You look, you observe, you understand. You think, you imagine, you associate. You feel, you insight and you express... In words... In writings. This is what I want to share here. So 'Feelings' are my insights, experiences and perspective to look this world and beyond. Come and feel what I was feeling....

Andhi Galiyan (Hindi)

अंधी गलियां,
जिन्हें नहीं मिलती कोई चौड़ी सड़क,
ग़ुम हो जाती हैं,
जाकर चंद दरवाजों पर,
जो अपनी ही अकड़ में,
खुलने से मना कर देते हैं,
और फिर एक दिन,
बाढ़ के पानी से तरबतर हो,
खुद भटक औरों को भी भटका देती हैं ये - अंधी गलियां।



Two Liners (Hindi)

कोई क्या इतने प्यार से भी रो जाता है,
जो उसकी हर आह पर वाह ही निकल पाता है,
सुनती हैं दीवारें, पर क्यूँ आज इन्सान चुप है,
पूछता है वो कि क्या दीवारों से भी कुछ कहा जाता है।


कोई प्याला हो तो पी के भी मैं ख़ुश हूँ यारों,
मरी दुनिया में ऐसे ही जिया जाता है,
वो साँस ही क्या, जिसमें आवाज़ ना हो यारों,
इसीलिए मरते दम तक ऐसे ही पिया जाता है।


पसंद जब चाहत बने और चाहत बने जूनून,
तब दिक्कत बढ़ जाती है, जब पल को नहीं सुकून।
सुकून ढूँढू मैं गलियों में, सुकूं तो मन का मोर,
ज्यूँ चकोर उड़ता फिरे, ढूंढे चाँद चहुँ ओर।


औरों से अब क्या कहूँ, कैसे कहूँ मैं बात,
खुद में ही खामोश हूँ, मन में है उल्लास।


मितवा तुम किसी और के, नहीं करते मुझसे बात,
कल जाकर ले आये तुम, उसके लिए सौगात।


फ़ुरसत के दो लम्हे जिंदगी में मिलें... तो शायद मर जाएँ...
एक नज़र वो हमें और हम उन्हें देख लें, तो शायद प्यार कर जाएँ।



Haan Main Tumhaare Liye Kuch Nahi Laai Hun (Hindi)

आँखों में जुगनू, मुट्ठी में धूप भर के लाई हूँ,
हाँ, मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं लाइ हूँ ...

अपनी सारी दुआएं, किस्मत के सारे तारे लाई हूँ,
हाँ, मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं लाइ हूँ ...

पहली बारिश की ख़ुशबू, अपनी पहली गुड़िया लाई हूँ,
हाँ, मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं लाइ हूँ ...

अपने अनदेखे सपने, सारी हँसी लाई हूँ,
हाँ, मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं लाइ हूँ ...

जिन किताबों में लिखा था तुम्हारा नाम और ईद का चाँद, लाई हूँ,
हाँ, सही कहा तुमने...... मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं लाइ हूँ ...



Geeta Gyan - Karm-Gyan aur Bhakti Yog (Hindi)

प्रारम्भ करने से पहले मैं स्पष्ट कर दूँ कि ये वो अर्थ है जो मैंने समझा है। गीता अपने आप में बहुत ही गूढ़ और रहस्यमय है। दिया गया अर्थ अधूरा या अज्ञानतापूर्ण हो सकता है। उद्देश्य है कि मेरे साथ साथ हर पढ़ने वाले के मन में एक बार गीता पढ़ने की अभिलाषा जगा पाऊँ और शायद अपने सवालों का उत्तर भी पा पाऊँ।

गीता में ईश्वर को प्राप्त करना लक्ष्य मानते हुए तीन मुख्य मार्ग बताये गए हैं और तीनों ही मार्ग आपस में एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। सबसे पहला मार्ग है - कर्म योग, जहाँ स्वयं को भूलकर ईश्वर द्वारा प्रदत्त कार्य करने को कहा गया है। द्वितीय है ज्ञान योग, जो स्वयं को, स्वयं की प्रकृति को और संसार को जानने से सम्बन्ध रखता है। तृतीय मार्ग है, भक्ति योग, जो भक्ति द्वारा उस दिव्य शक्ति को ढूंढने और पा लेने का मार्ग बताता है। अब जहाँ भक्ति है वहाँ 'अहम्' हो ही नहीं सकता। आप पूरे समय अपने भगवान् के साथ उन्हीं के कार्यों में लगे रहते हो (यहाँ मैं स्पष्ट कर दूँ कि भगवान् के कार्य उनकी सेवा-पूजा कतई नहीं हैं। भगवान् को हमसे कुछ नहीं चाहिए हो सकता और हम उन्हें इस संसार की किसी भी वस्तु से भज नहीं सकते। समस्त कर्मकांड भगवान् तक पहुँचने का साधन हो भी सकता है और नहीं भी। ये हमारे ऊपर ही निर्भर करता है। जो मैं आगे बताउंगी।) भक्ति द्वारा भी आप उस सर्वशक्तिमान सर्वव्यापी सर्वज्ञानी भगवान् को जानने और उसके चाहे अनुसार उसे भजने की चेष्टा करते हैं। ज्ञान योग में भी आप स्वयं के अहम् को भुलाकर अपने भीतर और बाहर हो रहे क्षणिक परिवर्तनों को प्रतिपल दृष्टा बनकर देखते हैं और उस सर्वशक्तिमान द्वारा रचित इस प्रकृति का एक अंश मात्र बन ईश्वरीय कार्य करते रहते हैं। कर्म योग में भी1



Main (I) (Hindi)

'अहम्' का भाव संसार से मुक्ति में बाधक है। जो कह रहा है 'मैंने किया', 'मैं कर रहा हूँ', 'मैं करके दिखाऊंगा' वो वास्तविकता में क्या करेगा और किसे दिखायेगा?

हमारे अंदर जो करोड़ों रक्त कोशिकाएं घूम रही हैं, जो रुधिर में बहने वाली आक्सीजन उन्हें घुमा रही है, जो हृदय उसे फेफड़ों से सोख कर शुद्ध कर रहा है, जो नाक उसे अंदर घुसा रही है, जो तंत्रिका तंत्र इस सारे कार्य को बिना दिमाग को बताये किये जा रहा है, जो जढराग्नि भोजन को पचा समस्त तंत्रिका तंत्र को, मस्तिष्क को और समस्त अंगों को पोषण देती है, जो मस्तिष्क इतने विलक्षण कार्य करता है, जो अवर्णनीय है, नया सीखना, पुराने को संभल कर रखना, समस्त इन्द्रियों द्वारा किये जा रहे कार्यों से परिणाम निकालना, नए नए आविष्कारों की रचना करना, सोचना और जो शरीर के अज्ञात सात चक्र इन सभी ज्ञात अंगों को भली प्रकार नियंत्रित और यन्त्रित करते हैं, उनमें से कोई भी 'मैं' या 'मेरा' नहीं बोलता। बल्कि सब चुपचाप अपना कार्य करते रहते हैं।

ना ही कोई मनुष्य इनमें से किसी की भी तुलना कर किसी क्रिया या कारक को श्रेष्ठ बता पाता है। हाँ कई बार अपने दिमाग की तारीफ़ जरूर करता है। लेकिन क्या दिमाग उस तारीफ़ को सुनने के लिए कार्य कर रहा था, या क्या वो इसका घमंड करता है, या क्या वो बाकी तंत्र को बतलाता है की मेरी तारीफ़ हुई... नहीं। वो कुछ नहीं बोलता और कार्य करता रहता है। वहाँ कोई लड़ाई नहीं, कोई ऊँच-नीच नहीं। बस कार्य के प्रति समर्पण और उसकी निरंतरता। न कोई वक्ता, न कोई श्रोता और हम जैसे अनभिज्ञ दृष्टा। ये सब अनवरत हो पाता है क्यूंकि वहाँ 'मैं' और 'तू' नहीं है। एक-एक पल में हमारे भीतर और बाहर इतने कार्य हो रहे हैं और उसके बाद भी मज़े की बात1



Mera Bhagya, Mera Karm (Hindi)

नहीं-नहीं तुम नहीं हो नाथ, नहीं हो मेरे ईश्वर,
नहीं-नहीं तुम नहीं हो नाथ, नहीं हो मेरे ईश्वर।

बचपन से जो मेरे साथ खेला, मेरे साथ जागा और मेरे साथ सोया,
जिसने मुझे बढ़ाया और जीवन-दर्शन सिखलाया,
रास्ते में रोड़ा बन वो अड़ा नहीं, मेहनत करने पर वो जड़ा नहीं,
वो मेरे साथ रहा, मेरी हंसी में हँसा और मेरे दुःख में रोया,
जिसने मेरी हार पर मुझे संभाला और अगली जीत की ओर बढ़ाया,
जो संसार की सारी खुशियां, मेरे लिए बटोर कर लाया,
वो तुम न थे, कोई और था...

और जो तुम कहते हो खुद को ईश्वर,
तो तुम तब कहाँ रूठे थे,
जब पुकार रही थी मैं, झूझ रही थी इन तूफानों से,
जब सामना हो रहा था मेरा मौत से,
तब तुम किसी और पर मेहरबानी बरसाने में व्यस्त थे,
पर तब भी जो मेरे साथ था, वो तुम न थे, कोई और था...

और आज भी जिंदगी के इस मोड़ पर,
ओ भाग्य के छल-देवता ! क्या भरोसा, फिर छल जाओ,
आज साथ दो, तो कल वापिस न आओ,
लेकिन, मेरा कर्म मेरे साथ था, है और रहेगा,
वो मेरा है, तो मुझसे दूरी कैसे सहेगा,
मेरे जन्म से, मेरी मृत्यु तक और उसके बाद भी...
मेरे समस्त यश-अपयश, वेदना-संवेदना का कारण,
ईश्वर का दिया वो उपहार, जो मेरे हाथ में है,
वो तुम नहीं, कोई और है...

वो हाथ की लकीरों में नहीं, पर मेरे हाथ में है,
वो माथे की तकदीरों में नहीं, पर उससे बहते नमक के स्वाद में है,
वो मुझे जीने का और जी जाने का सुकून देता है,
वो मुझे कुछ कर जाने का जूनून देता है,
न वो खुद रुकता है, न मुझे रुकने देता है,
लेकिन भला ये है कि मुझे कभी नहीं झुकने देता है,
इसीलिए तुम नहीं हो मेरे नाथ... नहीं हो मेरे ईश्वर।1



Meri Har Muskurahat Ke Peeche... (Gazal) (Hindi)

मेरी हर मुस्कुराहट के भी पीछे आह होती है,
मुझे गम है क्या, इसकी किसे परवाह होती है,
मैं रातों को नहीं सोता, मैं डरता हूँ क्यूँ ख्वाबों से,
न जाने क्यूँ मेरे जगने की भी अब वाह -वाह होती है।

हर महफ़िल की रौनक हूँ, तो क्यूँ ज़हनी है खालीपन,
क्यूँ उठता है धुआं बिन आग, भीतर से जलाता है,
जब रहता हूँ मैं गुमसुम-गुमशुदा सारे नज़ारों में,
तो क्यूँ हर नज़र, हर सफ़र में मेरी ही बात होती है।

अब तो आदत सी हो गई है मुझे भी मुस्कुराने की,
किसे परवाह मेरे गम की, तो क्या ज़रूरत दिखने की,
पर रातों को जो सोता हूँ तो उसकी याद होती है,
जो सोने नहीं देती, ऐसी कुछ बात होती है।

मेरी हर मुस्कुराहट के भी पीछे आह होती है,
मुझे गम है क्या, इसकी किसे परवाह होती है|



Khar (Enmity) (Hindi)

बहुत ख़ार है तेरे भीतर, कुछ ख़ार यहाँ है बाकी,
लहरें-तूफ़ां अनेकों, मेरे मन के भी ये साथी।
इतने तूफानों में भी, है मौन खड़ा तू जैसे,
वैसी ही मौन हूँ मैं भी, पर शांत कहूँ मैं कैसे ...

ये हवा नहीं, ना ही मौसम, जो मन को हिला-मिला दें,
कुछ रिश्तों के बंधन हैं, जहाँ शिकवे और गिला हैं।
तुझसी नहीं बलशाली, जो सबको मैं अपना लूँ,
या तो अपने रंग में रंग दूँ, या छोड़ कर उन्हें दया दूँ ...

फिर भी शांति की तलाश, ले आई मुझे यहाँ आज,
उमड़े-घुमड़े और बरसे मेरे बादल, पिघल गई मैं आज,
आँखों से आँसू बन निकला, ख़ार मिला तुझ भीतर,
तेरे मौन से मेरे मौन को मिले अनेकों उत्तर...
तेरे मौन से मेरे मौन को मिले अनेकों उत्तर।



Pita Aur Ishwar (Father and God) (Hindi)

तेरा तेरे नन्हे क़दमों से चल,
पापा की गोद में चले जाना,
और प्यारी सी मुस्कान से,
अपनी विजयगाथा को सुनाना,
वो मम्मी-पापा की पकड़ पर तेरा यकीं,
कि हवा में पैर रखने से भी तू अब डरती नहीं,
तुझे पता है कि वो हैं यहीं-कहीं,
तेरे हर गलत कदम को, सही दिशा पाने का यकीं,
और क्या जो गिर भी गए तो …
एक किलकारी और मम्मी की गोद प्यारी-प्यारी,
हाय ये बचपन …
कितना उन्मुक्त, कितना प्यारा,
ना फिक्र, ना कोई गम और जीवन प्यारा-प्यारा|

काश ता-उम्र हम ईश्वर पर भी कर पाते यही विश्वास,
तो हँसते ही रहते जब तक रहती तन में श्वाश,
करते तो हम भी हैं वही...
दो कदम चलने पर, अपनी विजयश्री का यकीं,
फिर सुनाते हैं अपनी विजयगाथा,
और रो-रो कर बुलाते हैं ईश्वर को,
जो जीवन में कोई तूफ़ान आता,
लेकिन बस वो यकीं नहीं दिखा पाते,
हर कदम को थामेगा ईश्वर,
ये सोच ही नहीं पाते,
सोचो …
उस ईश्वर को भी होती होगी कितनी ख़ुशी,
हमारे हर सही फैसले पर हमारे बड़े होने का यकीं,
और बड़े हो अपनी दुनिया में मगन,
और ईश्वर को भुला दिए जाने का गम भी,
लेकिन कोई नहीं...
वो जानता है...
फिर इक तूफां आएगा,
जब याद उसे किया जाएगा,
और बिना किसी बैर, किसी स्वार्थ के,
इक पिता की तरह ही वो हमें बचायेगा …
वो शर्तिया हमें बचाएगा…



A few lines by Heart (Hindi)

कभी-कभी खुद के अन्दर की ख़ामोशी सुनने के लिए ज़िन्दगी का शोर ज़रूरी होता है,
कभी-कभी एक लम्हा जीने के लिए सदियों तक हर रोज़ मरना ज़रूरी होता है,
क्या चाहा... क्या पाया... इसका हिसाब करने के लिए कभी-कभी फ़कीर होना ज़रूरी होता है,
और ...
जीत और हार दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं...
इसीलिए ...
किसी को जिताने के लिए कभी-कभी अपना सब कुछ हार जाना ज़रूरी होता है......