Kyun na main tar jaun... (Hindi)

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:: What was in my mind ::
In childhood we listen many stories and conclude the things in a very different manner... We were innocent at that time... have different angles to look the world around. We always think why elder people don't take things as easily as we do... why they fight... why they believe they are away from God... why they fear from death if it is a truth and a path to meet God once again. ... And a lot more different questions.
I still think why we are not as simple as we were in our childhood. Here I am putting a poetry from my childhood... "A few queries about meeting with God." Hope you like it...

क्यूँ न भव से मैं तर जाऊँ...

पूर्वजन्म की बात ना जानूँ,
सच है मैं तुझको नहीं पहचानूँ,
लेकिन क्यूँ नहीं मैं तर पाऊँ,
एक जनम जो हरि नर का पाऊँ...

पशु, पाषाण या कि होऊँ पत्ता,
चल नहीं पाये तब मेरी सत्ता,
पर नर देह बुद्धि है तेरी,
जिससे नर ने किस्मत फेरी,

क्यूँ नहीं फिर उस पर इतराऊं,
भाग्य बदल मैं तुझको पाऊं,

गणिका और अजामिल तारे,
नाम लिए से कष्ट निवारे,
वो हरि नाम क्यूँ मैं ले नहीं पाऊँ,
क्यूँ नहीं भव से मैं तर पाऊँ,

हे हरि! हम तुझमें हैं समाये,
तुझसे बाहर जा भी नहीं पाये,
जब तेरी ही माया और तुझको ही पाना,
तो फिर क्यूँ जन्मों का बहाना,

हे हरि! जो ऐसा हो जीवन,
नाम लेण को तरसे ये मन,
माया वश तुझको बिसराऊँ,
पर मृत्यु परे तो तुझको ही पाऊँ,

क्यूँ इस जनम में मैं तर नहीं पाऊँ,
क्यूँ इस जनम में मैं तुझे नहीं पाऊँ।

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