You look, you observe, you understand. You think, you imagine, you associate. You feel, you insight and you express... In words... In writings. This is what I want to share here. So 'Feelings' are my insights, experiences and perspective to look this world and beyond. Come and feel what I was feeling....

Tree's Appeal

:: What was in my mind :: Trees are precious. They give us life, pure air, food and everything which makes our life easy. So we should also respect nature and save trees. On the occasion of World Environment Day on 5th June, here is one of my brother's childhood compositions which were prepared for school competition. I saw a tall big tree somewhere, He called me, please come here, I will tell you a story flare, Please listen me and beware...Food, cloth, home, life and air, We giv...


Darpan Men Tum Nazar Aaye... (Hindi)

दर्पण में तुम नज़र आये...

हे प्रभु! देखा जो दर्पण तो तुम नज़र आये,
प्यारी सी मूरत में तुम मुस्काये,
मेरी सूरत में तो ढूँढ न पाई तुमको,
पर दर्पण को देख नव-विचार मन में आये।

दर्पण धवल से भी धवल, मुझको सब कुछ दिखाए,
झूठ नहीं बोले, मेरी सच्ची सूरत बताये,
कहीं दिखे ब्रह्माण्ड उसमें, लगे सबकुछ समाये,
फिर भी दर्पण श्वेत नहीं, श्याम वर्ण कहलाये।

तुम भी श्यामवर्णी कृष्ण! करते सबको आकर्षित,
तुम्हें देख जन खुद को पा जाते, होते सभी हर्षित,
तेरे मुख भीतर भी है ब्रह्माण्ड समाया,
कहीं दर्पण सा रूप तो तूने नहीं पाया?

तुम्हारे ही सम दिखती, सबकी सूरत उसमें,
जैसा रूप बनाकर देखो, वैसा ही दिखे उसमें,
ना कभी तुम डिगे सत्य से, ना कभी दर्पण झूठ बोले,
जो जैसा हो और जितना हो, बिल्कुल बराबर ही तोले।

हे श्याम! तुम्हारा रंग साँवला, फिर भी निराला,
कहीं वो पारद सा तो नहीं था, जो चमके आला-आला,
पारद का आकार कुछ नहीं, सब द्रव्यों में वो भारी,
एक ही पल में पारद में मुझे तेरी खूबी मिलीं सारी।

आ जाओ श्याम! अब देओ बतलाये,
कैसी सूरत थी तेरी जो सबके मन को भाये,
एक बार आकर तुम मेरे ये सारे भ्रम मिटा दो,
आओ आओ श्याम अब अपनी सूरत तुम दिखा दो...
... आओ आओ श्याम अब अपनी सूरत तुम दिखा दो।



Nandlala Karte Hain Aguwai (Humor)

बाला ने देखा आज एक ग्वाला,
याद आया उसको ब्रज का नंदलाला।

हृष्ट-पुष्ट सुन्दर, मन-मोहन मुरली वाला,
मोरमुकुटधारी और श्यामल वर्ण निराला,
वर्ण तो श्यामल प्रभु ने इसे भी दे डाला,
पर थोड़ा दुबला था ये श्यामल रंग वाला।

मुरली नहीं थी, हाथ में था सिगरेट-तम्बाकू-मसाला,
पीताम्बर की जगह इसने तन पर पैंट-शर्ट डाला,
सुन्दर आँखों पर लगाया था रंगीन चश्मा आला,
समझ रहा था खुद को हीरो, ये उल्टी टोपीवाला।

यमुना सा बहता था इसके घर के पास एक नाला,
दूध में पानी मिला इसने था अपनी दशा को संभाला,
दिव्य रथ तो नहीं था, पर था वाहन रफ़्तार वाला,
एक घंटे में पहुँचाता था वो, बस्सी से सोडाला।

रास रचैया ना सही, रसिक मिज़ाज कम नहीं था,
हीरोइनों के पोस्टरों से उसका कमरा रंगीं था,
एक नहीं तीन-तीन को, उसने था माना राधा,
बंशी बिन अपनी सीटी से ही, उसने था ये तीर साधा।

द्वारिका ना बसाई, पर कल्पना की दुनिया थी उसकी प्यारी,
राजनीतिज्ञ न था, पर थी राजनेताओं से उसकी यारी,
मोबाइल तरंगों से ही वो था अपनी दुनिया को चलाता,
शेयर-लॉटरी-सट्टे में दिन-रात अपने दिमाग को जलाता।

उसका ये अंदाज़ देख मैं बाला मुस्काई,
आज भी करते हैं नंदलाला इस दुनिया की अगुवाई...
आज भी करते हैं नंदलाला इस दुनिया की अगुवाई।



Tere Hone Se (Hindi)

तेरे होने से...

जीवन में बहार है, लगता प्यारा ये संसार है,
मन में आशा है, इच्छा है, सपने हैं,
लगता है इस दुनिया में सभी लोग अपने हैं।

तेरे होने से...

लड़ने की ताकत है, जीतने का साहस है,
भाग्य है और भाग्य पर भरोसा है,
गलती पर क्षमा की आशा है।

तेरे होने से...

दुर्घटना से सुघटना तक और मृत्यु से अमरत्व तक,
जाने की सीढ़ी है,
तेरे होने से ही संस्कार और संस्कृतियाँ,
चलते पीढ़ी-दर-पीढ़ी हैं।

तेरे होने से...

पापियों में भय है, असत्य पर सत्य की विजय है,
अंत में बुराई का अंत है,
प्रलय के पश्चात फिर, जीवन अनंत है।

तेरे होने से...

प्रज्ञा है, विद्या है, मस्तिष्क में बुद्धि है,
और बुद्धि से परे संसार में, अनेकों सिद्धि हैं,
आकाश में तारे हैं, तो धरती पर पुष्प बहुत सारे हैं,
अण्ड से ब्रह्माण्ड और अणु से परमाणु तक रहस्य बहुत प्यारे हैं।

तेरे होने से...

प्रेम है, प्रकृति है,
और प्रकृति में सृजन और संहार की शक्ति है,
मौन है और मौन की अपनी अभिव्यक्ति है,
और उस मौन में वाक् से भी अधिक शक्ति है।

तेरे होने से...

मन में विचार हैं, कलम में धार है,
कोरे कागज़ पर होती, रंगों की बहार है,
आचार है, व्यवहार है और मन का संसार है।

ये अच्छा है कि तू है,

और अगर प्रार्थना में शक्ति है, तो हे प्रभु!
आज अपने लिए और सबके लिए,
एक यही प्रार्थना करुँगी कि तू हमेशा रहे...
सबके पास, सबके साथ...

क्योंकि हम हैं तो सिर्फ तेरे होने से...



Aao Ab Sheeghra Aao (Hindi-Poetry)

हे नाथ! ढूंढते तो तुम्हें सभी हैं,
बस सबके रास्ते अलग-अलग हैं...

कुछ को तुम सपने में देते हो दिखाई,
कुछ को तुम जागते में पड़ते हो सुनाई,
कुछ तुम्हें मंदिरों में जाते हैं ढूंढने,
कुछ की मस्जिदों में होती है सुनवाई,

कुछ को तुम ग्रंथों के पन्नों में मिल जाते,
कुछ तुमको सूली पर लटका हुआ पाते,
कुछ ढूंढते आग-हवा-पानी में तुमको,
कुछ ढूंढते संतों की वाणी में तुमको।

कल गई मैं मंदिर दिखी सूरत तुम्हारी,
पर बंद थे लोगों के नेत्र...
मन पर पड़े थे परदे भारी,

मस्ज़िद में मैंने देखा...
लाउड स्पीकर से लोगों ने पुकारा,
जैसे दूर तुम थे बैठे,
और सुनने का मन ना था तुम्हारा,

आज के मनुज ने,
तेरे कुछ कर्म अपना लिए थे,
नीति भुला दी थी तेरी,
पर कुछ अधर्म अपना लिए थे,

होली पर मैंने देखा, सब जय राधे-कृष्ण गा रहे थे,
और राधा की इच्छा के विरुद्ध, उसे छेड़े जा रहे थे,
शिवरात्रि में भांग पीकर, सारे बन बैठे तेरे बाराती,
और शरद पूनों को डांडिया में, गोपियों से रास रचा रहे थे,

जो तुमने पशु रूपी किसी असुर को था मारा,
तो आज भी उसकी बलि के पीछे था जग सारा,
जो देव रूप में तुमने कभी सोमरस पिया था,
तो उसे सुरा समझकर, मनुज उसी से जिया था,

आज का अर्जुन, 'अपने' कृष्ण की राहों पर,
अपने परिवार से ही करता है लड़ाई,
लोगों को मारकर, छल-कपट से जीतकर,
तेरी ही कही गीता की देता है दुहाई,

और वो यहाँ रुकता नहीं है...

अपने ही मुख से खुद को,
कहता तेरा पच्चीसवां अवतार,
स्वर्ण सिंहासन पर हो आसीन,
दिखाता नित-नए चमत्कार,

कहीं छल से, तो कहीं बल से, बस चाहता है
कि लोग तुझे भुला उसे भजें,
तू मूरत बन पड़ा रहे एक कमरे में,
और तेरी मुकुट-माला से वो सजें,

इसीलिए हे कृष्ण! अब और देर1



Saty Aur Ishwar (Truth and God) (Hindi)

सत्य और ईश्वर प्राप्ति...

सत्यं शिवं सुन्दरं। अर्थात जहाँ सत्य है वहीं शिव (ईश्वर) है और जहाँ ईश्वर है वहाँ कल्याण है, सुंदरता है, शांति है। अतः अगर जीवन में सत्य नहीं है, तो लाख भक्ति के बाद भी हमें ईश्वर नहीं मिल सकता। हमारी सारी भक्ति वास्तविकता में एक ढकोंसला है।

हम चाहते हैं कि हमें ईश्वर की कृपा प्राप्त हो और उसके लिए हम उसका अपने समयानुसार एवं सामर्थ्यानुसार भजन-पूजन भी करते हैं। ज्ञानी लोग तो कहते हैं कि कलियुग में एक बार सच्चे मन से ईश्वर का नाम ले लिए तो ही मोक्ष मिल जाता है, अर्थात ईश्वर की प्राप्ति हो जाती है। पर एक बार सच्चे हृदय से पूछिए कि क्या वाकई आप मोक्ष चाहते हैं? सिर्फ ईश्वर से मिलना चाहते हैं? क्या हो अगर आपको पता चले कि ईश्वर है तो सही, पर वो सिर्फ आपकी मोक्ष की कामना को ही पूरा कर सकता है, शेष दुःखों को दूर करने के लिए और इच्छाओं को पूरा करने के लिए तो अच्छे कर्म ही करने पड़ेंगे... तो भी क्या आप उसी प्रेम से अपने ईश्वर को भज पाएंगे? या कर्म प्रधान हो ईश्वर की पूजा, साठ पार शुरू करेंगे?

आज चाहे कोई सत्य स्वीकारे या नहीं, पर सच ये ही है कि इंसान इतना लोभी हो चुका है कि बिना अपना फ़ायदा जाने वो ईश्वर को भी नहीं भजेगा। अब या तो ईश्वर का भजन इसलिए होगा कि वो सर्वशक्तिमान गुस्सा न हो जाए, या इसलिए कि वो आपकी परेशानी हर ले, या फिर कम से कम इसलिए कि एक आस्था और विश्वास है जिसके भरोसे जीवन गुजर जाता है, या फिर इसलिए कि कोई है जो खुश होकर एक बेहतर जीवन दे सकता है।

तो फिर आप ही सोचिये कि हम तो पूजा भी स्वार्थ और पूर्वाग्रहों से ग्रस्त होकर करते हैं, भगवान् जो सब1



Prabhu Milan (Hindi)

हे प्रभु! स्वप्न लोक की नगरी है ये,
सुन्दर, मायावी, लुभावने वाली,
जानती हूँ सच नहीं, ये स्वप्न है,
और अंत में रह जाएंगे हाथ खाली,

पर निद्रा के वश में प्रभुजी!
बस नहीं चलता मेरा,
तुझसे मिलन मेरा हो नहीं पाता,
जब होता सुबह सवेरा,

कब तुम आते, कब चले जाते,
मुझको एहसास नहीं है,
बस रहती है शिकायत स्वप्न में,
क्यों तू मेरे पास नहीं है,

हे मुरली-मनोहर! करो कुछ ऐसा,
ये रात आने न पाए,
भोर समय मैं रहूँ जागती,
ना कोई स्वप्न सताये।

बोले श्याम - जो ऐसा हो तो,
तुम थक जाओगे दिन में,
स्वप्न ना होंगे तो उल्लास ना होगा,
फिर क्या करोगे मन में,

भोर में जब आऊँगा मैं तो,
कौन कथा बांचोगे...
कुछ रचने को नहीं जो होगा तो,
कौनसा वर सांचोगे?

जो न मिलन होगा तम-सत का तो,
दीपक कहाँ रखोगे,
जो न परीक्षा होगी तेरे मन की तो,
आगे कैसे बढ़ोगे?

जो मैं रहुँगा साथ सदा ही तो,
कौन पुकारेगा मुझको,
कैसे सुनाओगे सपनों के किस्से,
जब साथ रखोगे मुझको,

ये कर्मभूमि है मित्र ओ मेरे,
तो कर्म पड़ेगा करना,
सपनों के संग भोर का ध्यान भी,
पड़ेगा तुमको ही रखना,

फिर आऊँगा मिलन को मैं भी,
जो झड़ा होगा तेरा आँगन,
सुनुँगा तेरी सारी कथाएँ,
और करुँगा मन को पावन,

करुँगा मन को पावन,
कि तू मुझे रोज़ बुलाना,
तभी तो भक्त और भगवान् का,
बुनेगा तानाबाना।

तभी तो भक्त और भगवान् का,
बुनेगा तानाबाना।

भावार्थ शब्दार्थ :

स्वप्न लोक की नगरी = इच्छाओं से भरा संसार,
सत्य = मोक्ष,
निद्रा = माया,
सवेरा = मृत्यु और नवजीवन की शुरुआत,
प्रभु का आना = मोक्ष,
रात = मायामयी संसार,
दिन-रात = जीवन (दिन - कर्म प्रधान, रात्रि - माया, स्वप्न - इच्छा),
कथा = जीवन-वृत्तांत,
तम = इच्छाएँ - आसक्तियाँ - मन,
सत = कर्म - शरीर - वास्तविकता,1



Kis Vidhi Poojun Nath (Hindi)

किस विधि पूजूँ नाथ... आप आये मेरे द्वारे...,
मैले सारे आसन... कैसे दूँ मैं बिठा रे...

मैंने ही कहा था कल तुम आना,
साफ़ रखुँगी अपना अँगना,
पर निद्रा में स्वप्न जो आये,
मुझको दिया पीछे भगा रे...,
इँह ते उँह तक भगा-भगा के,
मुझको दिया थका रे...

भोर भई, तुम थे आने को,
अमृत वायु मिली थी मुझको,
पर पीने भर की शक्ति नहीं थी,
वो पल दिए गंवा रे...

तुम आये तो मैला था मन,
झूठे पड़े थे रात के बर्तन,
कहाँ बिठाऊँ, क्या मैं खिलाऊँ,
नैनों में अश्रु भरा रे...,

अश्रु बहे, बहा ले गए तुमको,
अब तुम पास नहीं थे,
कल तेरे आने की आस थी मन में,
हम भी निराश नहीं थे,
धुल गया था आँगन,
पावन था मन,
पर तुम चले गए थे,
कल भोर में आने का, फिर से वचन दे,
तुम मुझे छोड़ गए थे,

कभी तो ऐसा भी होगा ओ प्रभुजी!
सपनों से मैं बाहर रहुँगी,
भोर के अमृत से झाड़ कर आँगन,
तेरा ही नाम जपुँगी,
उदयकाल की मिलन वेला में,
तुझसे मिलन करुँगी,
कुछ अपनी कह, कुछ तेरी सुन,
मन में धीर धरुँगी।



Hanson Ka Joda :: The Swans (Hindi)

हंसों का जोड़ा

यूँ ही एक दिन टहलने गई जब मैं सागर किनारे,
आसमां में उड़ता देखा एक हंसों का जोड़ा।

आँखों में उमंग, पंखों में शक्ति, मन में था साहस,
उस अथाह जलराशि से टकराने का,
अठखेलियाँ करते एक-दूसरे के आगे-पीछे,
चले जा रहे थे वे निरंतर अपने लक्ष्य की ओर।

कि तभी बोझिल होने लगी हंसिनी की चाल,
ख़त्म होने लगी उसके पंखों की शक्ति,
एक पल के लिए खो बैठी वो अपनी चेतना,
और जाने लगी उसी अथाह जलराशि में विलीन होने,
जिससे टक्कर लेने का प्राण उन दौनों ने लिया था कभी...

पर जैसे ही हंस ने पाया अपनी प्रिया को काल के गाल में जाते,
रोक न पाया...
अगले ही पल एक नीची उड़ान भर,
ले आया अपनी जीवन-तरंग को अपने पंखों पर बिठा...
उड़ता रहा उसे भी अपने साथ लेकर,
बिना सोचे कि कभी तो उसकी भी हार होगी...
जब न वो बच पायेगा और न उसकी प्रिया।

तभी लौट आई उस हंसिनी की चेतना,
अपने प्रिय को अपने समीप पाकर...
भूल गई उस लील जाने वाले शान्ति के कोलाहल को,
जो निगलने को आतुर था, उस नन्हें बेज़ान पंछी को,
अपने प्रिय की बाहों ने दी उसे पूरे संसार की ऊर्जा,
और फिर चल पड़ी वह, उसी के पीछे, उसी उमंग से,
जिस उमंग के साथ उन दौनों ने शरू की थी वो यात्रा।

मैं जितनी दूर तक देख पाई, दोनो उड़ते रहे,
देते हुए एक-दूसरे को सहारा...
बनते हुए अपने साथी की शक्ति,
पता नहीं वे अपने लक्ष्य को प्राप्त कर पाए या नहीं...
पर अनायास ही मेरे हाथ जुड़ गए,
करने लगी नमन मैं उन देवदूतों को,
जिनके अगाध प्रेम की शक्ति और कर्मठता,
दे रही थी प्रेरणा सम्पूर्ण मानव-जाति को,
जो अपने तुच्छ स्वार्थ की ख़ातिर,
दूसरे को मिटाने के लिए,
ख़ुद मर-मिटने को तैयार रहती है।

इतना सोचते-सोचते ही1



Stri-Purush Sanvaad (Hindi)

स्त्री-पुरुष संवाद ------ ये एक काल्पनिक लघु परिदृश्य है, जिसका किसी भी ऐतिहासिक या पौराणिक घटना से कोई सम्बन्ध नहीं है। ये बस मेरे विचारों का नाट्य रूपांतरण है।

तो बात उस समय की है, जब ब्रह्मा जी ने प्रकृति के विकास और संतुलन के लिए मानव की रचना की। पुरुष और स्त्री को बनाया और उनको कहा कि आपसी सामंजस्य से जीवनयापन करें। तो पुरुष और स्त्री ने संवाद शरू किया ---

पुरुष - हे देवी! मैं पुरुष अपने पौरुष, अर्थात परिश्रम और योजना से, आपके लिए प्रकृति प्रदत्त समस्त संसाधनों से धरती पर रहने और जीवनयापन करने की उत्तम से उत्तम व्यवस्था करूँगा।

स्त्री - हे देव! मैं भी वचन देती हूँ कि मैं भी अपने स्त्री धर्म का पालन करते हुए उस स्थान को अपनी रचनात्मकता और आयोजन क्षमता से स्वर्ग सा विकसित करुँगी और आपके साथ धर्मपूर्वक जीवनयापन करुँगी।

पुरुष - हे देवी! मैं आपको प्रसन्न करते हुए, आपकी सहमति से, आपके साथ योग द्वारा अपनी ऊर्जा को आपमें स्थापित करूँगा।

स्त्री - देव! प्रेम से परिपूर्ण हो मैं भी उस ऊर्जा को धारण कर, अपनी ऊर्जा का उसमें समावेश कर, ब्रह्मा द्वारा रचित प्रकृति के विकास में अपनी भूमिका निभाऊंगी।

पुरुष - हे देवी! मैं आपको वचन देता हूँ कि धरती पर मैं आपके और आपके द्वारा उत्पन्न मेरी संतानों के भरण-पोषण की समस्त व्यवस्था करूँगा।

स्त्री - हे देव! मैं भी आपको वचन देती हूँ कि आपके द्वारा परिश्रम से संग्रहित वस्तुओं से मैं स्वयं संतुष्ट होऊंगी और आपको और आपके द्वारा उत्पन्न मेरी संतानों को भी संतुष्ट रखूंगी।

पुरुष - हे देवी! मैं आपको और हमारी आने वाली संतानों को पूर्ण सुरक्षा का वचन देता हूँ। मैं आप सभी की सुरक्षा के लिए दैवीय, शारीरिक और प्राकृतिक बाधाओं से बिना डरे युद्ध करूँगा और उनसे सुरक्षा हेतु योजना बनाऊँगा।

स्त्री - देव! मैं1