Geeta Gyan - Spiritualism and Career (Hindi)

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Lord Krishna's Geeta has answer of most of the questions of life. In this article I am trying to share how spirituality can decide your career goals and the correct way to live life without HURDLES. It is my humble request to everybody from all sects, to read Geeta once in their life. We need to understand what God wants from us and how we should live our lives...

तो जैसी चर्चा चल रही थी कि जब मैं 'दृष्टा' हूँ तो 'सृष्टा' कैसे हो सकती हूँ? अगर 'मैं' का त्याग ही कर दिया तो इच्छा कैसी, कार्य क्यों और कैसा? यंत्रवत जीवन तो न दुःख में दुःखी, न सुख में प्रसन्न। बस शांति ही शांति। लेकिन अगर जीवन में सुख-दुःख ने मुझपर प्रभाव ही नहीं डाला, अगर जीवन खट्टा-मीठा हुआ ही नहीं तो जीने का क्या मज़ा?

ये सत्य है कि गीता आत्मज्ञान की बात करती है, सुख-दुःख से परे ईश्वरीय कार्यों में रत रहते हुए जीवन यापन की बात कहती है। इन्द्रियों (इच्छा) पर नियंत्रण और चिंता से चिंतन की ओर अग्रसर होने पर बल देती है। वो जीवन में दृष्टा बनने को कहती है। फल (परिणाम) की चिंता से परे रहते हुए कर्म करने को कहती है। लेकिन बात गीता में कर्म की होती है, अकर्मण्यता की नहीं। कर्म ईश्वर भजन नहीं है... वो है जो मनुष्य के अंदर ही है... उसकी आत्मा का स्वभाव है... प्रकृति के अनुरूप है। गीता में आत्मा के स्वभाव या इच्छा को अध्यात्म कहा गया है। अतः जो व्यक्ति आत्मा के स्वभाव के अनुरूप कर्म करता है वो अध्यात्मिक है, ईश्वर से जुड़ा है और ईश्वरीय कार्य में रत है।

अब समझते हैं कि आत्मा का स्वभाव क्या है और इसे कैसे जाना जा सकता है? आत्मा का स्वभाव या आपका सामान्य स्वभाव आपकी आत्मा का भाव होता है। जब आप नित्य 15 मिनिट आँख बंद कर सारी दुनिया को भुलाकर शांत वातावरण में स्वयं के अंदर की आवाज पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो आपको आपके आत्मा के स्वभाव के बारे में पता लगने लगता है। आत्मा के स्वभाव को भी मुख्यतया चार भागों में बांटा गया है, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र। किन्तु इसका वर्ण व्यवस्था से कहीं कोई लेना-देना नहीं है। सामान्य शब्दों में कहूँ तो कार्य को चार भागों में विभक्त किया गया था, समझने की दृष्टि से और कोई भी कार्य गौण या उच्च नहीं माना गया था। ये बिल्कुल वैसा ही था जैसे आज हम मोटे तौर पर विषयों को बी. ए., बी. कॉम. और बी. एस. सी. में विभाजित करते हैं, फिर अपनी ही धारणा से एक को कठिन और एक को सरल मान लेते हैं या एक विषय को महान और एक को गौण मान लेते हैं। पर बनाने वाले ने तो समता से ही बांटा था और सिर्फ समझने के लिए ही ये शाखाएँ बनाई थीं।

हर एक मनुष्य को जीवन में ईश्वर से मिलने से पूर्व चार आश्रमों (ब्रह्मचर्य - विद्या ग्रहण, गृहस्थ - पारिवारिक एवं सामजिक दायित्वों का निर्वाह, वानप्रस्थ - प्रकृति की सेवा एवं प्रकृति की शरण, संन्यास - समस्त संसार से मोह भंग कर ईश्वर में समर्पण) का निर्वहन करना पड़ता है और ठीक उसी तरह ही ये चारों कार्य करने ही होते हैं। ब्राह्मण कर्म अर्थात संयम, नियम, ज्ञान लेना एवं ज्ञान बाँटना, समझाना, बदलाव लाने के लिए विचारक एवं लेखक का कार्य करना आदि। क्षत्रिय कर्म अर्थात जिम्मेदारी संभालना, रक्षा करना, निर्णय लेना, सभी प्रकार के साहसी कार्य, प्रतिस्पर्धा, खेल, राजनीति, सेना कार्य आदि। वैश्य कर्म अर्थात ईमानदारी से किये धन से जुड़े हुए कार्य, वस्तुओं का क्रय-विक्रय, धन संचय, शेयर बाजार आदि। तथा शूद्र कर्म अर्थात सेवा कार्य, रोगियों की सेवा, डॉक्टर, साफ़-सफाई, दान धर्म, आदि। कार्य कोई भी हो और उससे धनोपार्जन हो या न हो, किन्तु प्रत्येक मनुष्य को चारों कार्य करने ही पड़ते हैं। उनमें से ही कुछ कार्य हमारे जीवन के उद्देश्य बन जाते हैं, जिन्हें हमें जानना होता है। ये एक या एक से ज्यादा हो सकते हैं।

स्वयं की प्रकृति समझने के लिए हमें किसी ज्योतिषी के पास जाने की जरुरत नहीं है, उससे कहीं ज्यादा जानकारी तो बस नित्य किया 15 मिनिट का ध्यान ही दे देगा। लेकिन न तो दुनिया में कर्म इतने सीधे हैं और न ही आत्मा का स्वभाव। पर हाँ, नित्य किये ध्यान से ये सब स्पष्ट पता लगने लगता है। अपने परिणाम की चिंता में हम कई बार अंतरात्मा की आवाज नहीं सुनते। कभी-कभी आसान राहें तलाशते हुए उसे भुला देते हैं। जीवन में ईश्वर ने हमारे लिए कुछ और चुना होता है और हम वो नहीं मानकर जीवन को उलझनों से भर लेते हैं।

ईश्वर की राहों पर चलने वाले लोग सुखी होते हैं, इसलिए नहीं कि वो परिणाम के बारे में सोच नहीं रखते बल्कि इसलिए कि वो कार्य के परिणाम से प्रभावित होने की जगह नई राह बनाने में लग जाते हैं। सफलता उनसे दूर रह ही नहीं सकती क्यूंकि उनका ध्यान सिर्फ ईमानदारी से कर्म करने पर होता है न कि फल की चिंता में दुःखी होने पर। आप किसी भी महान हस्ती की जीवनी उठा कर पढ़ लीजिये; क्या उसका जीवन आसान था? क्या वो चांदी का चम्मच मुँह में लेकर ही पैदा हुए थे? क्या एक राजा को अपने जीवन में कोई समस्या नहीं होती, या क्या बचपन से ही बिल गेट्स या अम्बानी को पता था की उन्हें बिज़नेस क्या और कैसे करना है? जी नहीं। बस उन लोगों ने वो किया जो ईश्वर उनसे करना चाहता था। अपने मन की आवाज सुनी और जिन लोगों ने ऐसा नहीं किया, वो अमीर भले ही हों, पर खुश नहीं हो सकते। ईश्वर चाहता है की जीवन में आपको अनेकों अनुभव हों ताकि आप परिपक़्व हो जाएँ। आप में इतनी ऊर्जा आ जाये कि आप और लोगों का मार्ग प्रशस्त कर सकें। सो सुख-दुःख तो उनके जीवन में भी होते ही हैं, लेकिन वो प्रभावित नहीं होते। सिर्फ सोचने पर ये सब अजीब और उबाऊ लग सकता है, पर विश्वास कीजिये जो इसे जीता है उसे मजा आ जाता है। एक असीम शांति की प्राप्ति होने लगती है। बीमार होते हैं, पर उसमें भी बिना किसी समस्या के कार्य कर पाते हैं। लक्ष्य पूरे होने लगते हैं और जीवन जीने में आनंद ही आनंद आने लगता है। मार्ग की बाधाएं एक खेल मात्र लगने लगती हैं और आप स्वयं को उनसे कहीं आगे सोचता हुआ पाते हैं।

सार रूप में ध्यान द्वारा आप आत्म निरीक्षण कर अपने वास्तविक स्वभाव को जान सकते हैं और उसी के अनुसार करियर को समझ सकते हैं। अगली बार बताऊँगी कि किस प्रकार पुरुष (मन) संकल्प लेता है और प्रकृति उसकी इच्छा पूरी करती है और ये भी बताऊँगी कि ईश्वर कब किसी इंसान को अपने कार्य के लिए चुनता है और कैसे।

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