Maine Chod Diya... (I left...) (Hindi)

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:: What was in my mind ::
When I was reading some of the recent news related to women molestation that how freely and confidently the criminals on higher positions or with riches are committing crimes and how common girls are surviving in search of justice and support from society and how some politicians are forgetting the original case and doing unnecessary politics on it.... I felt ashamed of my birth in India... A country with no moral values today... a country with no justice on time for the common man... a country of poor and corrupt management... a country with open crime...
I looked around and saw girls are insecure, frightened, cursing society... they changed their natural behavior and I wrote this dedicated to all girls.

मैंने छोड़ दिया पतंगों को लपकना,
कि चंद लड़के पतंगों से ज्यादा मेरी छलांगों को देखने लगे थे,
मैंने छोड़ दिया खुलकर खिलखिलाना,
कि चंद होठ उसे देख अजीब सी शक्लें बनाने लगे थे,
मैंने छोड़ दिया छत पर गाने गुनगुनाना,
कि पड़ोस के लड़के बिन चाहे करने लगे थे तारीफ़ उसकी,
मैंने छोड़ दिया नज़रें मिलाना,
कि समझना ही नहीं चाहती थी मैं उनकी नापाक शक्लें,
मैंने छोड़ दिया बिना चुन्नी के सड़क पर जाना,
कि चंद घूरती निगाहें अजीब लगती थीं मुझको।

क्यों कल तक जो कर कर ख़ुशी मिलती थी मुझे,
आज वो हरकतें करते हुए, मैं देखती हूँ चारों तरफ,
क्यों आज अपनी खुशी से पहले डर जाती हूँ,
कि कोई आँखें देख न लें मुझे यूँ खुशियाँ मनाते,
पता नहीं वो कौनसा अनजाना साया डराता है,
वो कौन है जिससे छुपती फिर रही हूँ मैं,
चंद अखबार की ख़बरें हैं या परिवार की नसीहतें,
जो डरा देती हैं मुझे रोज़ाना,
वो जो भी हैं... पर अब इतना तो मैं समझती हूँ,
कि मेरा अपना देश मेरे लिए सुरक्षित नहीं है।

यहाँ न्याय की देवी के घर में अंधेर भले ही न हो,
पर देर अवश्य है...
गुनहगारों के मन में डर नहीं,
पर बच जाने का यकीन है।
नेता को नेतागिरी से और बलवान को दादागिरी से,
फ़ुरसत ही नहीं...
और सफेदपोशों के काले हाथ अंधों को दिखते ही नहीं।
वैसे किसी को यहाँ किसी दूसरे के फटे में हाथ नहीं देना,
लेकिन आँख, कान और मुँह वहीं घुसाए रखने हैं।
धृष्ट से लेकर भ्रष्ट तक सब मौसी के लड़के हैं,
और बिना अपने उल्लू को सीधा किये कोई लाचार का सगा नहीं है।

अपनी जाति को रोज़ अखबारों में लाचारी से मरते-घुटते देख,
तिल-तिल कर जो मैं मरती-डरती जाती हूँ,
ये जो हवा खराब हो गई है मेरे देश की,
उसमें जब मैं सांस भी नहीं ले पाती हूँ,
तो ख्वाहिश रखती हूँ मैं मर जाने की,
पर फिर इसी आस में मैं जी जाती हूँ,
कि शायद अगली पीढ़ी को, मेरी सही शिक्षा की जरुरत हो,
कि शायद उसे मैं 'बल' का प्रयोग बता पाऊं,
कि शायद उसे पुरुष-स्त्री से इतर एक सजग-चेतन युवा बना पाऊं,
कि शायद आज की 'मेरी' ये ब्लेड सी ख़ामोश जंग,
आने वाली लड़कियों को एक चहकता भारत दे जाये।

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