने मत आपके विचार के लिए प्रस्तुत कर रही हूँ।

बच्चे

आज आपने सभी को यह कहते हुए सुना होगा कि जो उन्होंने शिक्षा अपने जमाने में पाई थी, वो आज बच्चों को मिल ही नहीं पा रही। हम कहते हैं कि हम/हमारे माता-पिता सरकारी स्कूल में पढ़ते थे... नंबर भी ठीकठाक आते थे... कभी कोचिंग भी नहीं लगाई... फिर भी सफल हो गए। आजकल के बच्चे पूरा पूरा दिन कभी प्राइवेट स्कूल तो कभी कोचिंग में पढ़ते हैं, नंबर भी अच्छे लाते हैं, पर जीवन में सफल नहीं हैं। हम कहते हैं कि उन्होंने वो खेल नहीं खेले, वो मस्तियाँ नहीं कीं जो हमने कीं थीं, जिंदगी को जिया ही नहीं। हम कहते हैं कि हमें हमारे माँ-बाप ने इतने ऐशोआराम और सुख-सुविधाओं से नहीं पाला जैसे हम तुम्हें पाल रहे हैं। हम कहते हैं कि हमारे माँ-बाप हमारी हर ख्वाहिश ऐसे पूरी नहीं करते थे जैसे हम तुम्हारी करते हैं। हम कहते हैं कि शिक्षा का स्तर गिर गया है, इन बच्चों को बस रटाया गया है, समझाया नहीं गया। हम कहते हैं कि कॉम्पिटिशन ही इतना है कि बच्चे समझें कब, कम मार्क्स में अच्छे इंस्टीट्यूट में एडमिशन भी नहीं होगा। और हम ये भी कहते हैं कि पढ़-लिख तो लिए, पर जिंदगी की समझ है ही नहीं इन्हें। और इन्हीं सब कहने में हम सवालों में ही जवाब दे देते हैं।

सरकारी स्कूल बुरे नहीं, गलत हमारी सोच है

क्या ये सच नहीं कि आज भी मेरिट होल्डर अच्छे डिग्री वाले टीचर सरकारी स्कूल में ही हैं क्योंकि सरकार अच्छा वेतन और अन्य सुविधाएं देती हैं। प्राइवेट स्कूल तो अनट्रेंड टीचर को भी रख लेते हैं। सरकारी स्कूल की फीस भी काफी काम होती है और रिजल्ट भी मेरिट में बढ़िया जाता है। ज्यादा सुविधाएं नहीं होती और आम आदमी के या यूं कहूँ अनेक वर्गों के बच्चे इनमें पढ़ते हैं। इसीलिए ये स्कूल जिंदगी जीना और हार नहीं मानना सिखा देते हैं। बच्चों को नाजुक नहीं, यहाँ भारत के वातावरण के हिसाब से सख्त और सौम्य बनाया जाता है। यहाँ पढ़ाई का अनुचित दबाव नहीं होता इसलिए खेलने-खाने और स्वयं के व्यक्तित्व को समझने के लिए समय भी मिलता है। यहाँ दिखावा नहीं होता क्योंकि हर वर्ग के बच्चे होते हैं और बच्चे बचपन में ही इस तथ्य को समझ पाते हैं कि जरूरत क्या है और अनुचित खर्चे क्या हैं। भारत की सच्ची तस्वीर यहीं है और हम अपने बच्चों को उसी से दूर रख एक सपनों की दुनिया में ही रखने की कोशिश करते हैं, तो सपने तो बिखर ही जाते हैं। अगर व्यवस्था बिठाने पर आये तो सरकारी स्कूलों में ऑनलाइन टीचिंग से लेकर सारी सुविधाएं की जा सकती हैं, महाराष्ट्र के सरकारी स्कूल इसका अच्छा उदाहरण हैं। बात ये है कि पहल हम करें, सरकारी स्कूलों का सम्मान करें, बच्चों को उनमें पढ़ा कर न केवल अपना खर्च सीमित करें अपितु उन्हें भविष्य की समस्याओं के लिए बचपन से ही तैयार होने दें। जीवन जीने दें। बच्चे खुद को ढाल लेते हैं। उन्हें सबसे पहले इंसान बनने दें। अपनी इच्छाओं का बोझ न लादें, सफल तो वो हो ही जाएंगे।

परिवार का स्वास्थ्य

आज परिवार के हर सदस्य के लिए मेडिकल पॉलिसी और इंश्योरेंस जरूरी है और इस पर खर्च किया भी जाना चाहिए। पर साथ ही आवश्यकता है लीक से हटकर या यूँ कहूँ सही लीक पर चलने की। हम अंग्रेजों के बनाये भंवरजाल में बुरी तरह फंसे हैं। अपने आयुर्वेद, घरेलू उपचार आदि को दकियानूसी बताकर केवल एलोपैथी दवाई ये जानते बूझते भी लेते रहना कि ये शरीर को सिर्फ नुकसान करती है, कहाँ की समझदारी है? हम कहते हैं कि अंततोगत्वा तो एलोपैथी से ही इलाज कराना पड़ता है या उसी के डॉक्टर्स मिलते हैं या उसे बंद नहीं कर सकते, तो ये हमारी सोच है, जिसे अब बदल दिया जाना चाहिए। और इंटरनेट से तो अब इतना फायदा है कि घरेलू उपचार पता नहीं हो तो वहाँ ढूंढ सकते हैं। आयुर्वेद, होम्योपैथी, यूनानी चिकित्सा, योग, प्राकृतिक चिकित्सा, एक्यूप्रेशर आदि आदि इतने उन्नत विज्ञान हैं, जहां एलोपैथी अड़ती भी नहीं। ये सस्ते भी हैं और अच्छे भी। अब दो बातें होती हैं, एक जल्दी फायदा, दो अच्छे डॉक्टर्स।

तो पहली तो ये गलतफहमी है कि एलोपैथी जल्दी फायदा करती है। अव्वल तो वो फायदा नही करती, रोग को दबा देती है, जिससे वो शरीर में और बड़ी बीमारी बनकर प्रगट हो जाता है। दूसरे बाकी पद्धतियाँ भी काफी जल्दी फायदा करती हैं, पर हम उन्हें मौका ही नहीं देते। तीसरे वो हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता को इतना विकसित कर देती हैं कि छोटी-मोटी बीमारियाँ पास भी नहीं फतकतीं।

दूसरे अच्छे डॉक्टर्स हैं, हाँ कम हैं क्योंकि हम अपने बच्चों को इन क्षेत्रों में पढ़ाते ही नहीं, हम तो उन्हें एलोपैथी डॉक्टर बने हुए एम बी बी एस की डिग्री लिए हुए ही देखना पसंद करते हैं। पसंद पहले हमें बदलनी होगी, आवश्यकता के आधार पर ही युवा पाठ्यक्रम चुनते हैं।

ऐसा करने से दवाइयों पर होने वाले अधिकांश खर्च को हम नियंत्रित कर सकते हैं।

दैनिक खानपान

ये अतिआवश्यक खर्च है, पर दिशा दिए जाने की जरूरत इसे भी है, अपितु सबसे ज्यादा इसे ही बदलने की जरूरत है, ऐसा कहूँ तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। खाना ही वो प्राथमिक वस्तु है जो हमें बीमारियों से बचा उत्तम स्वास्थ्य देती है, हमें दीर्घायु बनाती है और गलत भोजन या गलत तरीके से भोजन हमारा सुख चैन छीन लेता है। आज हम विज्ञापनों में उलझ कर बाहर खाना / बाहर का खाना, डब्बा बंद खाने-पीने की वस्तुएँ जंक फूड आदि का सेवन करते रहते हैं और देसी फायदा करने वाले फलों के रस, घर के बने खाने, सलाद, दलिया, खिचड़ी, छाछ, दूध, दही, मक्खन, श्री खंड, लस्सी, ठंडाई, घर की बनी मिठाइयाँ, हलवे, सूखे मेवे, घर की बनी नमकीन, समोसे, कचोरी आदि से दूर निकल आये हैं।

दैनिक भोजन में फलों का रस, सब्जियाँ, सलाद, दालें, चावल, रोटी, ढूध, दही, छाछ आदि हो तो क्या कहना, सुबह सुबह नाश्ते से पहले रात की भीगी किशमिश, अंकुरित अनाज आदि लिया जाए तो सेहत का क्या कहना, खाने के बाद मुखवास में सौंफ, इलायची चबा ली तो समस्याओं का क्या कहना।

विशेष मौकों पर या सप्ताह में एक बार घर पर ही खाने के लिए विशेष व्यंजन बनाये जा सकते हैं। मुझे पता है गृहणियाँ सोच रही होंगी कि बैठे बिठाए एक जो छुट्टी उनको मिलती थी, वो भी गई। पर सच तो ये है कि विशेष व्यंजन में इतना ज्यादा समय भी नहीं लगता और बल्कि कई सारे तो दैनिक भोजन से भी जल्दी बन जाते हैं। और सबसे बड़ी बात घर का बना खाना शुद्ध और पौष्टिक होता है जो बाहर का कभी नहीं हो सकता और सहायता के लिए इंटरनेट तो है ही।

साज-श्रृंगार

साज-श्रृंगार स्त्रियों का ही नहीं, अपितु पुरुषों का भी स्वभाव होता है। सिर्फ गहने या मेकअप ही नहीं, कपड़े से लेकर जूती तक और पर्स से लेकर चोटी तक सब इसी का हिस्सा हैं। अब आप सोच रहे होंगे कि यहां भी कोई पुराने जमाने की दलील देकर आपको खर्च से ही रोक दूंगी। पर ऐसा नहीं है, खुश रहना भी उतना ही जरूरी है, जितना बचत करना और अच्छा दिख कर इंसान खुश होता है तो ये आवश्यक है, जब तक युद्ध स्थिति नहीं हो तब तक।

पर हाँ आजकल एक शब्द चल गया है जो वाकई काफी अच्छा है, 'वार्डरोब मैनेजमेंट'। इस पर काफी कुछ आपको इसी इंटरनेट पर मिल जाएगा। इसमें बताया जाता है कि आप किस प्रकार के कपड़े, ज्वेलरी, जूते आदि खरीदें जिससे अदल-बदल (मिक्स एंड मैच) कर आप अनेकों ड्रेस और स्टाइल बना सकते हैं।

खर्च हो पर अति का खर्च न हो। ऐसे कपड़े/जूते/जेवर लाने से बचें जो ज्यादा न पहने जा सकें। दैनिक कपड़े सूती हों तो शरीर को भी सुहायेंगे। लड़कों पर धोती-कुर्ता काफी अच्छा लगता है और आजकल प्रचलन में भी है। एक फंक्शन में पहन लेने के बाद कई लोग उस ड्रेस को दुबारा नहीं पहनते कि ये तो सबने देख ली। ये आदत गलत है। पैसे की और कपड़ों की कद्र होनी चाहिए और दिखावा जहाँ आवश्यक हो वहीं होना चाहिए।

अगर कोई कपड़े छोटे हो गए हैं या ले आये पर पसंद नहीं हैं तो अच्छा होगा कि हम उन्हें किसी जरूरतमंद को दे दें।

जेवर अगर शौक है और बचत है तो सोने-चांदी के खरीदिये। जरूरत के समय भी ये काम आते हैं और इनकी कीमत भी बढ़ती ही जाती है। पहले भी, बल्कि दक्षिण भारत में तो आज भी, लोग जो बिल्कुल सादा जीवन जीते हैं, उनके पास भी जेवरों का छा संग्रह मिल जाता है। कारण कि वो लोग हर महीने के, दिखावे के ऊपर खर्च न किये रुपयों को जोड़ कर उनसे जेवर बना लेते हैं। पर्स, घड़ी, जूते आदि आपके व्यक्तित्व के विस्तार में सहायक हैं... आपका व्यक्तित्व नहीं, इसलिए होने चाहिए... ब्रांडेड होने चाहिए, पर बहुतायत में हर ड्रेस के साथ अलग नहीं भी होंगे तो कोई देखने नहीं बैठा।

देखिए हम और हमारी सोच ही हमारा समाज बनाती है और आज उसे ही बदलने की जरूरत है। इसी प्रकार मेकअप है, जरूरी है... पर उचित होगा अगर हम बाज़ार के उत्पादों के स्थान पर घर पर बने उबटन, फेसपैक आदि लगायें और अच्छी त्वचा के लिए क्रीम से उसे कवर न कर खुला छोड़ें; उबटन, गुलाबजल आदि संभाल लेंगे और अनावश्यक मेकअप की परत से भी वो बचेगी। वैसे भी हमें इंसान को उसके बनावटी नहीं वास्तविक रूप से ही पहचानना चाहिए, जो उसके रंग-रूप से परे उसकी अंतरात्मा का स्वरूप है। और शुरुआत स्वयं से हो तो इससे उत्तम और क्या हो सकता है।

गृहसज्जा

स्वयं के श्रृंगार के बाद सारा दिखावा इंसान अपनी हैसियत दिखाने के लिए घर पर ही करता है, जिसके पास जितने पैसे उतना ही शानदार तरीके से बनाया मकान, लाइटें, सजावट का सामान, महँगा फर्नीचर, क्रोकरी, झाड़फानूस आदि इत्यादि और बताने की जरूरत ही नहीं कि इनमें से कुछ भी उसे एक सीमा से ज्यादा खुशी नहीं दे सकता इसलिए इनके लिए हाड़तोड़ मेहनत करने से अच्छा है कि वही समय वो परिवार को दे, उनके साथ रोज़ हँसे-बोले, बच्चों को देश, प्रकृति और मानव की सेवा के लिए प्रेरित करे और स्वयं भी ऐसा कर आदर्श स्थापित करे।

अब चलिए यहाँ तक तो पैसा है तो खर्च समझ में भी आता है, पर कुछ धनिक एक नहीं अनेक बंगले बनवाते हैं। एक में रहते हैं, एक में छुट्टियाँ बिताते हैं और एकाध बंद पटक देते हैं कि जब सही दाम मुलगा तो निकलेंगे और आये पैसे से और दो जमीन ले लेंगे... ये गलत है, जमीन सीमित है और बढ़ती जनसंख्या के लिए उसकी आवश्यकता है। आवश्यकता से अधिक किसी भी वस्तु का संग्रह, उसकी कमी करता है और उसकी कीमतों में अनचाही वृद्धि, जो उचित नहीं। बच्चों के भविष्य के नाम पर भी आप ऐसा न करें। बच्चों को उनका भविष्य स्वयं बनाने दें। कहीं ऐसा न हो आप सब कुछ बनाकर उन्हें उपहार में परोस दें और वो आपकी ही इज्जत न करें, इसलिए सच्ची पूंजी तो वो बच्चे हैं, उन्हें नैतिकता और बड़ों का सम्मान करना सिखाएं और मेहनती और ईमानदार बनायें।

सुविधायुक्त जीवन

ठीक इसी प्रकार आजकल हम टीवी, फ्रिज, वाशिंग मशीन, एसी, ओवन, कार, बाइक, कम्प्यूटर, मोबाइल, स्पीकर, वेक्यूम कलीनर, रोबोट और भी न जाने क्या क्या इकट्ठा कर लेते हैं और आज की सच्चाई भी ये ही है कि इनके बिना काम नहीं हो पाता। आज हममें इतनी शक्ति ही नहीं बची कि हम खुद से घर की सफाई कर सकें, पोंछा लगा सकें, कपड़े हाथ से धो और निचोड़ सकें और इसका कारण... एक गलत खानपान, दो आरामतलब जिंदगी। हम काम नहीं करना चाहते और बहाना लगाते हैं कि टाइम नहीं है, फिर मोटे हो जाते हैं, बीमारियां घेर लेती हैं तो जिम जॉइन करते हैं वर्कआउट(मेहनत) करने के लिए। हाथ से सिलबट्टे पर पिसी चटनी या घुटी ठंडाई का स्वाद अलग ही होता है, जो मिक्सी से नहीं आता और ये फायदा भी करती हैं तन को।

चलिए इसे एक बार छोड़ भी दें तो एसी, वो तो शरीर को सिर्फ नुकसान ही कर रहा है। इससे त्वचा की नमी खत्म होती है और शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है। माइक्रोवेव में पका या गरम किया खाना कितना नुकसानदायक है शरीर के लिए ये तो सभी जानते हैं। मोबाइल, कम्प्यूटर, टीवी आदि आज की आवश्यकताएं हैं, किंतु इन्हीं के मायाजाल में उलझ अपने रिश्तों को तिलांजलि देना ये सर्वथा अनुचित है। साधन-सुविधाओं का प्रयोग हो, पर सीमित हो। साथ ही जो लग्जरी की एक होड़ सी हो गई है, वो खत्म की जानी चाहिए। पहले टीवी, फिर प्लाज़्मा टीवी, फिर और बड़ा प्लाज्मा टीवी, फिर हर व्यक्ति के रूम में अलग अलग टीवी, ऐसे ही लेपटॉप, मोबाइल, कार, बाइक सब में हो चला है। बेहतर से और बेहतर और सबके लिए अलग अलग, जबकि इस सबकी इतनी आवश्यकता नहीं है।

पर्यटन

पर्यटन या घूमना न केवल आनंदित करता है अपितु मानव का व्यवहारिक ज्ञान भी बढ़ाता है। आपने सुना ही होगा, जिस इंसान ने घाट-घाट का पानी पिया हो, उसे कोई आसानी से उल्लू नहीं बना सकता। इसलिए पर्यटन, भिन्न-भिन्न संस्कृतियों का ज्ञान आवश्यक है। बस ध्यान ये रखें कि घूमने जाने की तैयारी में अनावश्यक खर्च को रोकें। क्या आप जानते हैं, अधिकांश विदेशी पर्यटक 4 जोड़ी कपड़ों और एक जोड़ी सैंडल में महीने भर की विदेश यात्रा कर लेते हैं। और सबसे ज्यादा सामान लेकर यात्रा का रिकॉर्ड भारतीयों के ही नाम है। कपड़े, जूते, पर्स, मैचिंग ज्वेलरी से लेकर खाने-पीने के सामान तक सब पैक होता है और इसके बाद भी हम लोग बाहर का खाना खाते हैं। जहां भी जाते हैं हम वहाँ से अच्छी खासी खरीददारी करके आते हैं और न केवल अपने लिए बल्कि अपने रिश्तेदारों के लिए भी कुछ न कुछ लाते हैं और वो अधिकांशतः कोई काम की चीज नहीं होती, बल्कि इतनी बेकार की होती है कि कई बार हम लाने के बाद सोचते हैं कि हम लाये क्यों और उपहार में पाने वाला सोचता है कि ऐसा ही उपहार मिला क्यों। सो इस विषय पर भी विचार किया जा सकता है।

मनोरंजन

सिनेमा, खेल, पार्टी, पिकनिक, एडवेंचर आदि का स्थान जीवन में होना चाहिए, पर सीमित। आपको पता है आपके माता-पिता के समय में, साल भर में एक या दो बार ऐसा मनोरंजन किया जाता था, समय भी था लोगों के पास और महंगाई भी काम थी। अब इसका बिल्कुल उल्टा है, फिर भी इस पर खर्च काफ़ी ज्यादा है। क्या आपको नहीं लगता कि इस पैसे को बचाकर अगर देश के एक बच्चे को उसकी पढ़ाई और पोषण में आप जीवन भर सहायता का प्रण ले लें, तो न केवल वो बच्चा आपको भगवान की तरह पूजेगा, बल्कि आपको भी जिस आंतरिक आनंद की प्राप्ति होगी, वो अभूतपूर्व होगी। देशसेवा होगी सो अलग।

उत्सव

उत्सव भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग हैं और आज वो अपना वास्तविक स्वरूप खोते जा रहे हैं। भारत में उत्सव कभी कोई परिवार अकेले नहीं मनाता था, दिवाली हो तो एक दिया पड़ोसी के भी जलाता था, सावन के झूलों में पूरा गांव साथ झूल जाता था और होली के रंग में हर कोई नहाता था। गणगौर पर सब साथ पूजा करती थीं, नवमी पर गाँव की कन्याएँ घूम घूम भोजन करती थीं, करवा चौथ स्त्रियाँ साथ ही मनाती थीं और हर त्यौहार पर भोग-मिठाई घर पर ही बनाती थीं।

इस प्रकार जब सब ऊंच-नीच का भेद भूल, साथ-साथ झूमते-गाते थे तो जिसके घर में कुछ नहीं होता था, वो भी खुशियाँ मना पाता था। त्योहार का मतलब होता था, जब कोई दुःखी न हो, जब कोई अकेला न हो। आज अपनी शान दिखाने के लिए सजावट, सफाई, नए कपड़े, मिठाई, रंगोली आदि पर हम खर्चा तो बहुत कर देते हैं, पर स्वयं से पूछिये, जितना पैसा लगाते हैं, क्या उतना खुश हो पाते हैं? आज हम या तो त्यौहार मनाते हैं या उसे भूल जाते हैं लेकिन अपने सारे जानने वालों के साथ इकट्ठे होकर एक ही जगह सब मिलकर काम करकर साल में एक त्यौहार तक नहीं मना पाते, तो सारा खर्चा व्यर्थ है।

और तो और इतने त्यौहार होने के बाद भी हमें कमी लगती है, सो न्यू ईयर, क्रिसमस से लेकर वेलेंटाइन डे तक मना डालते हैं, पर परिवार को समय नहीं देते। और परिवार से मेरा आशय सिर्फ आप और आपके बच्चे नहीं है। राम राम कर लेने से रिश्तों को निभाने की इति नहीं हो जाती।

साथ ही कुछ उत्सव देश के लिए भी मनाए जाने चाहिए, उसी उत्साह से, जिससे हम अपने सांस्कृतिक उत्सव मनाते हैं। जैसे देश की आज़ादी का उत्सव 15 अगस्त, संविधान का उत्सव 26 जनवरी आदि। ज्यादातर लोग इस दिन का उपयोग सोने के लिए ही करते हैं। इन दिनों अगर सामूहिक रूप से उत्सव मनायें तो हममें भी देशप्रेम की भावना का विस्तार होगा और हम अपने समाज के लिए कुछ अच्छा कर पाएंगे।

सामाजिक सरोकार

उत्सवों पर या शादी-विवाह जैसे मौकों पर बल्कि मृत्यु जैसे दुःखद मौके पर भी, परिवार आपस में मिलता है, किसी एक का अति का खर्चा होता है, वो चाहे या न चाहे, उसके पास हो या न हो, पर उसे करना पड़ता है, ये प्रथा गलत है। शादी या मृत्यु किसी व्यक्ति विशेष का मामला नहीं है, ये पूरे परिवार से संबंधित है। फिर खर्चा एक ही का क्यों? कुछ लोग ऐसे मौकों को दिखावा करने के लिए उपयुक्त मानते हैं, लेकिन इसी का परिणाम है कि कुछ लोगों पर आर्थिक भार बहुत बढ़ जाता है। इसे सीमित किया जाना चाहिए।

भविष्य के लिए बचत

ये बहुत आवश्यक है। कोरोना जैसे न जाने कितने और संकट अभी इस जीवनकाल में देखने को मिल जायें। इसलिए बचत करनी है किंतु एक ही जगह नहीं, अलग अलग तरह से। संकट अलग-अलग तरह के होते हैं, उसी आधार पर बचत भी। जैसे कुछ रुपये घर में अवश्य रखें, करीब दो-तीन महीने का खर्च चलाने लायक। बैंक में रखें करीब 6 महीने का खर्च। एफडी, एस आई पी आदि में 2 साल का खर्च, फिक्स्ड एसेट, जेवर आदि भी रखें, शेयर बाजार आदि में भी कुछ रुपये लगा सकते हैं किंतु बाजार का ध्यान रखते हुए।

रुचि एवं आदतें

रुचि एवं आदतें हरेक इंसान की अलग-अलग होती हैं और उन्हें पूरा किये बिना वो संतुष्ट भी नहीं होता। किसी को एंटीक इकट्ठे करने का शौक़ होता है तो किसी को जूते, किसी को गिटार बजाकर आनंद आता है, तो किसी को फोटोग्राफी में। कोई घूमने का शौक रखता है तो कोई प्रकृति की सेवा का।

शौक पूरा करने के लिए इंसान अपनी मौद्रिक क्षमताओं से भी कई बार आगे निकल जाता है। इसलिए ही इसे शौक कहते हैं। पर हर चीज़ की अति बुरी होती है। अतः शौक रखिये पर उन पर नियंत्रण भी रखिये।

धर्म-कर्म

धर्म के नाम पर और ईश्वर के नाम पर हम मंदिरों में दान देते हैं, तीर्थों, धार्मिक स्थानों में रुपये, सोना, चाँदी चढ़ाते हैं। अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान देते हैं। गलत नहीं है, लेकिन क्या वर्तमान परिस्थितियों में दान कहाँ हो, कितना हो ये पुनर्विचारणीय नहीं है?

आज एक आपदा ने हमें घेरा है, तो हम प्रधानमंत्री सहायता कोष में दान कर रहे हैं और खुल कर कर रहे हैं, क्योंकि हमें विश्वास है कि उसका उपयोग उचित होगा। तो क्यों नहीं हम अपने वेतन का एक हिस्सा इसमें हमेशा डालें। मंदिरों या धार्मिक स्थानों में जो हम दान देते हैं उसका प्रयोग कहाँ और क्या होता है इसमें काफी मत हैं। देखने वाली बात ये भी है कि इस संकट काल में जहाँ हर छोटे बड़े वर्ग ने दिल खोल कर दान और सेवा की है वहीं सभी सम्प्रदायों के धार्मिक संस्थानों ने उनके प्रतिदिन की आय के मुकाबले कितना अंशदान किया स्वेछा से देशहित में।

ध्यान इस बात पर भी देना है कि दान ही काफी नहीं है अपने कर्तव्यों की इति करने के लिए, हमें एकजुट होकर सेवाकार्य करने होंगे और केवल संकटकाल में नहीं, इसके बाद भी। क्योंकि हम इस समय में ये देख रहे हैं कि धन का कोई बड़ा योगदान नहीं होता अगर हम कार्य ही नहीं कर रहे। हाँ कार्यों का दीर्घगामी परिणाम अवश्य मिलता है। सोचना ये भी होगा कि हम क्या बदलना चाहते हैं, जैसे अगर हम नहीं चाहते कि जबरन भीख माँगना और मँगवाना चालू रहे तो हमें भीख में रुपये देना बन्द करना होगा। आप अपने साथ केले या कुछ और फल रखें, वो बाँट दें, या उन्हें कहीं बिठा कर पौष्टिक भोजन कर दें तो उत्तम है। पर समय देना होगा। देश को हमारा समय चाहिए अब।

सादा जीवन गरीबी नहीं

आज हम एक अजीब सी भागदौड़ में लगे हैं। जो है उससे और अधिक पाने की होड़। बैंक बैलेंस बढ़ाने की होड़, एक घर है तो उसे और बड़ा बनाने की होड़, फिर दूसरा-तीसरा लेने की होड़, एक गाड़ी, फिर अनेक गाड़ियों की होड़। और होड़ का तो कोई अंत नहीं होता। ऐसे में इसी प्रकार की आपदाएँ हमें आईना दिखातीं हैं ताकि हम संभल सकें और सच्चाई से अवगत हो सकें। और सच ये ही है कि इंसान बहुत कुछ इकट्ठा कर सकता है, पर उस बहुत कुछ का उपभोग नहीं कर सकता। वो दौड़ता रहता है, सही-गलत तरीकों से अपने लिए और अपनों के लिए खुशियाँ जुटाने के लिए और जब थक जाता है तो पता चलता है कि अपने उसके साथ को तरस कर अब कहीं अलग दुनिया बसा चुके हैं और वो खुद जिन खुशियों को जीने के लिए भाग रहा था, वो हैं, पर अब उसके पास इतना समय ही नहीं कि उनसे खुश हो सके।

हम कम में खुश क्यों नहीं होते... ये एक मनोवैज्ञानिक शोध है कि जरूरत से अधिक इंसान इसलिए इकट्ठा करता है ताकि वो सुरक्षित महसूस कर सके और दूसरे से सम्मान प्राप्त कर सके। अब पहला तो हम देख ही रहे हैं कि कोई भी इंसान तब तक सुरक्षित नहीं है जब तक उसका देश सुरक्षित नहीं है और रही बात सम्मान की तो जो सम्मान सेवा करने से मिलता है, जो आंतरिक शांति किसी की सहायता करने से मिलती है, वो कहीं ओर मिल ही नहीं सकती। तो फिर क्यों इतना समय स्वयं के लिए इकट्ठा करने में बिताना, क्यों नहीं उसे देशहित और प्राणीमात्र की सेवा में लगाना।

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