Meri Har Muskurahat Ke Peeche... (Gazal) (Hindi)

मेरी हर मुस्कुराहट के भी पीछे आह होती है,
मुझे गम है क्या, इसकी किसे परवाह होती है,
मैं रातों को नहीं सोता, मैं डरता हूँ क्यूँ ख्वाबों से,
न जाने क्यूँ मेरे जगने की भी अब वाह -वाह होती है।

हर महफ़िल की रौनक हूँ, तो क्यूँ ज़हनी है खालीपन,
क्यूँ उठता है धुआं बिन आग, भीतर से जलाता है,
जब रहता हूँ मैं गुमसुम-गुमशुदा सारे नज़ारों में,
तो क्यूँ हर नज़र, हर सफ़र में मेरी ही बात होती है।

अब तो आदत सी हो गई है मुझे भी मुस्कुराने की,
किसे परवाह मेरे गम की, तो क्या ज़रूरत दिखने की,
पर रातों को जो सोता हूँ तो उसकी याद होती है,
जो सोने नहीं देती, ऐसी कुछ बात होती है।

मेरी हर मुस्कुराहट के भी पीछे आह होती है,
मुझे गम है क्या, इसकी किसे परवाह होती है|