You look, you observe, you understand. You think, you imagine, you associate. You feel, you insight and you express... In words... In writings. This is what I want to share here. So 'Feelings' are my insights, experiences and perspective to look this world and beyond. Come and feel what I was feeling....

Patthar :: The Stone (Hindi-Humor)

एक दिन रास्ते में मेरा पैर किसी चीज से टकराया और मैं ठिठक कर रुक गया,
झुक कर देखा, तो कुछ ख़ास ना था, यह था एक पत्थर...
एक निर्मम, निर्जीव, निरीह पत्थर।

उस पत्थर की हिम्मत पर मुझे आश्चर्य हुआ और रोष भी,
एक अदना सा पत्थर और इंसान से टकराने का साहस...
पर वो चुप था, कुछ ना बोला, क्योंकि वो था एक पत्थर...
एक निर्मम, निर्जीव, निरीह पत्थर।

मेरे इस विचार-मंथन के बीच, कुछ लोग आये,
उसे उठाया और एक कार के शीशे पे दे मारा,
फिर पुलिस आई, दो को धरा, चार को साथ ले गई,
पर अभी भी, मेरी आँखों के सामने, पास की मिट्टी में, पड़ा था, वही एक पत्थर...
एक निर्मम, निर्जीव, निरीह पत्थर।

तभी एक ढोंगी आया, साधु-वेश बना, उसने उसी पत्थर को उठाया,
फिर नल के जल से पवित्र कर, उसे फूलों का हार पहनाया,
भीड़ जुटी, आरती हुई और ढेर सा चढ़ावा उस पत्थर ने पाया,
चढ़ावा समेट साधु के जाने के बाद,
मेरे सामने, फूलों का हार पहने, पड़ा था, वही एक पत्थर...
एक निर्मम, निर्जीव, निरीह पत्थर।

अब उस पत्थर का महात्मय समझ आने लगा था,
जिसे जाना था तुच्छ, उसी को मैं सिर नवाने लगा था,
फिर पास जाकर उसके, शुरू की मैंने मेरी प्रार्थना -

हे पत्थर देवता! आप भाग्य-विधाता,
कहीं विध्वंस का कारण, कहीं सृष्टि निर्माता,
किसी को देते दंड, किसी को देते दाना,
विधना की सृष्टि का, तुम ही बुनते ताना-बाना,
तुम्हारे बिना विधाता का नहीं कोई आकार,
तुमने ही उसे बनाया, सगुण और साकार।

हे पत्थर देवता! आपके प्रति दुर्भावना के लिए, मैं क्षमाप्रार्थी हूँ,
अपने घर के गल्ले पर, सदा करता आपकी ही आरती हूँ,
अभी एक छोटा कवि हूँ, मुझे आप महान बनाना,
इसीलिये चढ़ा रहा हूँ ये, ग्यारह रूपये और चार आना।

ऐसा कहकर मन में श्रद्धा भाव लिए, मैं1



How to Enhance Your Brain Power?

Everybody wants to enhance his brain power... to memorize more facts... to store information in his mind in a proper way. Let's see how we can achieve it by changing some of our routine works. SuccessWe all want to become successful in life and for that use different types of approaches. Read books, newspapers, watch TV, surf internet, gather knowledge, enhance our general knowledge and skills, show-off our gained intelligence, share our experience, do good dress-up, learn multiple lang...


Khushi :: Happiness (Hindi)

पंछी की तरह उड़ने में, कूद-कूद कर चलने में,
आता है कितना मज़ा ओ प्रभुजी।
इसीलिए रोज़ फुदक-फुदक मैं आती हूँ तेरे द्वारे,
कि हे प्रभुजी! ऐसे ही मुझे फुदक-फुदक आने देना,
कूद-कूद चलने देना,
क्योंकि जो मज़ा इंसान बनकर फुदकने में है,
वो चिड़िया बन उड़ जाने में कहाँ।
चिड़िया बनकर तो कोई भी उड़ सकता है,
पर इंसान बन, हर कोई कहाँ फुदक पाता है।
इसीलिए हे प्रभु! मुझे यूँ ही इंसान बने फुदकते रहने देना,
चिड़िया सा मत बना देना।



Pita ka Dard (Father's Pain) (Hindi)

बचपन से तेरी जवानी तक,
तुझे पाला-पोसा बड़ा किया,
बाइक से मोबाइल तक,
तेरी हर ख्वाहिश को मैंने जिया,

तूने माँगा चाहे मना किया,
पर मैंने अपना बेस्ट दिया,
तेरे पहले बिज़नेस से ले,
हर फैसले तक,
तेरी जीत से जीतकर,
तेरी हार में हारकर,
कभी समझाकर, कभी डांटकर,
अपने मन से तुझे सही किया,

और आज तू कहता है पापा!
तुम समझे नहीं मुझे, मैंने क्या चाहा...,
तुम अपनी इच्छा थोपते रहे मुझपर...,
और मुझपर ना कभी यकीं किया...,

अरे बेटा! चिर गया दिल मेरा,
कब साथ तेरे मैं रहा ना खड़ा,
कब तुझको रोका कुछ करने से,
कब परिवार का बोझ मैंने पड़ने दिया,
और आज तू कहता है पापा,
तुमने मुझपर न यकीन किया...,

मेरी हार में, बीच मझधार में,
समय की मार में, चाकू की धार में,
वो ताकत ना थी, जो तेरे 'पापा' को चीर देती,
पर तेरे शब्दों ने आज ये एहसास कराया,
कि तू अब बड़ा हो गया है और मैं पुराना,
शायद इसे ही कहते हैं बदला ज़माना,

'सॉरी बेटा'!!
बस ये शब्द तुझे कभी यूज़ न करने पड़ें,
ये दुआ है मेरी,
अलविदा सयाने बेटे,
अब ये जिंदगी है तेरी।



Janak Ki Vyatha... (Hindi)

ये धरती पुरुषविहीन हुई, हे जानकी!
क्या रहना पड़ेगा जनक के घर में तुम्हें सदा?
कभी सोचा न था,
मेरी प्रतिज्ञा ही बाधक बनेगी,
तेरे कन्यादान में, मेरी प्रिये!

हे सीते! देखी है तुझमें दुर्गा की मूरत मैंने,
कैसे दे दूँ किसी कायर के हाथ में तुझको।
जिस धनुष को एक हाथ में उठा,
बचपन से तरुणाई तक खेली है तू तेरी सखियों संग,
उसी धनुष को हिलाने मात्र में भी असमर्थ है आज ये नृपजन।

हे वैदेही! देखी है तुझमें लक्ष्मी सी चपलता सदा,
कैसे दे दूँ किसी पुरुष-पुरातन के हाथों में तुझको।
आये हैं नरेश विश्व के हर छोर से,
किन्तु पाना चाहते हैं सब तुझे हाथों के ज़ोर से।

वो पुरुष ही क्या जो दुर्बल को दबाये,
बलशाली तो हिंसक पशु भी होते हैं।
वो बुद्धि ही क्या जो दूसरों को सताये,
अविवेकी पूत पर तो सदा ही कुल रोते हैं।

हे पुत्री! तू माँ गौरी सी सीधी,
कैसे सौंपूं तुझे किसी बली-हठी को,
जो तेरे इस स्त्री रूप से परे धवल मन को,
न देखना चाहता है और न सुनना।

हे विशालाक्षी! सरस्वती सी तेज है तेरी बुद्धि,
कैसे; कैसे दे दूँ तुझे किसी ऐसे दुर्बुद्धि को,
जो उसके उपयोग के स्थान पर, उसे दबाये,
स्वयं अहंकार के मद में।

इसीलिए हे जानकी! धनुष विखंडन की ये शर्त रखी थी मैंने,
बिना विवेक, सदविचार और आशीष के, केवल बाहुबल से,
इस धनुष को हिलाना भी असंभव है जानकी।
किन्तु ये न पता था कि अब पुरुष रहे ही नहीं इस धरा पर।

जिस धरती ने तुझ जैसी सुशील कन्या को जना,
उसकी गोद में एक भी सुकुमार न हुआ...
हे सुहासिनी! तो क्या जीवन भर अब हंसी भूलकर,
संभालनी पड़ेगी सत्ता तुझे?
नहीं-नहीं मैं इतना निष्ठुर पिता नहीं,
जो छीन ले तेरी खुशियां तुझसे।

हे कान्ता! छोड़ दे तू मेरे प्रण को...
जिसे वरना चाहे वर1



Maine Chod Diya... (I left...) (Hindi)

मैंने छोड़ दिया पतंगों को लपकना,
कि चंद लड़के पतंगों से ज्यादा मेरी छलांगों को देखने लगे थे,
मैंने छोड़ दिया खुलकर खिलखिलाना,
कि चंद होठ उसे देख अजीब सी शक्लें बनाने लगे थे,
मैंने छोड़ दिया छत पर गाने गुनगुनाना,
कि पड़ोस के लड़के बिन चाहे करने लगे थे तारीफ़ उसकी,
मैंने छोड़ दिया नज़रें मिलाना,
कि समझना ही नहीं चाहती थी मैं उनकी नापाक शक्लें,
मैंने छोड़ दिया बिना चुन्नी के सड़क पर जाना,
कि चंद घूरती निगाहें अजीब लगती थीं मुझको।

क्यों कल तक जो कर कर ख़ुशी मिलती थी मुझे,
आज वो हरकतें करते हुए, मैं देखती हूँ चारों तरफ,
क्यों आज अपनी खुशी से पहले डर जाती हूँ,
कि कोई आँखें देख न लें मुझे यूँ खुशियाँ मनाते,
पता नहीं वो कौनसा अनजाना साया डराता है,
वो कौन है जिससे छुपती फिर रही हूँ मैं,
चंद अखबार की ख़बरें हैं या परिवार की नसीहतें,
जो डरा देती हैं मुझे रोज़ाना,
वो जो भी हैं... पर अब इतना तो मैं समझती हूँ,
कि मेरा अपना देश मेरे लिए सुरक्षित नहीं है।

यहाँ न्याय की देवी के घर में अंधेर भले ही न हो,
पर देर अवश्य है...
गुनहगारों के मन में डर नहीं,
पर बच जाने का यकीन है।
नेता को नेतागिरी से और बलवान को दादागिरी से,
फ़ुरसत ही नहीं...
और सफेदपोशों के काले हाथ अंधों को दिखते ही नहीं।
वैसे किसी को यहाँ किसी दूसरे के फटे में हाथ नहीं देना,
लेकिन आँख, कान और मुँह वहीं घुसाए रखने हैं।
धृष्ट से लेकर भ्रष्ट तक सब मौसी के लड़के हैं,
और बिना अपने उल्लू को सीधा किये कोई लाचार का सगा नहीं है।

अपनी जाति को रोज़ अखबारों में लाचारी से मरते-घुटते देख,
तिल-तिल कर जो मैं मरती-डरती जाती हूँ,
ये जो हवा खराब हो गई है मेरे देश की,
उसमें जब मैं सांस1



Pranaam to Guru Ji and Guru Maa (Hindi)

गुरू जी मेरे सरल-सुहृदय,
गुरु माँ चपल-चन्द्रिका सी,
गुरु जी शांत समुद्र विशाल,
गुरु माँ बहती गंगा सी।

गुरु जी सिखलाते जीवन,
पर जीवंत बनाती गुरु माँ ही,
गुरु जी ध्यान कराते हैं,
पर ध्यान रखती हैं गुरु माँ ही,
सारा रस, जीवन-तरंग,
हम तक पहुंचाती गुरु माँ ही,
मन से मिलते हम गुरूजी से,
साक्षात् करातीं गुरु माँ ही।

गुरू जी मेरे सरल-सुहृदय,
गुरु माँ चपल-चन्द्रिका सी...

गुरूजी मेरे ये हैं कैसे,
ये मुझे बतातीं गुरु माँ ही,
नित्य रात्रि करते इन्तजार,
पाती भिजवाती गुरु माँ ही,
हम सब पीछे श्री गुरूजी के,
सही राह सुझातीं गुरु माँ ही,
नैया पार कराते श्री गुरूजी मेरे,
पर उसमें छेद बतातीं गुरु माँ ही।

गुरू जी मेरे सरल-सुहृदय,
गुरु माँ चपल-चन्द्रिका सी...

आदर करते सब गुरूजी का,
पर लाड़ लड़ातीं गुरु माँ ही,
व्यक्तित्व बहुमुखी गुरूजी का,
जिसे पूर्ण बनातीं गुरु माँ ही,
गुरु जी-गुरु माँ को नमन मेरा,
गुरु तक पहुंचा दो गुरु माँ जी,
गुरु जी जैसे तो बन न सकेंगे,
स्वयं सा निर्मल बना दो गुरु माँ जी।

गुरू जी मेरे सरल-सुहृदय,
गुरु माँ चपल-चन्द्रिका सी...



Geeta Gyan - Spiritualism and Career (Hindi)

तो जैसी चर्चा चल रही थी कि जब मैं 'दृष्टा' हूँ तो 'सृष्टा' कैसे हो सकती हूँ? अगर 'मैं' का त्याग ही कर दिया तो इच्छा कैसी, कार्य क्यों और कैसा? यंत्रवत जीवन तो न दुःख में दुःखी, न सुख में प्रसन्न। बस शांति ही शांति। लेकिन अगर जीवन में सुख-दुःख ने मुझपर प्रभाव ही नहीं डाला, अगर जीवन खट्टा-मीठा हुआ ही नहीं तो जीने का क्या मज़ा?

ये सत्य है कि गीता आत्मज्ञान की बात करती है, सुख-दुःख से परे ईश्वरीय कार्यों में रत रहते हुए जीवन यापन की बात कहती है। इन्द्रियों (इच्छा) पर नियंत्रण और चिंता से चिंतन की ओर अग्रसर होने पर बल देती है। वो जीवन में दृष्टा बनने को कहती है। फल (परिणाम) की चिंता से परे रहते हुए कर्म करने को कहती है। लेकिन बात गीता में कर्म की होती है, अकर्मण्यता की नहीं। कर्म ईश्वर भजन नहीं है... वो है जो मनुष्य के अंदर ही है... उसकी आत्मा का स्वभाव है... प्रकृति के अनुरूप है। गीता में आत्मा के स्वभाव या इच्छा को अध्यात्म कहा गया है। अतः जो व्यक्ति आत्मा के स्वभाव के अनुरूप कर्म करता है वो अध्यात्मिक है, ईश्वर से जुड़ा है और ईश्वरीय कार्य में रत है।

अब समझते हैं कि आत्मा का स्वभाव क्या है और इसे कैसे जाना जा सकता है? आत्मा का स्वभाव या आपका सामान्य स्वभाव आपकी आत्मा का भाव होता है। जब आप नित्य 15 मिनिट आँख बंद कर सारी दुनिया को भुलाकर शांत वातावरण में स्वयं के अंदर की आवाज पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो आपको आपके आत्मा के स्वभाव के बारे में पता लगने लगता है। आत्मा के स्वभाव को भी मुख्यतया चार भागों में बांटा गया है, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र। किन्तु इसका वर्ण व्यवस्था से कहीं कोई लेना-देना नहीं है। सामान्य शब्दों में कहूँ तो कार्य को1



Adhoori Khwahishen... (Hindi)

जिंदगी में जरुरी नहीं कि हर ख्वाहिश पूरी हो,
कोई जरुरी नहीं कि हर रात नूरी हो,
वो तो नजरिया इंसां का है, जो है उसे देखता,
बदलता, ढालता, ढलता और सहेजता,
अंधियारे में सायों से ही वो बनाता नए चित्र,
अधूरी ख्वाहिशों में भी भरता रहता रंग विचित्र,
इन्हीं चित्रों में ढूंढ ख़ुशी, पूरी करता ख्वाहिशें,
क्या हुआ ख्वाहिशें बदलीं और मिल गई नई मंज़िलें,
जो ख्वाब पूरे न हों तो उनके पीछे क्या भागना,
ख्वाब लो तुम बदल अपने, जिंदगी जी लो यहाँ,
ना बीते पर बस है अपना, ना आने वाले का यकीं,
जी सको तो जी लो हर पल, मानो जैसे ये ही है आखिरी,
लाख गम हैं जमाने में, मैं क्यूँ दूँ इक और मिला,
कारवां क्यूँ न शुरू कर दूँ, अपना मैं इक कदम बढ़ा,
फ़लसफ़े तो बन ही लेंगे, जब दिल में है इतना हौसला,
सारे ख्वाब भी पूरे होंगे, बस अब शरू है सिलसिला,
आँख मेरी आज नम है, दिल में है छाया ज़लज़ला,
चंद अधूरी ख्वाहिशें, चुभती हैं दिल में, करतीं गिला,
कर दूंगी उनको भी मैं ठंडा, अपनी नज़मों के रंग मिला|



Aaj Man Khamosh Hai... (Hindi)

आज मन खामोश है, तो क्या ख़ामोशी में खनकार न होगी,
आज कलम भी रुकी हुई है, तो क्या रुकी कलम से बात न होगी,
आज रात में है बहुत अँधेरा, तो क्या उजियारे की आस न होगी,
आज सुस्त है कवि मन मेरा, तो क्या कविता की बरसात न होगी,
आज हूँ तनहा गुमशुदा सी, तो क्या खुद की कोई तलाश न होगी,
आज सोच रही हूँ कि मैं क्या हूँ, तो क्या खुद से मेरी मुलाकात न होगी,
बहुत दूर हूँ साहिल से तो क्या, मझधारों में कोई बात न होगी।