Dar Lagta hai (Hindi)

डर लगता है उस घूरते हुए चेहरे से,
कभी मेरे हँसने पर तो कभी उदास होने पर,
कभी मेरे गाने पर तो कभी बाहर जाने पर,
वो चेहरा मुझे घूरता रहता है,
न जाने क्यूँ वो हँसता नहीं,
मुझसा है, पर मुझसा नहीं,
वो जब चाहे, जहाँ चाहे मुझे घूरता है,
और कल जब उसे हँसते देखा,
तो उस भद्दी हँसी में उसका काला चेहरा
और भी डराने लगा,
डर लगता है उस घूरते हुए चेहरे से,
तो कल मैंने उसे घूर लिया,
तो मेरे इस साहस को दबाने के लिए
वो बोला,
मैं तुम्हें डराना नहीं, बचाना चाहता हूँ,
तुम्हारे कोमल मन को कोई ठेस न लगे,
ये ही कार्य है मेरा,
मैंने माना और मुँह फ़ेर लिया,
पर फिर सोचने लगी...
ये वही घूरने वाला चेहरा तो है,
जो हर बार अलग-अलग तरीके से,
ठेस लगाता है मेरे कोमल मन को,
हाँ, बहुत डर लगता है,
उस घूरते हुए चेहरे से,
जो हर घड़ी मेरा पीछा भी करता है
और मेरा इंतज़ार भी।



Kaisa Saal (Hindi)

जाने ये कैसा साल है,
सबका बुरा सा हाल है,
कहीं कोरोना, कहीं अम्फान,
तो कहीं टिड्डियों का बवाल है।

वक्री सारे ग्रह बैठे हैं
मित्र भी शत्रु बन बैठे हैं,
दांव लगी है मेहनत सारी,
पैसों का भी सवाल है,
जाने ये कैसा साल है,
सबका बुरा सा हाल है।

खर्चे सिर चढ़ कर बोले हैं,
उधारी के फंदे घोले हैं,
फिर भी नहीं फ़िकर है उनकी,
क्योंकि जान खुद ही बेहाल है,
जाने ये कैसा साल है,
सबका बुरा सा हाल है।

आपद का अम्बार लगा है,
नहीं कोई व्यापार चला है,
तंगी-भूख-मंदी से घिरे हैं,
सबकी बिगड़ी चाल है,
जाने ये कैसा साल है,
सबका बुरा सा हाल है।

लगता है दुनिया डूबेगी,
आधी आबादी न रहेगी,
ऊपर से नीचे तक खुलता,
बड़ा काल का गाल है,
जाने ये कैसा साल है,
सबका बुरा सा हाल है।



Shikaar... (Hindi)

जो शिकार होता है, वो ‘शिकार’ होता है,
क्यूँकि वो कमज़ोर है...

उसमें नहीं है ताक़त अपने आप से लड़ने की,
उसमें नहीं है ताक़त डर को पीछे छोड़ आगे बढ़ने की,
उसमें नहीं है ताक़त सच को स्वीकार करने की,
उसमें नहीं है ताक़त स्वयं को नियंत्रित रखने की,

पर जाने क्यूँ दुनिया,
उम्मीद करती है उससे ताक़त की,
जाने क्यूँ सोचती है कि वो होते तो ऐसा करते,
वो होते तो वैसा करते,

अरे वो होते ही नहीं ना...
क्यूँकि जो शिकार होता है,
वो ‘शिकार’ होता है,
क्यूँकि वो कमज़ोर है...

और ‘दुनिया’ में तो बहुत ताक़त है,
‘दुनिया’ ना तो तनहा है
और ना ही कमज़ोर...
और ‘दुनिया’ के पास ज़ुबान भी है,
इसीलिए तो वो ‘शिकार’ नहीं है,

पर जब वो अपने डर को पीछे छोड़
अपनी क्षमताओं से भी आगे बढ़ जाता है...
एक छोटा मेमना शेर से लड़ जाता है...
या सहमने की जगह भीड़ में चढ़ जाता है...

तो छीन लाता है वो एक ज़िंदगी और एक ख़ुशी,
एक नई सोच और एक नया तज़ुरबा...
जो बनाते हैं उसे भीड़ से अलग एक मिसाल,
नहीं करती दुनिया उससे फिर कोई सवाल,

और वो नहीं रह जाता ‘शिकार’|



Pita ka Dard (Father's Pain) (Hindi)

बचपन से तेरी जवानी तक,
तुझे पाला-पोसा बड़ा किया,
बाइक से मोबाइल तक,
तेरी हर ख्वाहिश को मैंने जिया,

तूने माँगा चाहे मना किया,
पर मैंने अपना बेस्ट दिया,
तेरे पहले बिज़नेस से ले,
हर फैसले तक,
तेरी जीत से जीतकर,
तेरी हार में हारकर,
कभी समझाकर, कभी डांटकर,
अपने मन से तुझे सही किया,

और आज तू कहता है पापा!
तुम समझे नहीं मुझे, मैंने क्या चाहा...,
तुम अपनी इच्छा थोपते रहे मुझपर...,
और मुझपर ना कभी यकीं किया...,

अरे बेटा! चिर गया दिल मेरा,
कब साथ तेरे मैं रहा ना खड़ा,
कब तुझको रोका कुछ करने से,
कब परिवार का बोझ मैंने पड़ने दिया,
और आज तू कहता है पापा,
तुमने मुझपर न यकीन किया...,

मेरी हार में, बीच मझधार में,
समय की मार में, चाकू की धार में,
वो ताकत ना थी, जो तेरे 'पापा' को चीर देती,
पर तेरे शब्दों ने आज ये एहसास कराया,
कि तू अब बड़ा हो गया है और मैं पुराना,
शायद इसे ही कहते हैं बदला ज़माना,

'सॉरी बेटा'!!
बस ये शब्द तुझे कभी यूज़ न करने पड़ें,
ये दुआ है मेरी,
अलविदा सयाने बेटे,
अब ये जिंदगी है तेरी।



Janak Ki Vyatha... (Hindi)

ये धरती पुरुषविहीन हुई, हे जानकी!
क्या रहना पड़ेगा जनक के घर में तुम्हें सदा?
कभी सोचा न था,
मेरी प्रतिज्ञा ही बाधक बनेगी,
तेरे कन्यादान में, मेरी प्रिये!

हे सीते! देखी है तुझमें दुर्गा की मूरत मैंने,
कैसे दे दूँ किसी कायर के हाथ में तुझको।
जिस धनुष को एक हाथ में उठा,
बचपन से तरुणाई तक खेली है तू तेरी सखियों संग,
उसी धनुष को हिलाने मात्र में भी असमर्थ है आज ये नृपजन।

हे वैदेही! देखी है तुझमें लक्ष्मी सी चपलता सदा,
कैसे दे दूँ किसी पुरुष-पुरातन के हाथों में तुझको।
आये हैं नरेश विश्व के हर छोर से,
किन्तु पाना चाहते हैं सब तुझे हाथों के ज़ोर से।

वो पुरुष ही क्या जो दुर्बल को दबाये,
बलशाली तो हिंसक पशु भी होते हैं।
वो बुद्धि ही क्या जो दूसरों को सताये,
अविवेकी पूत पर तो सदा ही कुल रोते हैं।

हे पुत्री! तू माँ गौरी सी सीधी,
कैसे सौंपूं तुझे किसी बली-हठी को,
जो तेरे इस स्त्री रूप से परे धवल मन को,
न देखना चाहता है और न सुनना।

हे विशालाक्षी! सरस्वती सी तेज है तेरी बुद्धि,
कैसे; कैसे दे दूँ तुझे किसी ऐसे दुर्बुद्धि को,
जो उसके उपयोग के स्थान पर, उसे दबाये,
स्वयं अहंकार के मद में।

इसीलिए हे जानकी! धनुष विखंडन की ये शर्त रखी थी मैंने,
बिना विवेक, सदविचार और आशीष के, केवल बाहुबल से,
इस धनुष को हिलाना भी असंभव है जानकी।
किन्तु ये न पता था कि अब पुरुष रहे ही नहीं इस धरा पर।

जिस धरती ने तुझ जैसी सुशील कन्या को जना,
उसकी गोद में एक भी सुकुमार न हुआ...
हे सुहासिनी! तो क्या जीवन भर अब हंसी भूलकर,
संभालनी पड़ेगी सत्ता तुझे?
नहीं-नहीं मैं इतना निष्ठुर पिता नहीं,
जो छीन ले तेरी खुशियां तुझसे।

हे कान्ता! छोड़ दे तू मेरे प्रण को...
जिसे वरना चाहे वर1



Maine Chod Diya... (I left...) (Hindi)

मैंने छोड़ दिया पतंगों को लपकना,
कि चंद लड़के पतंगों से ज्यादा मेरी छलांगों को देखने लगे थे,
मैंने छोड़ दिया खुलकर खिलखिलाना,
कि चंद होठ उसे देख अजीब सी शक्लें बनाने लगे थे,
मैंने छोड़ दिया छत पर गाने गुनगुनाना,
कि पड़ोस के लड़के बिन चाहे करने लगे थे तारीफ़ उसकी,
मैंने छोड़ दिया नज़रें मिलाना,
कि समझना ही नहीं चाहती थी मैं उनकी नापाक शक्लें,
मैंने छोड़ दिया बिना चुन्नी के सड़क पर जाना,
कि चंद घूरती निगाहें अजीब लगती थीं मुझको।

क्यों कल तक जो कर कर ख़ुशी मिलती थी मुझे,
आज वो हरकतें करते हुए, मैं देखती हूँ चारों तरफ,
क्यों आज अपनी खुशी से पहले डर जाती हूँ,
कि कोई आँखें देख न लें मुझे यूँ खुशियाँ मनाते,
पता नहीं वो कौनसा अनजाना साया डराता है,
वो कौन है जिससे छुपती फिर रही हूँ मैं,
चंद अखबार की ख़बरें हैं या परिवार की नसीहतें,
जो डरा देती हैं मुझे रोज़ाना,
वो जो भी हैं... पर अब इतना तो मैं समझती हूँ,
कि मेरा अपना देश मेरे लिए सुरक्षित नहीं है।

यहाँ न्याय की देवी के घर में अंधेर भले ही न हो,
पर देर अवश्य है...
गुनहगारों के मन में डर नहीं,
पर बच जाने का यकीन है।
नेता को नेतागिरी से और बलवान को दादागिरी से,
फ़ुरसत ही नहीं...
और सफेदपोशों के काले हाथ अंधों को दिखते ही नहीं।
वैसे किसी को यहाँ किसी दूसरे के फटे में हाथ नहीं देना,
लेकिन आँख, कान और मुँह वहीं घुसाए रखने हैं।
धृष्ट से लेकर भ्रष्ट तक सब मौसी के लड़के हैं,
और बिना अपने उल्लू को सीधा किये कोई लाचार का सगा नहीं है।

अपनी जाति को रोज़ अखबारों में लाचारी से मरते-घुटते देख,
तिल-तिल कर जो मैं मरती-डरती जाती हूँ,
ये जो हवा खराब हो गई है मेरे देश की,
उसमें जब मैं सांस1



Andhi Galiyan (Hindi)

अंधी गलियां,
जिन्हें नहीं मिलती कोई चौड़ी सड़क,
ग़ुम हो जाती हैं,
जाकर चंद दरवाजों पर,
जो अपनी ही अकड़ में,
खुलने से मना कर देते हैं,
और फिर एक दिन,
बाढ़ के पानी से तरबतर हो,
खुद भटक औरों को भी भटका देती हैं ये - अंधी गलियां।



Khar (Enmity) (Hindi)

बहुत ख़ार है तेरे भीतर, कुछ ख़ार यहाँ है बाकी,
लहरें-तूफ़ां अनेकों, मेरे मन के भी ये साथी।
इतने तूफानों में भी, है मौन खड़ा तू जैसे,
वैसी ही मौन हूँ मैं भी, पर शांत कहूँ मैं कैसे ...

ये हवा नहीं, ना ही मौसम, जो मन को हिला-मिला दें,
कुछ रिश्तों के बंधन हैं, जहाँ शिकवे और गिला हैं।
तुझसी नहीं बलशाली, जो सबको मैं अपना लूँ,
या तो अपने रंग में रंग दूँ, या छोड़ कर उन्हें दया दूँ ...

फिर भी शांति की तलाश, ले आई मुझे यहाँ आज,
उमड़े-घुमड़े और बरसे मेरे बादल, पिघल गई मैं आज,
आँखों से आँसू बन निकला, ख़ार मिला तुझ भीतर,
तेरे मौन से मेरे मौन को मिले अनेकों उत्तर...
तेरे मौन से मेरे मौन को मिले अनेकों उत्तर।