Saty Aur Ishwar (Truth and God) (Hindi)

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We live a false life. For home, office, relatives, God... everybody we have different personality and we consume a big part of life and mind for it and then start seeking who am I in actual. Why? Living a simple and truthful life is this much hard? Kindly read and watch the below video, which is related to what I want to convey.

सत्य और ईश्वर प्राप्ति...

सत्यं शिवं सुन्दरं। अर्थात जहाँ सत्य है वहीं शिव (ईश्वर) है और जहाँ ईश्वर है वहाँ कल्याण है, सुंदरता है, शांति है। अतः अगर जीवन में सत्य नहीं है, तो लाख भक्ति के बाद भी हमें ईश्वर नहीं मिल सकता। हमारी सारी भक्ति वास्तविकता में एक ढकोंसला है।

हम चाहते हैं कि हमें ईश्वर की कृपा प्राप्त हो और उसके लिए हम उसका अपने समयानुसार एवं सामर्थ्यानुसार भजन-पूजन भी करते हैं। ज्ञानी लोग तो कहते हैं कि कलियुग में एक बार सच्चे मन से ईश्वर का नाम ले लिए तो ही मोक्ष मिल जाता है, अर्थात ईश्वर की प्राप्ति हो जाती है। पर एक बार सच्चे हृदय से पूछिए कि क्या वाकई आप मोक्ष चाहते हैं? सिर्फ ईश्वर से मिलना चाहते हैं? क्या हो अगर आपको पता चले कि ईश्वर है तो सही, पर वो सिर्फ आपकी मोक्ष की कामना को ही पूरा कर सकता है, शेष दुःखों को दूर करने के लिए और इच्छाओं को पूरा करने के लिए तो अच्छे कर्म ही करने पड़ेंगे... तो भी क्या आप उसी प्रेम से अपने ईश्वर को भज पाएंगे? या कर्म प्रधान हो ईश्वर की पूजा, साठ पार शुरू करेंगे?

आज चाहे कोई सत्य स्वीकारे या नहीं, पर सच ये ही है कि इंसान इतना लोभी हो चुका है कि बिना अपना फ़ायदा जाने वो ईश्वर को भी नहीं भजेगा। अब या तो ईश्वर का भजन इसलिए होगा कि वो सर्वशक्तिमान गुस्सा न हो जाए, या इसलिए कि वो आपकी परेशानी हर ले, या फिर कम से कम इसलिए कि एक आस्था और विश्वास है जिसके भरोसे जीवन गुजर जाता है, या फिर इसलिए कि कोई है जो खुश होकर एक बेहतर जीवन दे सकता है।

तो फिर आप ही सोचिये कि हम तो पूजा भी स्वार्थ और पूर्वाग्रहों से ग्रस्त होकर करते हैं, भगवान् जो सब जानते हैं... उनसे भी झूठ बोलते हैं। माता-पिता, भाई-बहिन,पति-पत्नी, बच्चे, मित्र, क्या इन रिश्तों को भी हमेशा कुछ पाने की आस रखकर निभाया जाता है? जवाब है नहीं। हाँ, कभी-कभी कुछ पाने की लालसा तो हर रिश्ते में होती है, पर हमेशा नहीं। जहाँ बात अधिकार की होती है, वहाँ कर्त्तव्य भी होते हैं और ये निःस्वार्थ भाव से ही पूरे करने होते हैं।

कुछ ऐसा ही रिश्ता भक्त और भगवान् का भी है। हाँ भगवान् हैं और सहायता भी करते हैं, लेकिन उन्हें भी अच्छा लगता है जब कोई कुछ नहीं मांगता और बस निःस्वार्थ भाव से अपने प्रभु के चरणों में बैठा रहता है... उनकी और उनकी बनाई प्रकृति की सेवा करता है... अपने कर्म करता है और सत्य की शरण में चला जाता है।

अब बस प्रश्न ये है की क्या मनुष्य औपचारिकताओं से ऊपर उठ कर सदा सत्य का साथ दे सकता है? बात को संक्षेप में अंत करते हुए, कुछ विषय जहाँ हम सभी झूठ बोलते हैं, उन्हें लिखना चाहूंगी, साथ ही कल मैंने एक वीडियो देखा जो काफी प्रेरक था उसे भी शेयर कर रही हूँ।

१) व्यापार में, सामने वाला ना ठग ले ऐसा सोच कर कुछ बातें छिपाना या गलत बताना।
२) टैक्स चोरी के लिए गलत आंकड़े देना।
३) की हुई गलती को छिपाना और छिपाने के लिए रिश्वत देना या लेना।
४) किसी को अपनी गलत वित्तीय स्थिति बताना, सिर्फ उधार लेने, चोरी या अधिकारी के भय से।
५) अपने परिवार को चलाने के नाम पर झूठ बोलकर या झूठ रच कर दूसरे को ठगना।
६) पारिवारिक औपचारिकताओं के चलते किसी को नापसंद करते हुए भी उससे दिखावा करना।
७) केवल औपचारिकतावश किसी की आवभगत करना या अति-उत्साह दिखाना।
८) मंदिरों में जाकर भगवान् का सबसे सच्चा भक्त होने का दिखावा करना और भगवान् को रिश्वत खिलाना या काम नहीं बनने पर उस पर से विश्वास ही हटा लेना।
९) बजाये एक भगवान् को भेजने के, उसके अनेक रूपों की पूजा करना, हर रूप से अलग मांग करना और किसी की स्तुति नहीं करने पर उसके गुस्सा हो जाने के भय से उसे पूजना।
१०) और सबसे बुरा किसी भी रिश्ते में बेवजह झूठ बोलना।

जब तक जीवन में पूर्वाग्रह हैं, हम एक व्यक्तित्व के ना होकर दोहरी मानसिकता के शिकार हैं, स्वयं क्या चाहते हैं ये ही नहीं समझ पाते, तब तक ये झूठ चलता रहेगा, वाणी में शक्ति नहीं आ पायेगी और ईश्वर पुकार नहीं सुन पायेगा। पूरे जीवन में अगर सिर्फ हमने असत से सत (झूठ से सत्य) की ओर जाने के मार्ग पर कदम बढ़ा दिए तो एक दिन ईश्वर मिलन और समस्त इच्छाओं की पूर्ति तय है।

क्या ये जीवन आसान न होता अगर कोई यहाँ झूठा ना होता। बच्चे से मन के सब साफ़ होते, गलतियों पर मन से सब माफ़ होते, गाँव सा सीधा होता जो जीवन हमारा, रिश्तों के भंवर ना होते, लगता संसार प्यारा। कभी सोच कर देखिएगा, अगर आप गलत नहीं हैं, सच्चे हैं तो जो वाणी में आपके शक्ति होगी वो ईश्वर की कृपा ही होगी। मैं खुद भी जब ये लिख रही हूँ तो झूठ से भरी हुई हूँ और ऊपर लिखे हर तरह के झूठ में कहीं न कहीं फँसी हुई हूँ... पर हाँ कुछ सच्चे लोगों की वाणी की शक्ति देखी है और अब सत्य के पथ पर चलना चाहती हूँ... ईश्वर मुझे सफलता दिलाये।

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