Geeta Gyan - Spiritualism and Career (Hindi)

तो जैसी चर्चा चल रही थी कि जब मैं 'दृष्टा' हूँ तो 'सृष्टा' कैसे हो सकती हूँ? अगर 'मैं' का त्याग ही कर दिया तो इच्छा कैसी, कार्य क्यों और कैसा? यंत्रवत जीवन तो न दुःख में दुःखी, न सुख में प्रसन्न। बस शांति ही शांति। लेकिन अगर जीवन में सुख-दुःख ने मुझपर प्रभाव ही नहीं डाला, अगर जीवन खट्टा-मीठा हुआ ही नहीं तो जीने का क्या मज़ा?

ये सत्य है कि गीता आत्मज्ञान की बात करती है, सुख-दुःख से परे ईश्वरीय कार्यों में रत रहते हुए जीवन यापन की बात कहती है। इन्द्रियों (इच्छा) पर नियंत्रण और चिंता से चिंतन की ओर अग्रसर होने पर बल देती है। वो जीवन में दृष्टा बनने को कहती है। फल (परिणाम) की चिंता से परे रहते हुए कर्म करने को कहती है। लेकिन बात गीता में कर्म की होती है, अकर्मण्यता की नहीं। कर्म ईश्वर भजन नहीं है... वो है जो मनुष्य के अंदर ही है... उसकी आत्मा का स्वभाव है... प्रकृति के अनुरूप है। गीता में आत्मा के स्वभाव या इच्छा को अध्यात्म कहा गया है। अतः जो व्यक्ति आत्मा के स्वभाव के अनुरूप कर्म करता है वो अध्यात्मिक है, ईश्वर से जुड़ा है और ईश्वरीय कार्य में रत है।

अब समझते हैं कि आत्मा का स्वभाव क्या है और इसे कैसे जाना जा सकता है? आत्मा का स्वभाव या आपका सामान्य स्वभाव आपकी आत्मा का भाव होता है। जब आप नित्य 15 मिनिट आँख बंद कर सारी दुनिया को भुलाकर शांत वातावरण में स्वयं के अंदर की आवाज पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो आपको आपके आत्मा के स्वभाव के बारे में पता लगने लगता है। आत्मा के स्वभाव को भी मुख्यतया चार भागों में बांटा गया है, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र। किन्तु इसका वर्ण व्यवस्था से कहीं कोई लेना-देना नहीं है। सामान्य शब्दों में कहूँ तो कार्य को1