Gandhi Ki Kismat (Hindi)

अपनी अपनी क़िस्मत

हाड़ माँस का पुतला था वो,
सत्य के लिए लड़ता था,
अपने ही देश के लिए नहीं,
वो मानवमात्र से प्रेम करता था,
फिर भी उसके अपनों ने ही,
उसकी नहीं क़दर जानी,
ये अपनी-अपनी क़िस्मत है,
ये ही है क़िस्मत की कहानी।

एक देश आज़ाद कराया,
दूजा आज़ादी पर था,
पर एक विभाजन रोक ना पाया,
ऐसा ही क़िस्मत में था,
वो क्या सिखा गया हमको,
क्या राह दिखा दी जन-जन को,
उसको नहीं याद रखा हमने,
ऐसे कैसे हम अभिमानी,
ये अपनी-अपनी क़िस्मत है,
ये ही है क़िस्मत की कहानी।

बिन हथियार किए उसने वार,
सारे जन-मन को था एक किया,
अपना सर्वस्व लुटाकर भी,
मन में ना उसका अहं किया,
लगता सारी जनता को था,
वो अपना सा, वो प्यारा सा,
फिर भी ना जाने क्यूँ उनमें से ही,
किसी एक ने उस पर वार किया,
ये अपनी-अपनी क़िस्मत है,
ये ही है क़िस्मत की कहानी।

उस एक को तो चलो भूल भी लो,
पर आज के जन का अब क्या करो,
जो नहीं जानते उन्हें क्या है मिला,
वो करते हैं उस संत से गिला,
ना वो पढ़ते हैं, ना समझते हैं,
बस बुराई सबकी करते हैं,
गांधी को ग़लत ठहराते हैं,
ख़ुद को सम्राट बताते हैं,
ये अपनी-अपनी क़िस्मत है,
ये ही है क़िस्मत की कहानी।

विदेशों से सम्मान मिला,
अपने देश में ही अपमान मिला,
उसने तो कुछ नहीं चाहा था,
बस अपना फ़र्ज़ निभाया था,
वो ही था किया, जो तब था सही,
हम कौन जो कह दें, कुछ किया नहीं,
हमने अब तक क्या कर डाला,
बन बैठे बिन किए हम लाला,
ये अपनी-अपनी क़िस्मत है,
ये ही है क़िस्मत की कहानी।

'गाँधी' होना छोटी बात नहीं,
सबको ले कर चलना, देना सीख सही,
अपने लिए कुछ भी रखना नहीं,
फिर भी अपनों की नफरत...
क्या ये बात है1