Positivity (Hindi)

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Positivity is an internal aspect which makes human resistant for all situations of life. It doesn't mean that after being positive you will need not to face any difficulties or everything will go as per your desire in your life, but with positivity you will understand how to tackle different situations.

सकारात्मकता

आज हम लोग एक बदलते समय में जी रहे हैं। जहाँ एक ओर पाश्चात्य संस्कृति की चकाचौंध हमें आकर्षित कर रही है, वहीँ उन्हीं विदेशियों को जब हम भारतीय पुरातन ज्ञान-विज्ञान और क्रियाओं के पीछे भागते देखते हैं तो हमें अपनी संस्कृति की महानता पता चलती है और हम भी उसे अपनाने चल पड़ते हैं। अब देखने की बात यह है कि हम केवल शब्दों के पीछे भाग रहे हैं या सच में उन्हें समझते भी हैं। इनमें से ही एक बहुचर्चित शब्द है --- सकारात्मकता और सकारात्मक सोच।

ऐसा कहा जाता है कि हमेशा सकारात्मक सोच रखने से इतनी सकारात्मक ऊर्जा निकलती है कि आप जो सोचते हो वो सच होने लग जाता है। पर क्या वास्तविकता में हम इसका आशय समझते हैं, या सकारात्मक होने का केवल दम्भ करते हैं ? सकारात्मक सोच वाले मनुष्य के जीवन में भी कठिनाइयाँ आती हैं और वो भी दुःखी होता है, पर मानसिक संतुलन और संयम बनाये रखता है। क्या भगवान् राम का जीवन सरल था? क्या उनसे ज्यादा कोई सकारात्मक हो सकता है जो बिना विचलित हुए सम्पूर्ण राज-पाट अपने माता-पिता के कहने मात्र से त्याग कर वन में गए। और माता सीता ने भी उनका अनुसरण किया। क्या भगवान् कृष्ण से ज्यादा कोई सकारात्मक हो सकता है जो द्वारकाधीश होते हुए भी सब त्याग कर एक युद्ध में सम्मिलित हुए, पर शस्त्र नहीं उठाया और जो अपनी इच्छा मात्र से उस युद्ध से मनचाहा परिणाम ले सकते थे, फिर भी सारथी बनना स्वीकार किया।

आइये मोटे तौर पर विचार करते हैं कि सकारात्मकता क्या है और कैसे ये जीवन को सरल बनाती है।

सकारात्मक सोच एवं सकारात्मकता का दिखावा

1) विश्वास

  • ऐसा व्यक्ति स्वयं पर विश्वास रखता है और मानता है कि वो स्वयं को पहले से और अधिक उन्नत करेगा।
  • सकारात्मक होने का दिखावा करने वाला व्यक्ति ईश्वर और प्रकृति से ये अपेक्षा करता है कि उसकी सोच के अनुरूप ही फल ईश्वर और प्रकृति उसे देंगी।

2) उन्नति

  • सकारात्मक व्यक्ति के लिए उन्नति का आशय स्वयं के आंतरिक गुणों का विकास करना है।
  • सकारात्मक होने का दिखावा करने वाले के लिए उन्नति सांसारिक सुख-सुविधाओं को अधिकाधिक इकट्ठा करना ही है।

3) आशा

  • सकारात्मक व्यक्ति संसार में नहीं स्वयं में परिवर्तन की आशा रखता है, इसीलिए आसानी से निराश नहीं होता।
  • सकारात्मक होने का दिखावा करने वाला दूसरे से, प्रकृति से या ईश्वर से शुभता की आशा रखता है इसीलिए विपरीत परिस्थितियों में शीघ्र संयम खो देता है।

4) सत्य

  • जीवन कभी एक सा नहीं रहता, वो कभी सरल तो कभी कठिन होता ही है। सकारात्मक व्यक्ति ये समझता है और दौनों परिस्थितियों में सम रहने का, प्रसन्न रहने का और दौनों परिस्थितियों को स्वीकार करने का प्रयास करता है।
  • सकारात्मक होने का दिखावा करने वाला जितनी सरलता से अच्छे जीवन के लिए ईश्वर को धन्यवाद देता है, उतनी ही सरलता से जीवन में आईं कठिनाइयों के लिए उसे और भाग्य को दोष भी दे देता है। वो विपरीत परिस्थितियों से वैसे ही बचने की कोशिश करता है जैसे कोई कबूतर आँख बंद करके सोचता है कि बिल्ली एक भ्रम है और वो उसे नहीं खायेगी। वो सत्य ना सुनना चाहता है, ना समझना।

5) दृष्टि

  • सकारात्मक व्यक्ति हर एक में गुण देखता है और दुर्गुणों को किसी और को बताने की जगह अपनी सकारात्मकता से दूर करने की कोशिश करता है।
  • इसके विपरीत सकारात्मक होने का दिखावा करने वाला दोषों को दूर करने का प्रयास करने की जगह ऑंखें बंद कर लेता है और सोचता है सब अच्छा है।

'सकारात्मक सोच' केवल व्यक्तित्व का विकास है और प्रकृति से परिणाम मिलने लगते हैं क्यूंकि हम प्रत्येक परिस्थिति के सम्यक दृष्टा बन जाते हैं.... साम्यता को प्राप्त कर लेते हैं, तो प्रकृति हमें कुछ भी दे, हम उसमें संतुष्ट और प्रसन्न रहते हैं।

हाँ ये सच है कि ऊपर लिखी बात एक आदर्श है, किन्तु सत्य है। कोई व्यक्ति 100% सकारात्मक हो गया हो और अपनी उस स्थिति को जीवनपर्यन्त रख पाए, तो वो शायद संत और ईश्वर तुल्य हो जाएगा। पर एक सामान्य मनुष्य भी इस दिशा में यथासंभव प्रयास तो कर ही सकता है।

तो क्या सकारात्मक व्यक्ति को सांसारिक सुखों से दूर होना चाहिए या क्या उसे सम रहने के लिए कुछ अच्छा होने पर प्रसन्न नहीं होना चाहिए?

सबसे पहले तो भावनाओं को दबाना सत्य से दूर जाने जैसा ही है। सुख में प्रसन्न होना और दुःख में रोना ऐसा ही बनाया है ईश्वर ने इंसान को। लेकिन उस सुख या दुःख में इतना खो जाना कि दैनिक कर्म बाधित हो जाएँ, ये अतिरेक है और इससे बचना चाहिए। अब बात रही सांसारिक सुखों के उपभोग की, तो उसका सकारात्मकता या नकारात्मकता से कोई लेना-देना है ही नहीं। सकारात्मकता केवल एक सोच है जो स्वयं का विकास करती है बस। अंदर से प्रसन्न रखती है जिससे कार्य समय पर होते हैं।

क्या लोगों पर शक करना या भरोसा नहीं करना नकारात्मकता है?

सकारात्मकता एक ऐसी स्थिति है जिसे नापा नहीं जा सकता। ये एक भाव है जो हर मनुष्य के अंदर जन्म से ही होता है। अगर जीवन में कोई बड़ी नकारात्मकता या धोखा नहीं मिले तो शायद प्रत्येक व्यक्ति सकारात्मक ही होगा, बिलकुल बच्चों की तरह या पुराने जमाने के लोगों की तरह... जैसा भीतर से वैसा ही बाहर से। हम आज कहते हैं भारतीयों में बहुत धोखाधड़ी है जर्मनी या जापान के लोग बहुत ईमानदार होते हैं, देश के प्रति समर्पित होते हैं। तो इसका कहीं न कहीं कारण उन देशों के शासकों का समग्र राष्ट्र के प्रति समर्पण है, जो जनता भी उन्हें प्यार करती है। भारत हमेशा आक्रमणकारियों से परेशान रहा। दो सौ साल अंग्रेजों का गुलाम रहा। विभाजन और युद्ध का दर्द झेला और फिर गरीबी और असुविधाओं से सालों घिरा रहा। देश चलाने वाले देश के विकास की जगह अपना घर भरने में गए और ऊपर वाले रिश्वत लेते देख नीचे वाले भी फायदा उठाने लगे। अब हम रिश्वत को भी व्यवहार का नाम देने लगे। तो समाज में सरलता की जगह कुटिलता और विश्वास की जगह संदेह आना तो स्वाभाविक है ही।

नकारात्मकता अपने आप में कुछ है ही नहीं, बस सकारात्मकता की कमी है। हाँ... लोगों पर भरोसा नहीं करना सकारात्मक नहीं है क्यूंकि हम तभी शक करते हैं जब या तो हमारा आत्मबल इतना कम होता है कि आने वाली परिस्थिति का सामना करने को हम तैयार नहीं होते इसलिए वो अच्छी हो या बुरी हम पहले ही उसके बारे में धारणा बना लेते हैं। या फिर ऐसा तब होता है जब हमारी लोगों और परिस्थितियों को जानने और पहचानने की क्षमता क्षीण हो जाती है।

लेकिन इसका ये अर्थ नहीं है कि हम सब पर भरोसा कर लें और वो हमें ठग कर चला जाए। सतर्कता अपनी जगह है। भगवान ने हम सब में एक ऐसी शक्ति दी है जो सही और गलत के भेद को पहचान लेती है। लेकिन आज के तकनीकी युग में धोखे पहचानना काफी कठिन होता जा रहा है, सो उचित ये ही है कि जब तक किसी पर शक की कोई बड़ी वजह नहीं हो आप सकारात्मक रहिये, विश्वास कीजिये लेकिन एक सीमा तक। लक्ष्मण रेखाएं बनाना नकारात्मक सोच नहीं स्वयं की छल से सुरक्षा है।

तो सार रूप में ये कह सकते हैं कि सकारात्मक सोच प्रत्येक परिस्थिति और वस्तु को देखने का तरीका मात्र है, जहाँ हम ये प्रयास करते हैं कि उस स्थिति, वस्तु या व्यक्ति का सबसे उचित प्रयोग किया जाए। जिसे करते समय किसी अन्य को मानसिक या शारीरिक कष्ट ना हो रहा हो और अधिकाधिक लोगों को उससे लाभ हो।

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