Hum Paudhe (Hindi)

0 Comment(s)
810 View(s)
|

:: What was in my mind ::
In my childhood, I wanted to grow-up early, just as all children do. And now when I think about my childhood, upbringing and sweet and bitter life experiences, I still feel an incompleteness, want to live my innocence childhood again. May be bitter life is necessary to gain experiences and growth for the family, but something pinches me inside or I can say to everybody...

खरपतवार की तरह उगे हुए थे
हम जंगल के पौधे,
मज़ा बड़ा था, बस डरते थे,
कोई हमें नहीं रौंदे,
उस खुले अल्हड़ बचपन को हटा
किसी ने सभ्यता सिखलाई,
हाँ, निखारा व्यक्तित्व को मेरे
और नई जमीन दिखलाई,
आज सभ्य हूँ, सही जगह हूँ,
देती आश्रय सबको,
पर वो मासूमियत-अल्हड़ता चली गई,
ढूंढ़ रही मैं जिसको,
पूर्णता तो कभी नहीं थी,
बस तब था अबोध मन प्यारा,
अब संकटों से झूझता सा जीवन,
जग कहता इसे अनुभव हमारा।

 0
 0
0 Comment(s) Write
810 View(s)



0 Comments: