Main (I) (Hindi)

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When people say 'I did that', 'I will do it'. Why they feel arrogancy in that. A lot of important tasks in our body are happening every second, and no part of our body show arrogancy for that work then why 'I'...

'अहम्' का भाव संसार से मुक्ति में बाधक है। जो कह रहा है 'मैंने किया', 'मैं कर रहा हूँ', 'मैं करके दिखाऊंगा' वो वास्तविकता में क्या करेगा और किसे दिखायेगा?

हमारे अंदर जो करोड़ों रक्त कोशिकाएं घूम रही हैं, जो रुधिर में बहने वाली आक्सीजन उन्हें घुमा रही है, जो हृदय उसे फेफड़ों से सोख कर शुद्ध कर रहा है, जो नाक उसे अंदर घुसा रही है, जो तंत्रिका तंत्र इस सारे कार्य को बिना दिमाग को बताये किये जा रहा है, जो जढराग्नि भोजन को पचा समस्त तंत्रिका तंत्र को, मस्तिष्क को और समस्त अंगों को पोषण देती है, जो मस्तिष्क इतने विलक्षण कार्य करता है, जो अवर्णनीय है, नया सीखना, पुराने को संभल कर रखना, समस्त इन्द्रियों द्वारा किये जा रहे कार्यों से परिणाम निकालना, नए नए आविष्कारों की रचना करना, सोचना और जो शरीर के अज्ञात सात चक्र इन सभी ज्ञात अंगों को भली प्रकार नियंत्रित और यन्त्रित करते हैं, उनमें से कोई भी 'मैं' या 'मेरा' नहीं बोलता। बल्कि सब चुपचाप अपना कार्य करते रहते हैं।

ना ही कोई मनुष्य इनमें से किसी की भी तुलना कर किसी क्रिया या कारक को श्रेष्ठ बता पाता है। हाँ कई बार अपने दिमाग की तारीफ़ जरूर करता है। लेकिन क्या दिमाग उस तारीफ़ को सुनने के लिए कार्य कर रहा था, या क्या वो इसका घमंड करता है, या क्या वो बाकी तंत्र को बतलाता है की मेरी तारीफ़ हुई... नहीं। वो कुछ नहीं बोलता और कार्य करता रहता है। वहाँ कोई लड़ाई नहीं, कोई ऊँच-नीच नहीं। बस कार्य के प्रति समर्पण और उसकी निरंतरता। न कोई वक्ता, न कोई श्रोता और हम जैसे अनभिज्ञ दृष्टा। ये सब अनवरत हो पाता है क्यूंकि वहाँ 'मैं' और 'तू' नहीं है। एक-एक पल में हमारे भीतर और बाहर इतने कार्य हो रहे हैं और उसके बाद भी मज़े की बात ये है कि 'हम' इन समस्त कार्यों से मुक्त हैं और अपना इच्छित कार्य कर सकते हैं।

तो क्या हमें 'मैं' नहीं बोलना चाहिए। 'मैं' आखिर क्या है और क्या कर सकता है? क्या 'मैं' अपने चाहे कार्य कर सकती हूँ? या फिर ईश्वरीय सत्ता की निरीह कठपुतली बन निरंतरता में कार्य करना ही मेरी नियति है। अगर हाँ तो मन में इच्छाएँ और भावनाएँ क्यों हैं? ईश्वर अगर मुझसे यांत्रिक (मशीनी) कार्य ही करवाना चाहता था, तो मुझे यंत्रवत ही क्यों नहीं बनाया गया? वो क्या है जो मैं बदल सकती हूँ और क्या बदलाव की इच्छा रखना अनुचित है? ईश्वरीय सत्ता में मेरी क्या भूमिका होनी चाहिए?

सच कहूँ तो जवाब मैं ढूंढ रही हूँ। जवाब मिल गए होते तो ये लिखने का कार्य भी नहीं होता। जो इस बारे में मेरे विचार हैं, उन्हें इसकी अगली कड़ी में शेयर करुँगी और आशा करुँगी कि सत्य की इस खोज में आप लोग भी मेरी सहायता करेंगे। अगर मेरे प्रश्नों का आपके पास कोई उचित उत्तर है तो कमेंट में जरूर दीजिये और अगर आपके मन को भी ये प्रश्न व्यथित कर गए हैं, तो मेरे अगले लेखन का इन्तजार कीजिये। जो मैंने समझा है, साझा जरूर करुँगी, शायद कोई उसमें सुधार कर ये जीवन सुधार पाए।

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