Darpan Men Tum Nazar Aaye... (Hindi)

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:: What was in my mind ::
When I saw mirror... I remembered God... God and mirror have a lot of similarities... And I went deep in my imaginations of God's figure and wrote this composition.

दर्पण में तुम नज़र आये...

हे प्रभु! देखा जो दर्पण तो तुम नज़र आये,
प्यारी सी मूरत में तुम मुस्काये,
मेरी सूरत में तो ढूँढ न पाई तुमको,
पर दर्पण को देख नव-विचार मन में आये।

दर्पण धवल से भी धवल, मुझको सब कुछ दिखाए,
झूठ नहीं बोले, मेरी सच्ची सूरत बताये,
कहीं दिखे ब्रह्माण्ड उसमें, लगे सबकुछ समाये,
फिर भी दर्पण श्वेत नहीं, श्याम वर्ण कहलाये।

तुम भी श्यामवर्णी कृष्ण! करते सबको आकर्षित,
तुम्हें देख जन खुद को पा जाते, होते सभी हर्षित,
तेरे मुख भीतर भी है ब्रह्माण्ड समाया,
कहीं दर्पण सा रूप तो तूने नहीं पाया?

तुम्हारे ही सम दिखती, सबकी सूरत उसमें,
जैसा रूप बनाकर देखो, वैसा ही दिखे उसमें,
ना कभी तुम डिगे सत्य से, ना कभी दर्पण झूठ बोले,
जो जैसा हो और जितना हो, बिल्कुल बराबर ही तोले।

हे श्याम! तुम्हारा रंग साँवला, फिर भी निराला,
कहीं वो पारद सा तो नहीं था, जो चमके आला-आला,
पारद का आकार कुछ नहीं, सब द्रव्यों में वो भारी,
एक ही पल में पारद में मुझे तेरी खूबी मिलीं सारी।

आ जाओ श्याम! अब देओ बतलाये,
कैसी सूरत थी तेरी जो सबके मन को भाये,
एक बार आकर तुम मेरे ये सारे भ्रम मिटा दो,
आओ आओ श्याम अब अपनी सूरत तुम दिखा दो...
... आओ आओ श्याम अब अपनी सूरत तुम दिखा दो।

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