Stri-Purush Sanvaad (Hindi)

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It is human nature to find out everything's development journey... Sometimes with clues and sometimes with imagination... So here is the fictitious social development journey of behavior between Man and woman, in a form of a drama or dialog.

स्त्री-पुरुष संवाद ------ ये एक काल्पनिक लघु परिदृश्य है, जिसका किसी भी ऐतिहासिक या पौराणिक घटना से कोई सम्बन्ध नहीं है। ये बस मेरे विचारों का नाट्य रूपांतरण है।

तो बात उस समय की है, जब ब्रह्मा जी ने प्रकृति के विकास और संतुलन के लिए मानव की रचना की। पुरुष और स्त्री को बनाया और उनको कहा कि आपसी सामंजस्य से जीवनयापन करें। तो पुरुष और स्त्री ने संवाद शरू किया ---

पुरुष - हे देवी! मैं पुरुष अपने पौरुष, अर्थात परिश्रम और योजना से, आपके लिए प्रकृति प्रदत्त समस्त संसाधनों से धरती पर रहने और जीवनयापन करने की उत्तम से उत्तम व्यवस्था करूँगा।

स्त्री - हे देव! मैं भी वचन देती हूँ कि मैं भी अपने स्त्री धर्म का पालन करते हुए उस स्थान को अपनी रचनात्मकता और आयोजन क्षमता से स्वर्ग सा विकसित करुँगी और आपके साथ धर्मपूर्वक जीवनयापन करुँगी।

पुरुष - हे देवी! मैं आपको प्रसन्न करते हुए, आपकी सहमति से, आपके साथ योग द्वारा अपनी ऊर्जा को आपमें स्थापित करूँगा।

स्त्री - देव! प्रेम से परिपूर्ण हो मैं भी उस ऊर्जा को धारण कर, अपनी ऊर्जा का उसमें समावेश कर, ब्रह्मा द्वारा रचित प्रकृति के विकास में अपनी भूमिका निभाऊंगी।

पुरुष - हे देवी! मैं आपको वचन देता हूँ कि धरती पर मैं आपके और आपके द्वारा उत्पन्न मेरी संतानों के भरण-पोषण की समस्त व्यवस्था करूँगा।

स्त्री - हे देव! मैं भी आपको वचन देती हूँ कि आपके द्वारा परिश्रम से संग्रहित वस्तुओं से मैं स्वयं संतुष्ट होऊंगी और आपको और आपके द्वारा उत्पन्न मेरी संतानों को भी संतुष्ट रखूंगी।

पुरुष - हे देवी! मैं आपको और हमारी आने वाली संतानों को पूर्ण सुरक्षा का वचन देता हूँ। मैं आप सभी की सुरक्षा के लिए दैवीय, शारीरिक और प्राकृतिक बाधाओं से बिना डरे युद्ध करूँगा और उनसे सुरक्षा हेतु योजना बनाऊँगा।

स्त्री - देव! मैं भी आपके बाहर जाने पर आपके सकुशल लौटने के लिए ईश्वर से प्रार्थना करुँगी और आपके पीछे से हमारी संतानों को सुरक्षा प्रदान करुँगी। मैं सदैव बाधाओं से बचने की युक्ति खोजुँगी और ईश्वर से सभी की सुरक्षा के लिए प्रार्थना करुँगी।

पुरुष - हे देवी! मैं वचन देता हूँ कि ब्रह्मा द्वारा प्रदत्त समस्त गुणों में से आपकी सुरक्षा और उत्तम जीवन व्यवस्था हेतु मैं पुरुषार्थ अर्थात शक्ति, साहस, ढृढ़ता, बुद्धि, विवेक, धर्म ज्ञान आदि गुणों का स्वयं में विकास करूँगा।

स्त्री - हे देव! मैं भी आपके और आपके परिवार की व्यवस्था सुचारु रूप से बनाये रखने के लिए अपने में रचनात्मकता, सृजनशीलता, सौम्यता, प्रेम, त्याग, संतोष, वाक्पटुता, धर्म ज्ञान आदि गुणों को धारण करुँगी।

पुरुष - हे देवी! मैं सदैव आप पर विश्वास रखुँगा और धर्म सम्मत प्रत्येक कार्य में अपने साथ आपको अपने साथ रखूँगा।

स्त्री - हे देव! मैं अपने प्रेम से उस विश्वास को पूर्णता प्रदान करुँगी और अपनी संतानों में आपके अनुरूप संस्कारों का और धर्म का विस्तार करुँगी।

पुरुष - देवी! आपके समस्त गृहस्थ कार्यों में एवं संतानों के विकास में मैं पूर्ण निष्ठा से आपका यथासंभव साथ निभाऊँगा और आपके अभाव में आपके समस्त कार्यों को निष्पादित करूँगा।

स्त्री - देव! आपके और आपकी संतानों के उत्तम स्वास्थ्य के लिए मैं सदैव प्रयासरत रहूंगी और आपकी अस्वस्थता या अभाव में आपके समस्त दायित्वों का वहन अपनी पूरी निष्ठा से करुँगी।

अब वे धरती पर आये और वंशवृद्धि शुरू की। शनैः-शनैः समय का पहिया घूमा और मानव सभ्यता विकसित होते-होते आज के युग तक पहुँच गई। पुरुष के साहस ने उसमें अहंकार और क्रोध को जन्म दे दिया। वो सब कुछ बल से पा लेना चाहता था। जीवन संगिनी स्त्री को स्वयं से तुच्छ मानने लगा क्यूंकि उसने तुलना केवल उन्हीं गुणों की करी, जो उसमें थे। उसने स्त्री से कहा --

पुरुष - नारी! तुझे मेरी अधीनता स्वीकार करनी ही होगी क्योंकि मुझमें तुझसे ज्यादा बल है, मैं बुद्धिशाली हूँ और मैं ही तेरे उपभोग के लिए विभिन्न वस्तुएं ला-लाकर तुझे देता हूँ।

स्त्री - मैं मानती हूँ कि बल में आप मुझसे आगे हैं किन्तु जिस अन्न से आपको वो बल मिलता है, वो तो आपके भोजन योग्य मैं ही बनाती हूँ। आप बुद्धिशाली हैं तो मैं भी तो रचनात्मक हूँ। आप तर्कशील हैं तो मैं भी वाक्पटु हूँ। आप वस्तुएं लाकर देते हैं तो मैं भी तो उन्हें आपके उपभोग योग्य बनाती हूँ।

पुरुष - स्त्री! ये ही तो तुम्हारी समस्या है, तुम हर बात में बहस करती हो। अधर्म फैला रखा है तुमने। बोलने से पहले तोलती नहीं हो। इतना तो सोचो तुम नहीं करोगी तो कोई और करेगी... पुरुष हूँ, मैं हूँ तो तुम्हारा अस्तित्व है, मैं बलशाली हूँ, देश-विदेश सब घूमता हूँ, अपना ज्ञान बढ़ाता हूँ, तुम्हारी तरह एक चारदीवारी में बैठा नहीं रहता।

स्त्री - माना कि मेरी चारदीवारी ही मेरी दुनिया है, पर मैं धर्म सम्मत आपके हर कार्य में आपके साथ खड़ी रहती हूँ। आपके परिवार में संस्कार देती हूँ और सभी के उत्तम जीवन के लिए प्रार्थना भी करती हूँ।

पुरुष जानता था कि स्त्री दुर्बल नहीं है और समय आने पर अपने परिवार की सुरक्षा के लिए चंडी रूप भी बन सकती है और तब उससे ज्यादा उग्र कोई नहीं हो सकता। किन्तु वो स्त्री की बातों से ये समझ गया कि वो आज भी सहयोगात्मक व्यवहार कर रही है और धर्म की बात कर रही है। स्त्री वाक्पटु है इसलिए बोलने में उसे हराना आसान नहीं। सो उसने अपने बुद्धिशील मस्तिष्क से युक्ति निकाली कि अगर वो स्त्री के लिए धर्म को एक बंधन बना दे, तो वो उसी में उलझ कर रह जायेगी, साथ ही उसे स्त्री को दुर्बल भी करना होगा ताकि वो स्त्री कभी भी पुरुष पर हावी ना हो पाए। ऐसा विचार करकर पुरुष स्त्री से बोला --

पुरुष - हे नारी! तुमने सत्य ही कहा तुम तो मेरी पूरक हो, किन्तु क्या तुम्हें याद नहीं कि तुमने कहा था कि पुरुष के पीछे से तुम उसके समस्त कर्तव्य पूरे करोगी। मैं देश-विदेश जाता रहता हूँ सो ईश्वर भजन नहीं कर पाता। क्या तुम मेरे भाग की पूजा भी करने को तैयार हो?

स्त्री ने हाँ में सिर हिलाया।

पुरुष - ईश्वर आजकल रुष्ट हैं हमसे, इसीलिए मैं भली प्रकार जीविकोपार्जन नहीं कर पा रहा हूँ। तुम्हें उन्हें प्रसन्न करने के लिए अब कुछ व्रतोपवास करने पड़ेंगे। और हाँ मुझे पता है तुम उतनी शुद्धता नहीं रख पाओगी जितनी मैं रखता हूँ। तुम्हें बच्चों को भी तो देखना होगा, फिर गृहस्थी के भी बाकी कार्य होंगे। मुझे नहीं लगता की तुम कर पाओगी मेरे कहे अनुसार, पर अगर कर लिया तो ईश्वर प्रसन्न हो जायेंगे।

स्त्री धर्म के नाम पर बातों को घुमाकर कहे गए झूठ को नहीं समझ पाती और स्वीकारोक्ति दे देती है। कुछ समय पश्चात --

पुरुष - हे नारी! तुम मेरा इतना कार्य करती हो, क्या तुम्हें नहीं लगता कि तुम्हारे कार्य के लिए एक सहायिका होनी चाहिए। अगर तुम उचित मानो तो मैं एक स्त्री और ले आता हूँ तुम्हारी सहायता के लिए। ऐसा करने से मैं तुम्हें अधिक समय दे पाऊंगा।

स्त्री दुबारा प्रपंच नहीं समझ पाती और मान जाती है। कुछ समय पश्चात --

पुरुष - हे नारी! तुम्हें पता है वो दूसरी नारी तुमसे अधिक गुणवान और रूपवान है, अब अगर मेरा मन उसकी और झुक रहा है तो इसमें मेरा क्या दोष है... तुम भी अन्य कार्यों से अधिक प्राथमिकता अपने सौंदर्य को दो। अंततः तुम्हारा जन्म ही इस धरती पर मुझे प्रसन्न रखने के लिए हुआ है। ईश्वर के बाद मैं ही तुम्हारा सर्वेश्वर हूँ, ईश्वर की ही भाँती तुम्हारा पालनहार हूँ। मैं तुम्हारा विष्णु हूँ इसलिए तुम बस मेरे घर की लक्ष्मी ही बनी रहो।

पुनः कुछ काल पश्चात --

पुरुष - तुम धर्म से अनभिज्ञ हो, मैं देश-विदेश सब जगह घूमा हूँ। सिर्फ मैं जानता हूँ कि उचित-अनुचित, धर्म-अधर्म क्या है और तुम्हारे लिए मैं उसे ग्रन्थ में लिख दुँगा और तुम्हें उसे निभाना होगा। और एक बात मैं ईश्वर हूँ ना... सो मैं सबकुछ करने को स्वतन्त्र हूँ। मुझे सौ बातें देखनी पड़ती हैं दुनिया में, और तुम्हारी जाति की रक्षा का वचन निभाने के लिए ही मैंने अनेकों स्त्रियों से विवाह किया है, क्या तुम नहीं जानती ईश्वर ने भी ऐसा किया था। अतः यह धर्म सम्मत है।

पुनः कुछ काल पश्चात --

पुरुष - नारी! तुम ज्ञान की बात मत करो। वो तुम्हारे लिए ना तो उचित है ना ही तुम पर शोभता है। तुम कोमलांगी हो... सौंदर्य की बात करो। तुम्हारा कामुक होना ही तुम्हारे ईश्वर यानि मुझे सुहाता है। और अगर घर में मैं संतुष्ट नहीं हुआ तो बाहर स्वयं को संतुष्ट करूँगा क्योंकि मैं संतुष्ट हो पाऊंगा तभी तो तुम सबको प्रसन्न रखूँगा।

पुनः कुछ काल पश्चात --

पुरुष - तुम धर्म का ज्ञान मुझ पर छोड़ दो, पढ़ने की तुम्हें कोई आवश्यकता ही नहीं। रहना तुम्हें चारदीवारी में ही है, फिर ज्ञानार्जन पर समय और धन क्यों व्यय करना?... धर्म मैं तुम्हें बता दुंगा और तुमने कहा ही था कि तुम मुझ पर सदा विश्वास करोगी। तुम बस अपने सौंदर्य पर ध्यान दो और गृहस्थी तो है ही। बच्चे घर पर रहते हैं सो तुम ही सम्भालो। मेरे पास बाहर का भी बहुत काम है।

स्त्री - किन्तु बच्चे तो हम दौनों की जिम्मेदारी थे ना...

पुरुष - चुप... तुम अज्ञानी हो और धर्म वही है जो मैं कहता हूँ। तुम वही मानोगी और अपने बच्चों को भी वही सिखाओगी। अगर लड़का हुआ तो मुझसा महान और लड़की हुई तो उसे गृहस्थी का कामकाज सिखाना।

पुनः कुछ काल पश्चात --

पुरुष - मुझे मुझ जैसा महान पुत्र ही चाहिए, अगर पुत्री हुई तो मैं उसका अंत कर दूंगा। और हाँ, ये ही धर्म है।

इन सभी से त्रस्त एक ऐसे समाज की रचना होने लगी जहाँ अनेकों कालों तक स्त्री ने आवाज नहीं उठाई। अत्याचार बढ़ता गया और वो पीढ़ी-दर-पीढ़ी उसे सहती रही। पुरुष को भगवान् मानते-मानते वो धर्म की व्याख्या ही भूल गई और उस अधर्मी के कहे अनुसार अधर्म करने लगी। स्वयं अपनी जाति पर अत्याचार करने में पुरुष का साथ देने लगी। बजाय सच को समझने के इस अत्याचार को ईश्वर रूपी पुरुष द्वारा तय की गई अपनी नीयति मानने लगी। वो आज इतनी असहाय हो चुकी थी कि चाह कर भी स्वयं के बल पर कुछ नहीं कर सकती थी। पुरुष वर्चस्व इस सीमा तक बढ़ चुका था कि अगर कोई स्त्री आवाज उठाती तो उसे नष्ट कर दिया जाता। वो मात्र एक मनोरंजन का साधन बन गई थी और गृहलक्ष्मी का स्थान मात्र गृहस्थी संभालने और बच्चों के लालन-पालन तक सीमित हो गया था।

इसका एक दूसरा पहलू भी था...

अब स्त्री जब पढ़ना-लिखना नहीं जानती थी तो अगली पीढ़ी को भी उचित धर्म, संस्कार और ज्ञान देने में असमर्थ रहने लगी। पुत्र जब बचपन से स्त्री के साथ होते दुर्व्यवहार (जिसे स्वयं स्त्री भी सही ठहराती थी) को देखता तो उसे ज्ञान और शक्ति में से बस शक्ति में ही रास आता। सो धीरे-धीरे पुरुष का ज्ञान और बुद्धि-कौशल भी कम होने लगा। उसे पुनः स्त्री की याद आई कि स्त्री उसकी ऐसी सेविका है जो उसकी आज्ञा से सब कर देती है। बस कभी प्यार से और कभी मार से बात करनी पड़ती है।

सो उसने पढ़ाई का महत्त्व स्त्री को बताया और उसे पढ़ने-लिखने के लिए तैयार किया। जब स्त्री पढ़ गई तो उसने सोचा कि मैं क्यों दिन-रात मेहनत करूँ, स्त्री भी तो मेरे लिए धन कमा कर ला सकती है... और अब तो वो पढ़-लिख भी गई है सो काम भी अच्छे से करेगी। उसने अपने प्रेम और विवशताओं का वास्ता देकर स्त्री को चारदीवारी से बाहर निकल कमाने के लिए भी तैयार कर लिया।

अपनी शक्ति के मद में चूर वो बुद्धिहीन पुरुष ये भूल गया कि बुद्धिमान स्त्री के लिए शक्ति प्राप्त करना कोई बहुत बड़ी चुनौती नहीं होगी और अब वो बुद्धि से सोच कर निर्णय ले पाएगी, पुरुष द्वारा कही हुई बात अक्षरशः मानने के लिए बाध्य नहीं होगी।

स्त्री ने पढ़कर अपनी अगली पीढ़ी को भी पढ़ाया और सही गलत का भेद बतलाया, जिससे नवीन पुरुष जाति की मानसिकता में भी बदलाव आने लगा। पुनः स्त्री-पुरुष में सही सामंजस्य बनने लगा। पर अब कुछ बदलाव आ गए थे। स्त्री गृहस्थी के साथ-साथ बच्चे और बाहर का काम भी संभालने लगी थी, जो उसे स्वतंत्रता और शक्ति तो दे रहा था, पर उसे अत्यधिक व्यस्त कर रहा था। वो स्त्री अब इतने सारे कार्यों और पुरुष के विलासी जीवन से व्यथित हो रही थी। पुरुष जो सब कुछ स्त्री को सौंप चुका था, कोई विशिष्ट गुण नहीं होने के कारण व्यर्थ जीवन जी रहा था। स्त्री इतने कालों की दासता से मुक्ति की ख़ुशी मनाने के लिए पुरुष सा विलासी जीवन चाह रही थी और गृहस्थी से लेकर, बच्चों से लेकर बाहर तक के समस्त कार्य पुरुष से करवाना चाहती थी... बल से भी और बुद्धि कौशल से भी... वाक्पटुता से भी और अपने कामुक सौंदर्य से भी...

सही-गलत तो ईश्वर जाने... पर हाँ, प्रकृति है तो चलती ही रहेगी और चलता ही रहेगा ये स्त्री-पुरुष संवाद...

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