Geeta Gyan - Karm-Gyan aur Bhakti Yog (Hindi)

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Lord Krishna's Geeta has answer of most of the questions of life. Here I am sharing a few readings of Geeta to make you all curious to understand Geeta. It is my humble request to everybody from all sects, to read Geeta once in their life. We need to understand what God wants from us and how we should live our lives...

प्रारम्भ करने से पहले मैं स्पष्ट कर दूँ कि ये वो अर्थ है जो मैंने समझा है। गीता अपने आप में बहुत ही गूढ़ और रहस्यमय है। दिया गया अर्थ अधूरा या अज्ञानतापूर्ण हो सकता है। उद्देश्य है कि मेरे साथ साथ हर पढ़ने वाले के मन में एक बार गीता पढ़ने की अभिलाषा जगा पाऊँ और शायद अपने सवालों का उत्तर भी पा पाऊँ।

गीता में ईश्वर को प्राप्त करना लक्ष्य मानते हुए तीन मुख्य मार्ग बताये गए हैं और तीनों ही मार्ग आपस में एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। सबसे पहला मार्ग है - कर्म योग, जहाँ स्वयं को भूलकर ईश्वर द्वारा प्रदत्त कार्य करने को कहा गया है। द्वितीय है ज्ञान योग, जो स्वयं को, स्वयं की प्रकृति को और संसार को जानने से सम्बन्ध रखता है। तृतीय मार्ग है, भक्ति योग, जो भक्ति द्वारा उस दिव्य शक्ति को ढूंढने और पा लेने का मार्ग बताता है। अब जहाँ भक्ति है वहाँ 'अहम्' हो ही नहीं सकता। आप पूरे समय अपने भगवान् के साथ उन्हीं के कार्यों में लगे रहते हो (यहाँ मैं स्पष्ट कर दूँ कि भगवान् के कार्य उनकी सेवा-पूजा कतई नहीं हैं। भगवान् को हमसे कुछ नहीं चाहिए हो सकता और हम उन्हें इस संसार की किसी भी वस्तु से भज नहीं सकते। समस्त कर्मकांड भगवान् तक पहुँचने का साधन हो भी सकता है और नहीं भी। ये हमारे ऊपर ही निर्भर करता है। जो मैं आगे बताउंगी।) भक्ति द्वारा भी आप उस सर्वशक्तिमान सर्वव्यापी सर्वज्ञानी भगवान् को जानने और उसके चाहे अनुसार उसे भजने की चेष्टा करते हैं। ज्ञान योग में भी आप स्वयं के अहम् को भुलाकर अपने भीतर और बाहर हो रहे क्षणिक परिवर्तनों को प्रतिपल दृष्टा बनकर देखते हैं और उस सर्वशक्तिमान द्वारा रचित इस प्रकृति का एक अंश मात्र बन ईश्वरीय कार्य करते रहते हैं। कर्म योग में भी मूल रूप से कार्मिक होकर स्वयं को भुला देना ही है। सो तीनों मार्ग भले ही ऊपर से अलग-अलग दिखें, पर वास्तविकता में एक ही मार्ग के तीन अंश हैं जो एक दुसरे के पूरक हैं और एक दुसरे के बिना अधूरे हैं।

एक तरफ कृष्ण ज्ञान योग को कर्म से श्रेष्ठ बताते हैं, वहीँ दूसरी ओर कर्म योग से महान कुछ नहीं है, ऐसा कहा गया है। दरअसल ज्ञान योग कर्म का अंत है। उस कर्म का अंत जो 'मैंने किया' भाव के साथ किया जा रहा है। शरीर में चलने वाली अनगिनत प्रक्रियाएं जहाँ हम अनभिज्ञ होते हैं, एक दृष्टा बन देखते रहते हैं, उनका रुकना तो संभव ही नहीं है। ज्ञान योग द्वारा उसका ज्ञान संभव है और यहीं ज्ञान योग और कर्म योग एकाकार हो जाते हैं।

कर्म में 'मैं' बोलने या नहीं बोलने से कुछ परिवर्तित नहीं होगा। परिवर्तन भावना और इच्छा से होगा। एक गृहिणी से अच्छा उदाहरण मुझे नहीं मिलता। भारत में एक कुशल गृहिणी सुबह के नाश्ते से लेकर रात के खाने तक घर और बाहर के अनेकों कार्य करती है। बच्चों को तैयार करना, घर की साफ-सफाई, बाजार का काम, सबके अलग अलग समय के अनुसार स्वयं को तैयार करना और सबको उचित समय पर उचित वस्तु प्रदान करना। इतना सब करते हुए अगर अहम् भाव जागृत हो गया तो कार्य समय पर नहीं होंगे। अगर पूरे दिन कार्य के बदले में फल की या वेतन की इच्छा हो गई, तो कोई उस कार्य का मोल नहीं चुका पायेगा। वो शांति से कार्य करती रहती है अपना कर्म समझ कर, ये ही कर्म योग है। अगर हर मनुष्य 'मैं' त्याग देगा तो 'तू' भी नहीं रहेगा। कार्य समय पर होंगे। भान होगा उनके होने का, पर 'मान' नहीं। शारीरिक व्याधियों और नित्य प्रति की चिंताओं का स्थान चिंतन ले लेगा। चिंतन और ज्ञान द्वारा कार्यों की स्थापना होगी और शरीर उसका कार्यान्वयन देखेगा। 'मैं' कहीं आया ही नहीं।

अब 'मैं' बस एक दृष्टा हूँ। बस एक दृष्टा।

अगली बार कोशिश करुँगी ये बताने की कि अगर 'मैं' दृष्टा हूँ तो 'सृष्टा' कैसे हो सकता हूँ और अगर भगवान् की सेवा-पूजा से इतर भी कोई ईश्वरीय इच्छा है मेरे लिए तो उसका ज्ञान कैसे हो। और ये मन्त्र और सेवा-पूजा क्यों अगर ये भगवान् को चाहिए ही नहीं। सो अपने विचार जरूर से भेजिए और पढ़ते रहिये...

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