Prayer to Goddess Durga :: 2 (Hindi)

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:: What was in my mind ::
Oh Goddess Durga!! Everything in this world... is already yours... then what is that which I can devote you. Even my mind, body, soul all are yours... So let me devote myself my mother... Be mine and let me be yours....

हे माँ तुझे चढाने को मैं फूल कहा से लाऊँ,
ऐसा क्या मैं दूँ तुझे मैया, जिसको अपना बताऊँ,
जग की हर वस्तु है तेरी, तो क्या, तेरा तुझे समर्पित,
क्या है कुछ भी ऐसा जग में, जो कर पाऊँ मैं अर्पित,

हे मेरी माँ! वैसे तो ये तन-मन-धन सब है तेरा,
तेरी बुद्धि से ही बनी पापी, तो कभी किया जग में उजेरा,
तो हे मेरी माँ! ये उपज थी मेरी, करती आज समर्पित,
मेरा पाप-पुण्य सब तेरा, तेरा तुझको अर्पित।

हे माँ! कल्पना से ही मैंने जाना, कि तू दिखती है कैसी,
तो करती कल्पना आज समर्पित, मिल जा मुझको वैसी,
जहाँ कल्पना चल ना पाई, वहां जिज्ञासा थी मैंने लगाई,
नरक-स्वर्ग सब दिखे उसी से, सो आज उसे भी लाई,
मेरी जिज्ञासा, ज्ञान-अज्ञान ये मेरा, करती तुझको अर्पण,
विनय और बड़े प्रेम भाव से, स्वीकार करो ये समर्पण।

हे माँ! इच्छा उपजी भीतर, जिसने मुझे फंसाया,
कभी काम बन, कभी क्रोध बन, मन को खूब नचाया,
कभी सौंदर्य बोध ने बांधा, कभी ये मन ललचाया,
तो कभी ख़ुशी ने खिला-खिला के तुझसे दूर कराया,
तो हे मेरी माँ! उस काम-क्रोध को भी करती आज समर्पित,
कभी ये तुझसे मिलन का कारण, कभी करता मुझको गर्वित।

हे मेरी मैया! वैमनस्य ही था मेरा, भीतर से मुझको काटे,
तू बाहर थी खड़ी द्वार पे, पर ये मुझको था बांटे,
तो हे मेरी माँ! करूँ आज समर्पण, मेरे सारे द्वेष और बैर,
तू भीतर अब आजा मैया, धर हृदय में पैर।

ध्यान, इच्छा, बुद्धि, जिज्ञासा, और मेरा सब ज्ञान,
हे माँ! करती आज समर्पण मेरा सारा मान,
सारी कलाएं थीं दी तूने मुझे, मैंने कर दीं विकृत,
पुनि करती हूँ आज मैं अर्पित, कर दे उनको सुकृत।

हे मेरी माँ! नहीं फूल हैं कोई, बस कांटे हैं मेरे पास,
इन्हीं काँटों को करके अर्पित, है मिलन की मेरी आस,
सबसे बड़ा कांटा मेरा 'मैं' है, नहीं होता ये ही समर्पित,
मुझे अपना जान तू खुद से ले ले, कर ले इसे भी अर्पित।

माँ! सब कांटे दूर कर मेरे, मन में मेरे आजा,
हर बुराई का नाश तू कर दे, पावन इसे बना जा,
जब हो पावन, तो क्यों जाना, यहीं तू कर ले बसेरा,
मेरा तन-मन सब हो जाये तेरा, तो हो जीवन में सवेरा।

हे मेरी माँ! अब आजा भीतर,
स्वीकार पूर्ण समर्पण मेरा,
पावन कर और पावन ही रख,
अब ये घर है तेरा… अब ये घर है तेरा।

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