Rakhi (Hindi)

आने वाला है राखी का त्यौहार

तेरी उम्र हो बहुत ही लंबी
और सुरक्षित रहे मेरा भी संसार,
इसीलिए इस बार, 
नहीं गई मैं बाज़ार,
आने वाला है राखी का त्यौहार...
ना ही कोई रेशम का धागा, 
ना मैं लाई मिठाई,
नहीं आऊंगी इस बार तेरे घर,
पर मत करना भैया लड़ाई,
भाभी से बँधवा लेना धागा,
और याद करना मेरा प्यार,
आने वाला है राखी का त्यौहार...
सारा साल है फीका अपना,
नहीं मना कोई भी त्यौहार,
घर ही घर में कैद हुए सब,
बस बचा रहे हैं परिवार,
खर्चे बढ़ते, घटती कमाई,
पर नहीं शिकायत भाई,
बस ये वक्त जल्द निकल जाए,
ऐसी देती हूँ दुहाई,
फिर से लगे सावन की झड़ियाँ,
झूले-मेलों की आये बहार,
आने वाला है राखी का त्यौहार...
आने वाला है राखी का त्यौहार।



Hariyaali Teej (Hindi)

हाथों में रचाकर हरी-हरी मेहँदी,
कलाईयों में हरी चूड़ियाँ डालूँ,
हरी साड़ी लपेट बदन पे,
खुद को हरी धरती सा सजा लूँ,
सखियों संग झूमूं किसी बगीचे में,
साज-श्रृंगार की बातें बना लूँ,
मगर क्यूँ नहीं आज सही मायने में
मैं ये त्यौहार मना लूँ,
पार्लर की बजाय नर्सरी को जा
चंद नए पौधे लिवा लूँ,
हाथों को मेहँदी की जगह
गीली मिट्टी से सजा लूँ,
और खुद सँवरने से पहले
एक पौधे को सँवारने की जिम्मेदारी उठा लूँ,
हरे बगीचे में तो सब जाते हैं,
पर आज किसी सूखे स्थान को हरा-भरा बना लूँ,
और उस हरे पौधे की दुआ से ही आज,
मैं ये हरियाली तीज मना लूँ,
मैं ये हरियाली तीज मना लूँ।



Hum Paudhe (Hindi)

खरपतवार की तरह उगे हुए थे
हम जंगल के पौधे,
मज़ा बड़ा था, बस डरते थे,
कोई हमें नहीं रौंदे,
उस खुले अल्हड़ बचपन को हटा
किसी ने सभ्यता सिखलाई,
हाँ, निखारा व्यक्तित्व को मेरे
और नई जमीन दिखलाई,
आज सभ्य हूँ, सही जगह हूँ,
देती आश्रय सबको,
पर वो मासूमियत-अल्हड़ता चली गई,
ढूंढ़ रही मैं जिसको,
पूर्णता तो कभी नहीं थी,
बस तब था अबोध मन प्यारा,
अब संकटों से झूझता सा जीवन,
जग कहता इसे अनुभव हमारा।



Coronatime Humor (Humor)

तब

पत्नी गेट पर खड़ी कर रही थी इंतज़ार,  
हाथों में था पति के लिए एक उपहार,  
आते ही पति के हुई वर्षा सेंट की,  
और गले में डाला बाहों का हार,  
भीतर जाते ही दिया पानी,  
चलाई कूलर की ठंडी बयार,  
दिखा कर फेवरेट खाना पत्नी यूं चिल्लाई,  
जानू, बाद में लेना बदल कपड़े,  
पहले चखो घर की बनी रस मलाई।  

अब

पत्नी आज भी गेट पर खड़ी कर रही थी इंतजार,  
हाथों में था पति के लिए सेनेटाइजर का उपहार,  
और दस कदम की दूरी बना वो चिल्लाई,  
कहीं किसी से की तो नहीं हाथ मिलाई,  
चलो अब बंद है तुम्हारा हवा, पानी,  
सबसे पहले नहा कर बहाओ कोरोना प्राणी,   
फिर अपने कपड़े आप ही धुल कर आना,  
तभी मिलेगा तुम्हें कोरोना टाइम में खाना।



Thank You God (Hindi)

धन्यवाद

जब जब मैंने खुद को सेवाकार्य में रत कुछ महान पाया,
धन्यवाद हे प्रभु! तुमने मुझसे महान सेवादार दिखलाया,
जब लगा तेरी भक्ति में लीन मैं कोई साधवी हो गई,
तो धन्यवाद प्रभु! पुनः मोह में फँसा, मेरा भ्रम हटाया,
जब लगा कुछ नया खोज पाई इस जगत में,
धन्यवाद प्रभु! तुमने पहले किये गए शोध को पढ़वाया,
जब लगा संसार में सबसे अनोखी प्राणी हूँ मैं,
तो तुमने मुझसे अनोखे प्राणियों से मिलवाया
और तो और जब सबसे दुःखी होने का आभास हुआ,
तो धन्यवाद कि तुमने तभी मुझसे ज्यादा पीड़ित दिखलाया,
धन्यवाद कि मैंने सदा अकेले चलना चाहा
और तुम किसी न किसी रूप में मेरे साथ चलते रहे,
मुझे लगा कि मुझे कोई नहीं सुन रहा,
पर तुम हमेशा मुझे सुनते रहे,
हर बाधा से निकाला, हर परीक्षा में सफल कराया,
कभी दिया सबक और कभी बिखरा दी अपनी माया,
धन्यवाद हे प्रभु! मुझे एक बहुत ही आम सा खास जीवन देने के लिए
और धन्यवाद मेरा ये धन्यवाद सुन लेने के लिए।



Pita ka Pyar (Father's Love) (Hindi)

# एक जंगल ऐसा भी

बड़े प्यार से किसी पिता ने
बेटे जी के सुख की ख़ातिर
बना दिया है प्यारा जंगल
ताकि बच्चे छोड़ें दंगल।
कहीं पे बंदर, कहीं बघेरा,
कहीं डला है शेर का डेरा,
कहीं पे हाथी, कहीं हिरण है,
नदी में पड़ती सूर्य किरण है।
जुगत लगा कर, चीज़ बचा कर,
जोड़-तोड़ कर बना है सारा,
प्यारे बच्चे भूल भी जायें,
याद रखेगा बाप हमारा।
माँ की ममता अपनी जगह है,
बाप के प्यार का नाम नहीं है,
सारे दिन की थकान के बाद,
रातों को उसका काम यही है।
गुमनामी ही उसे मिलेगी,
भूल जाएंगे इस प्यार को इक दिन,
याद रखेगा परमपिता पर,
उसके प्यार को तारे गिन-गिन।



Diye Ki Lau (Hindi)

दिये की लौ

दिये की लौ,
मेरे मनोभावों सी,
कभी अदम्य,
कभी वो मद्धम,
कभी चंचल अनुरागों सी,
कभी खुद जलती,
कभी जलाती,
कभी विरक्ति दर्शाती सी,
चाहे जो, चाहे हो जैसी,
पर सदा प्रकाश फैलाती सी,
उज्ज्वल सी वो,
निर्मल सी वो,
ईश्वर के लिए स्थान बनाती सी,
निराश मन में,
आशा भर दे,
ऐसी कान्ति बिखराती सी,
दिये की लौ,
मेरे मनोभावों सी,
जैसी हूँ,
वैसा दिखाती सी।



Sapna (Hindi)

शब्दजाल


मेरा सपना मैं सुना सकती हूँ,
पर मेरी सपना को मैं सुना सकती नहीं।
मेरा सपना खुली आँखों से दिखता नहीं,
पर मेरी सपना को मैं,
आँखों में ही छुपा सकती नहीं।
मेरा सपना सब कह देता है,
पर फिर भी चुप ही रहता है,
मेरी सपना कभी कुछ कहती नहीं,
पर चुप तो वो रहती भी नहीं।
मेरा सपना तो मेरा ही अपना है,
मुझमें समाया, मुझमें जन्मा,
मेरी सपना मुझसे भी आगे है,
फिर भी है मुझसे ज्यादा मेरी,
मेरा सपना तो अजनबी है लेकिन,
मेरी सपना तो है मेरे सपने जैसी।
शब्दों का मायाजाल यहाँ,
है भँवर बड़ा जंजाल यहाँ,
जब सपना है मेरा पुरुष साथी,
तो क्यूँ उसमें स्त्री ध्वनि आती,
क्यूँ सपना मुझको आता है,
और मेरी सपना है चल आती।



Dar Lagta hai (Hindi)

डर लगता है उस घूरते हुए चेहरे से,
कभी मेरे हँसने पर तो कभी उदास होने पर,
कभी मेरे गाने पर तो कभी बाहर जाने पर,
वो चेहरा मुझे घूरता रहता है,
न जाने क्यूँ वो हँसता नहीं,
मुझसा है, पर मुझसा नहीं,
वो जब चाहे, जहाँ चाहे मुझे घूरता है,
और कल जब उसे हँसते देखा,
तो उस भद्दी हँसी में उसका काला चेहरा
और भी डराने लगा,
डर लगता है उस घूरते हुए चेहरे से,
तो कल मैंने उसे घूर लिया,
तो मेरे इस साहस को दबाने के लिए
वो बोला,
मैं तुम्हें डराना नहीं, बचाना चाहता हूँ,
तुम्हारे कोमल मन को कोई ठेस न लगे,
ये ही कार्य है मेरा,
मैंने माना और मुँह फ़ेर लिया,
पर फिर सोचने लगी...
ये वही घूरने वाला चेहरा तो है,
जो हर बार अलग-अलग तरीके से,
ठेस लगाता है मेरे कोमल मन को,
हाँ, बहुत डर लगता है,
उस घूरते हुए चेहरे से,
जो हर घड़ी मेरा पीछा भी करता है
और मेरा इंतज़ार भी।



Kaisa Saal (Hindi)

जाने ये कैसा साल है,
सबका बुरा सा हाल है,
कहीं कोरोना, कहीं अम्फान,
तो कहीं टिड्डियों का बवाल है।

वक्री सारे ग्रह बैठे हैं
मित्र भी शत्रु बन बैठे हैं,
दांव लगी है मेहनत सारी,
पैसों का भी सवाल है,
जाने ये कैसा साल है,
सबका बुरा सा हाल है।

खर्चे सिर चढ़ कर बोले हैं,
उधारी के फंदे घोले हैं,
फिर भी नहीं फ़िकर है उनकी,
क्योंकि जान खुद ही बेहाल है,
जाने ये कैसा साल है,
सबका बुरा सा हाल है।

आपद का अम्बार लगा है,
नहीं कोई व्यापार चला है,
तंगी-भूख-मंदी से घिरे हैं,
सबकी बिगड़ी चाल है,
जाने ये कैसा साल है,
सबका बुरा सा हाल है।

लगता है दुनिया डूबेगी,
आधी आबादी न रहेगी,
ऊपर से नीचे तक खुलता,
बड़ा काल का गाल है,
जाने ये कैसा साल है,
सबका बुरा सा हाल है।



Phool Aur Taare (Hindi)

रोज़ भोर होते ही छुप जाते हो,
ऐ तारों सुबह-सुबह कहाँ जाते हो,
खिल रहे हैं फूल मेरी फुलवारी में,
कहीं वो ही बनकर तो न आ जाते हो,
देखा है मैंने बन्द होते फूलों को शाम में,
और तभी तुम्हें लुक-छिप कर वापिस आते,
अच्छा मेरा इक काम करना,
उस चमकते चाँद को बोलना,
उगाया है कमल भी इसी बगीचे में मैंने,
पर वो अभी तक खिला नहीं,
जो चाँद कमल बन आये,
तो शायद वो भी खिल जाये,
और कल की बीती रात की तरह,
मेरी फुलवारी भी पूरी हो जाये।



Yaaden (Hindi)

मेरे अक्स का दीदार कर मैं शरमा गई,
आईने में देख तेरी कोई बात याद आ गई,
बस यूँ ही देखते, खुद को सँवारते,
पता नहीं कब सुबह बीती,
और तुझसे मिलने की घड़ी आ गई,
मिलना तो था,
पर जमीं में कदम धँस गए,
जब तेरी फ़ोटो पर चढ़ी माला के फूलों में,
मेरी चुनरी के तार फँस गए।

रोती भी हूँ और चुप होती भी हूँ,
कभी तेरे जाने को सोचकर, कभी तेरे होने को जानकर...



Chullu Bhar Paani (Hindi-Humor)



चुल्लू भर पानी

बहुत सोचती थी,
मुहावरों की हक़ीक़त नहीं होती,
ऐसे ही किसी ने गढ़ दिए,
कमाने को रोटी।

अब चुल्लू भर पानी में कोई डूबेगा कैसे,
सोच सोच हँसती थी, ऐसी कल्पना की कैसे।

मगर जब मैं रोई, तो चुल्लू भर पानी हाथ आया,
दिल डूब चुका था मेरा, मन में बाढ़ था वो लाया।

समझी फिर हक़ीक़त, याद आई वो कहावत,
कैसे चुल्लू भर पानी ने मेरे ख़्वाबों को बहाया,
एक मन मरा था, दूजा उदास अब खड़ा था,
तनहा वो था इतना, जैसे ज़बरन हो जगत् में आया।

आँखों के चुल्लू भर पानी में नहा,
गंगा स्नान सा आनंद पा,
पवित्रता का चोला ओढ़े,
मरे मन को जला,
अब साथ मेरे खड़ा था मेरा नया मन,
पवित्र, पावन, निरपराध मेरा नया मन।



Friendship Day (Hindi)

आज अपने पुराने दोस्तों से मिलने गई थी....
ना आँख में काजल डाला था
ना कान में पहनी थी बाली
एक पुरानी जींस और शर्ट मैंने डाली
ना सेल्फ़ी खिंचवानी थी
ना मेक-अप से ख़ुद को छिपाना था
मैं जैसी थी, मैं जो भी थी
वैसे ही मिलने जाना था
मिलना था मेरी रूहों से
जिनकी रूहों में मैं थी बसी
कुछ उनकी सुनके आना था
कुछ अपनी कहने जाना था
जो सोचा उससे ज़्यादा मिला
आज लगा की फिर मैं पूरी हुई
शुक्रिया मेरी उन रूहों का
जो आज फिर मुझ में आ मिलीं
ना नक़ाब था, ना कोई पर्दा
बस बातों में हम घुलते गए
कुछ कहते गए, कुछ सुनते गए
मन की परतों को चुनते गए
ना शिकवे किए
ना वादे किए
बस जो मन में था
वही बातें किए
जब चुप हो गए
तो थोड़ा रो गए
और फिर हँस लिए
और हम चल दिए
और यूँ इस तरह
आज फिर पूरा हुआ
दोस्ती का ये फ़र्ज़
आज दोस्ती के दिन।



Deshprem (Hindi)

बहुत से तरीक़े हैं देशप्रेम दिखाने के,
ज़रूरी नहीं कि मैं बम से पाकिस्तान ही गिराऊँ।

किसी बच्चे को पढ़ाकर,
किसी पेड़ को बड़ा कर,
नशे की लत को छुड़ाकर,
किसी बिगड़े को बचा कर,

नदियों को निर्मल कर,
फसलों को सिंचित कर,
नाले को राह दिखा कर,
कचरा ना फैला कर,

गायों को पालकर,
गरीबों को दान कर,
मंदिर में सेवा कर,
सब लोगों का मान कर,

आपस में सुलह कर,
गाली-गलौंच हटा कर,
विज्ञान की बातें कर,
ज्ञान की गंगा बहा कर,

रिश्वत से दूर रहकर,
कुरीतियों को रुकवा कर,
नियमों का पालन कर,
प्रदूषण ना फैला कर,

सड़क पर ना थूककर,
होटल से सामान ना चुराकर,
धरोहरों पर नाम ना लिख कर,
ट्रेन की सीटों को ना फाड़कर,

अनेकों तरीक़े हैं, जिनसे मैं बचा सकती हूँ,
मेरे देश और मेरे देश के मान को।

ये मेरे देश की धरती है,
ये मेरी भारत माता हैं,
इनको प्रसन्न रखना मेरे मन को भाता है।
जैसा मेरा स्वभाव बना,
उससे ही कुछ रच जाऊँगी,
वो मेरी भारत माता हैं,
ऐसे ही उन्हें मनाऊँगी।



Shikaar... (Hindi)

जो शिकार होता है, वो ‘शिकार’ होता है,
क्यूँकि वो कमज़ोर है...

उसमें नहीं है ताक़त अपने आप से लड़ने की,
उसमें नहीं है ताक़त डर को पीछे छोड़ आगे बढ़ने की,
उसमें नहीं है ताक़त सच को स्वीकार करने की,
उसमें नहीं है ताक़त स्वयं को नियंत्रित रखने की,

पर जाने क्यूँ दुनिया,
उम्मीद करती है उससे ताक़त की,
जाने क्यूँ सोचती है कि वो होते तो ऐसा करते,
वो होते तो वैसा करते,

अरे वो होते ही नहीं ना...
क्यूँकि जो शिकार होता है,
वो ‘शिकार’ होता है,
क्यूँकि वो कमज़ोर है...

और ‘दुनिया’ में तो बहुत ताक़त है,
‘दुनिया’ ना तो तनहा है
और ना ही कमज़ोर...
और ‘दुनिया’ के पास ज़ुबान भी है,
इसीलिए तो वो ‘शिकार’ नहीं है,

पर जब वो अपने डर को पीछे छोड़
अपनी क्षमताओं से भी आगे बढ़ जाता है...
एक छोटा मेमना शेर से लड़ जाता है...
या सहमने की जगह भीड़ में चढ़ जाता है...

तो छीन लाता है वो एक ज़िंदगी और एक ख़ुशी,
एक नई सोच और एक नया तज़ुरबा...
जो बनाते हैं उसे भीड़ से अलग एक मिसाल,
नहीं करती दुनिया उससे फिर कोई सवाल,

और वो नहीं रह जाता ‘शिकार’|



Jara Si Baat... (Hindi)

ज़रा सी बात थी और...
मैंने मन में सोच सोच उलझा लिया
मैं चाहती थी कि तुम सुलझाओ,
पर सच में उलझन कहाँ है,
ये क्या जान पाते तुम,
पर तुम्हारी चाहते हुए भी,
ना कि गई कोशिश से,
मेरे ग़ुस्से ने जो उस पर ताला लगाया,
उसने मुझे अब बहुत दूर ला दिया,
ज़रा सी ही तो बात थी...

मैं जानती हूँ,
तुम ग़लत नहीं, अनजान थे,
और मैं परेशान,
बस बिन कहे क्यूँ नहीं समझ पाए तुम?
ज़रा सी ही तो बात थी...

अब चाहती हूँ,
जो हुआ उसे भुला आगे बढ़ जाना,
पर क्या तुम आज भी दोगे मेरा साथ?
फिर उलझ रही हूँ अपने सवालों में,
अपने ही मन में,
क्यूँ नहीं ख़ुद से खोल देती,
मेरे मन की गाँठें,
क्यूँ नहीं तुम्हें बोल देती,
जो मेरा मन चाहे,
आख़िर ज़रा सी ही तो बात थी...



Indian Oldage Love (Hindi)

साठ पार कर चुके थे दौनों,
फिर भी कहासुनी सारी थी,
इक दूजे बिन रह नहीं पायें,
पर दौनों को ज़िद प्यारी थी।

ज़िद थी भी इतनी प्यारी,
जो करती थी रिश्तों को गहरा,
इक दूजे को समझते दौनों,
इसीलिए था पहरा।

पहरा था गहरा,
नहीं देतीं मिठाई उनको सीधे,
पर उनके हिस्से की फ़्रिज में,
छोड़ देतीं थी धीरे,
पर उनके खा लेते ही,
मचता रोज़ बवाल,
साठ पार खाते हो मिठाई,
होगा तुम्हारा क्या हाल,
अब जाओ दौड़ने और
पीछे से मैं भी आती हूँ,
कहीं बीच में बैठ ना जाओ,
पूरा पता लगाती हूँ।

पता लगा लो तुम पूरा,
और पीछे मेरे आओ,
जो साठ पार मिठाई तुमने खाई,
उसको तुम भी पचाओ,
आख़िर तुम बिन कोई नहीं अब
इस दुनिया में मेरा,
तेरी ज़िदों के बिना
नहीं पचेगा खाना मेरा।

अच्छा तो ये प्यार नहीं,
इसमें भी तेरा स्वार्थ,
जो कोई और होता दुनिया में
तो करते भी नहीं बात।

करता नहीं जो बात,
तो क्या तुम चुप हो जाती,
सालों हो गए सुनते,
बस तुम अपनी गातीं,
कभी ज़बरन काम पर भेजतीं,
देकर गाली हज़ार,
रोज़ नई चीज़ों की फ़रमाइश,
इतना ही था प्यार।

हाँ इतना ही था प्यार,
बनाया तुमको लायक़,
घर संसार बसाया तेरा,
पर तुम तो रहे खलनायक,
जो भी ख़रीदा, तेरे लिए था,
नहीं अपने लिए बचाया,
फिर भी देखो तुमने मुझको,
इतना कुछ है सुनाया,
जो इतनी बुरी थी लगती,
तो क्यूँ रोज़ गज़रा थे लाते,
क्यूँ कम पैसों में भी तुम
मुझको हर वीक घुमा कर लाते।

लाता था हर वीक घुमा कर,
और तेरे लिए गज़रा,
ठंडी रहे तू, सजी रहे तू,
ये ही स्वारथ बस था,
पर मेरे प्यार को तू समझ ना पाई,
हाय री मेरी क़िस्मत,
हो चला हूँ बुड्ढा, अब तो बक्श दे,
मौत दे रही दस्तक।

मौत दे दस्तक दुश्मन के,
मैं सदा1



Desire - Chahat (Hindi)

जिस डगर से हम निकलें,
कारवां साथ हो ले,
जिस सफर पे जाएँ,
फलसफे लिखे जाएँ,
बंजर जमीन हो तो,
फसल लहलाये,
जो छू लें रेत को तो,
सब सोना बन जाए,
इतना करें करम कि,
पूछे प्रभु भी हम से,
बोल ऐसा है क्या,
जो तेरे क़दमों में रखा जाये....



Gandhi Ki Kismat (Hindi)

अपनी अपनी क़िस्मत

हाड़ माँस का पुतला था वो,
सत्य के लिए लड़ता था,
अपने ही देश के लिए नहीं,
वो मानवमात्र से प्रेम करता था,
फिर भी उसके अपनों ने ही,
उसकी नहीं क़दर जानी,
ये अपनी-अपनी क़िस्मत है,
ये ही है क़िस्मत की कहानी।

एक देश आज़ाद कराया,
दूजा आज़ादी पर था,
पर एक विभाजन रोक ना पाया,
ऐसा ही क़िस्मत में था,
वो क्या सिखा गया हमको,
क्या राह दिखा दी जन-जन को,
उसको नहीं याद रखा हमने,
ऐसे कैसे हम अभिमानी,
ये अपनी-अपनी क़िस्मत है,
ये ही है क़िस्मत की कहानी।

बिन हथियार किए उसने वार,
सारे जन-मन को था एक किया,
अपना सर्वस्व लुटाकर भी,
मन में ना उसका अहं किया,
लगता सारी जनता को था,
वो अपना सा, वो प्यारा सा,
फिर भी ना जाने क्यूँ उनमें से ही,
किसी एक ने उस पर वार किया,
ये अपनी-अपनी क़िस्मत है,
ये ही है क़िस्मत की कहानी।

उस एक को तो चलो भूल भी लो,
पर आज के जन का अब क्या करो,
जो नहीं जानते उन्हें क्या है मिला,
वो करते हैं उस संत से गिला,
ना वो पढ़ते हैं, ना समझते हैं,
बस बुराई सबकी करते हैं,
गांधी को ग़लत ठहराते हैं,
ख़ुद को सम्राट बताते हैं,
ये अपनी-अपनी क़िस्मत है,
ये ही है क़िस्मत की कहानी।

विदेशों से सम्मान मिला,
अपने देश में ही अपमान मिला,
उसने तो कुछ नहीं चाहा था,
बस अपना फ़र्ज़ निभाया था,
वो ही था किया, जो तब था सही,
हम कौन जो कह दें, कुछ किया नहीं,
हमने अब तक क्या कर डाला,
बन बैठे बिन किए हम लाला,
ये अपनी-अपनी क़िस्मत है,
ये ही है क़िस्मत की कहानी।

'गाँधी' होना छोटी बात नहीं,
सबको ले कर चलना, देना सीख सही,
अपने लिए कुछ भी रखना नहीं,
फिर भी अपनों की नफरत...
क्या ये बात है1



Bhoot Aur Bhavishya (Hindi)

भूत और भविष्य क्या है?

यादों की बारात,
सपनों की सौगात,
झूठी बुनियाद।

सच से परे,
जहाँ हैं सब मौन खड़े।

मानो या ना मानो,
ये है कल... केवल कल।
बीता या आने वाला...
जिसे देखते सब सजल।

भूत और भविष्य क्या है?

एक ठंडी राख,
जिसमें सुलगी आग,
भविष्य की ख़ातिर भूत को किया जाये याद,
भूत आये तो नहीं भूत से कम,
व्यक्ति को मिलता इससे केवल ग़म।

ये है वो ईंट, जिस पर रखी भविष्य की नींव,
जब ईंट हो ख़राब, तो ढह जाए सपनों प्यारा पुल।

भूत और भविष्य क्या है?

पर जिसने भूत जाना, वो जाने भविष्य,
वो नहीं त्रिकालवेत्ता, नहीं है वो ईश,
वो तो है साक्षात् स्वयं जगदीश।

भूत में छिपा भविष्य का ख़ज़ाना,
भूत है जैसे अनाज का एक दाना,
इसी से लेहलेहगी फसल भविष्य की,
इसी से बनेंगे भावी काम,
भूत है भविष्य का एक पैग़ाम।

भूत और भविष्य क्या है?

भविष्य है भूत की तूली से सजी तस्वीर,
जो भूत हो ख़राब, तो बिगड़े तक़दीर।

भूत से हो प्रेरणा,
शक्ति हो झेलने की,
भविष्य की वेदना।

वही सफल होगा इस जीवन पथ पर,
जो हो भूत से भविष्य की ओर अग्रसर।

भूत और भविष्य क्या है?
यह है जग का सार अनश्वर।



Kyun na main tar jaun... (Hindi)

क्यूँ न भव से मैं तर जाऊँ...

पूर्वजन्म की बात ना जानूँ,
सच है मैं तुझको नहीं पहचानूँ,
लेकिन क्यूँ नहीं मैं तर पाऊँ,
एक जनम जो हरि नर का पाऊँ...

पशु, पाषाण या कि होऊँ पत्ता,
चल नहीं पाये तब मेरी सत्ता,
पर नर देह बुद्धि है तेरी,
जिससे नर ने किस्मत फेरी,

क्यूँ नहीं फिर उस पर इतराऊं,
भाग्य बदल मैं तुझको पाऊं,

गणिका और अजामिल तारे,
नाम लिए से कष्ट निवारे,
वो हरि नाम क्यूँ मैं ले नहीं पाऊँ,
क्यूँ नहीं भव से मैं तर पाऊँ,

हे हरि! हम तुझमें हैं समाये,
तुझसे बाहर जा भी नहीं पाये,
जब तेरी ही माया और तुझको ही पाना,
तो फिर क्यूँ जन्मों का बहाना,

हे हरि! जो ऐसा हो जीवन,
नाम लेण को तरसे ये मन,
माया वश तुझको बिसराऊँ,
पर मृत्यु परे तो तुझको ही पाऊँ,

क्यूँ इस जनम में मैं तर नहीं पाऊँ,
क्यूँ इस जनम में मैं तुझे नहीं पाऊँ।



Shreshthta :: Excellence (Hindi)

हाँ मैं एक मानव हूँ और लड़ती हूँ...
कभी ये लड़ाई मेरी अपने आप से होती है, तो कभी अपने परिवार से,
तो कभी परिवार के लिए मैं लड़ रही होती हूँ, अपने दूर के रिश्तेदार से।
कभी अपने कर्मों से, अपने वृहत परिवार की श्रेष्ठता साबित करती हूँ ,
तो कभी अपनी जाति की महानता के लिए धर्म के कार्य करती हूँ।
कभी अपने नगर की प्रतिनिधि बन, दिखाती हूँ नगर का जोश,
कभी दुश्मन देश के नापाक इरादों पर प्रकट करती हूँ मन का रोष।
कभी देशहित में आने लगते हैं मेरे मन में विचार,
तो कभी प्राकृतिक आपदाओं में मेरा हो जाता है पूरा संसार।
कभी देशवासियों की विजय पर बजा रही होती हूँ ताली,
तो कभी विज्ञान की नई खोज पर कर रही होती हूँ आँखों से आँसू खाली।
हाँ मैं लड़ती हूँ और स्वयं को श्रेष्ठ साबित करती हूँ...
कभी स्वयं में, तो कभी समूह में, तो कभी-कभी सम्पूर्णता में।
पर हाँ मेरे प्रयास होते हैं ‘श्रेष्ठता’ की ओर...
और जब आप सच्चे मन से सही शब्दों में ‘श्रेष्ठ’ बन रहे होते हैं,
तो आप अपने और सम्पूर्ण मानव जाति के काम आते हैं,
किसी को मन-कर्म-वचन से हानि नहीं पहुँचाते...
आप बस विकसित होते हैं... और विकसित करते हैं।
तो आइये आप सभी आइये,
इस ‘श्रेष्ठता की दौड़' में मेरे साथ आइये,
मुझे पीछे छोड़ आगे जाइये...
क्यूँकि आप जीतें या मैं, उद्देश्य पूरा होगा मेरा ही...
क्यूँकि मैं एक मानव हूँ और लड़ती हूँ...
ये सबसे प्यारी ‘श्रेष्ठता की दौड़'।



Vande Matram (Hindi)

देख आँखों में अश्रु नहीं,
मन के मेरे अंगारे हैं,
यूँ आतंकी हमलों में मरने को नहीं,
भारत माँ ने बेटे सँवारे हैं,
अब जवाब देना होगा तेरे नापाक़ इरादों को,
हम धैर्यवान हैं, बुझदिल नहीं,
यहाँ सब हाथों में तलवारें हैं।

हर बार तू अंदर आया है,
धोखे से हमें सताया है,
पर शायद तुझको ये भान नहीं,
'वन्दे मातरम्' की शक्ति का ज्ञान नहीं,
ये शब्द नहीं, ये धड़कन है,
ये जन-जन का अंतर्मन है,
भारत माँ का आह्वान है,
एक पूजा है, एक अनुष्ठान है,
तू भूल गया कारगिल का युद्ध,
माता ने विफल किये थे तेरे आयुध,
उस माँ के बच्चों को सताता है,
तू सच में अपनी मौत बुलाता है,
अब नहीं बचा समय जो कहूँ तू डर जा,
अब तो बस कहती हूँ तू मर जा,
जो बाप है तेरा उसको भी ले आ,
ला बतलाऊँ तेरी औकात है क्या,
हर दिल हर धड़कन कहती है,
लड़ ले और मुँह की खा के जा।

जिसके बारे में कहते थे,
सूर्य अस्त नहीं होगा इसका कभी,
उसको भी धो डाला था,
फिर तेरी तो बिसात है क्या,
सल्तनतें आईं और फ़ना हुईं,
मेरी हस्ती न मुझसे जुदा हुई,
तिनके सा तू उड़ जाएगा,
चीन भी तुझे बचा ना पायेगा,
बस ध्यान मग्न हैं मेरी देवी माँ,
उनको ना तू ललकार यहाँ,
भारत माँ जो उठ आईं तो,
सोच तेरा फिर होगा क्या।

वन्दे मातरम् मैं कहती हूँ,
वन्दे मातरम् सब बोलो यहाँ,
चलो यज्ञ में आहूति दो,
प्रसन्न होओ मेरी भारत माँ,
हे वीर! तुम अकेले नहीं सरहद पर,
जरुरत पड़ी तो हम सब हैं यहाँ,
ना हाथ कम होंगे, ना ही तलवारें,
चलो मिलकर दुश्मन को ललकारें,
दो-दो हाथ करें, छापे मारें,
आतंकियों को ही नहीं, आतंकी देशों को भी,
आओ सबक अब सिखा डालें,
वन्दे मातरम् , जय जय भारत,
सब जन मिलकर1



Bharat Mata (Hindi)

करोड़ों हाथ हैं उनके,
करोड़ों कंठों में संवाद है उनका,
'वन्दे मातरम्' मन्त्र और भारत की रज,
आशीर्वाद है उनका,
चन्दन सी महकती, लहकती हैं,
मेरी भारत माँ,
हिमालय से महासागर तक, फैली हैं,
मेरी भारत माँ,
रेगिस्तान, नदियाँ और दुर्लभ पेड़,
सब से भरपूर, सुन्दर, सुहासिनी हैं,
मेरी भारत माँ,
सब बच्चों को अलग-अलग बोलियों में,
मिठास और प्रेम से बोलना सिखातीं हैं,
मेरी भारत माँ,
दिलों में अपनेपन का एक एहसास करातीं हैं,
मेरी भारत माँ,
सीधी माँ के हम सीधे-सादे बच्चे,
दुनिया की रीत से अलग, तेजवान और निराले बच्चे,
शांत हैं और शांति प्रिय भी...
पर कोई छीने हमारे भाइयों को हमसे,
या देखे गलत इरादों से हमारी माता को,
तो बता देंगे कितना कोलाहल है इस शांति के भीतर,
'वन्दे मातरम्' शक्ति है, गौरव है, साहस है,
उसे ना ललकार ओ मतवाले,
वरना तेरे देश के हर बन्दे से बुलवा देंगे...
भारत माता की जय।



Jai Ganesh (Hindi)

हे देव तेरे... नाम हज़ार,
पूजन कर कृपा पाऊँ मैं अपार,
विशालकाय तू, महाकाय तू,
मंगलमूर्ति रूप तेरा,
सहस्त्र कोटि सूर्य प्रभा समान,
तेजोमय है स्वरुप तेरा,
धूम्रवर्ण तू, चारुकर्ण तू,
गज समान है आनन तेरा,
सुन्दर मुख है, कपिल वर्ण है,
वक्री सुण्ड और गज के कर्ण हैं,
उदर विशाल, नेत्र हैं पिंगल,
हस्त मुद्रा करती सब मंगल,
शिव के लाल, गौरी के दुलारे,
अग्रपूज्य तुम देव हमारे,
भाद्र शुक्ल चौथ को तुम आये,
मोदक प्रिय तेरा नाम कहाये,
प्रसन्नचित्त, चिंता से मुक्त तुम,
सभी विशिष्ट गुणों से युक्त तुम,
ललाट चंद्र तुम धारण करते,
चंद्र देव के अवगुण हरते,
राक्षस मूषक है वाहन तुम्हारा,
चरण धूरि से उसको संवारा,
तेरे बुद्धि कला कौशल से,
सारे जग में हुआ उजारा,
ऐसा क्या जो सुलझ न पाए,
कौन शत्रु तुझे रण में हराये,
सबके बिगड़े काम बना दे,
मनवांछित वर सबको दिला दे,
रिद्धि-सिद्धि के तुम हो स्वामी,
बुद्धिमान तुम, अन्तर्यामी,
शुभ और लाभ हैं, सुत ये तुम्हारे,
कृपा दृष्टि ने संकट तारे,
विघ्नविनाशक, मंगलमूर्ति,
ध्यान मात्र से हो इच्छापूर्ति,
विशिष्ट नायक, गणनायक, गणपति,
विघ्नराज, पशुपालक, अधिपति,
तेरी कृपा जो होये गणेश जी,
मिट जाएँ जीवन में कलेस जी,
आओ आओ गणपति-गणनायक,
मेरे बिगड़े काज बनाओ,
अपने बुद्धि-कौशल से प्रभुजी,
मेरी नैया पार लगाओ,
शत्रु ने घेरा है, है चिंताओं का डेरा,
उनका विनाश कर, हमको बचाओ,
राक्षस रूप चंचल मन है मेरा,
धरि अपने पग करो बुद्धि का उजेरा,
आओ पधारो विनायक-विघ्नहर्ता,
आओ विराजो सर्व मंगल करता,
जय जय गनेस सर्व दुःख हर्ता
जय जय गणेश सर्व सुख करता।



Shri Krishn (Hindi)

श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारे
हे नाथ नारायण वासुदेवाय।।

सबके मन को हरने वाले,
भक्ति में आकर्षित करने वाले,
'श्री' को धारण करने वाले,
सबसे निराले आले-आले,
आते हैं श्री कृष्ण...
श्री कृष्ण, श्री कृष्ण, श्री कृष्ण
बोलो जय जय जय श्री कृष्ण।

गौओं के वंदनीय, नन्हे गौ पालक,
गौ के रक्षक, गौचारी बालक,
गौ प्रिय, गौ वर्धक, गौ रमणीय,
गौ संग आते हैं गोविन्द वंदनीय,
आते हैं गोविन्द...
गोविन्द, गोविन्द, गोविन्द,
बोलो जय जय जय गोविन्द।

विघ्नों का हरण करते हरि प्यारे,
बंधनों से मुक्ति देते वो 'सखा' रे,
हरि के रूप, चौसठ कला वाले,
सबसे प्यारे, वो सबसे निराले,
आते हैं हरे...
जय हरे, श्री हरे,
बोलो जय जय जय श्री हरे।

'मुर' राक्षस को मारने वाले,
संत जनों को तारने वाले,
मेरे मन में भी हैं कई दानव,
उन्हें हरा 'मुरारी', बनाओ मुझे मानव,
ऐसे आते हैं मुरारी...
बोलो मुरारे, जय मुरारे,
बोलो जय जय जय मुरारे।

तुम हो नाथ, मेरा देना सदा साथ,
थाम लो हाथ, अब आओ जगन्नाथ,
मुझे लो उबार, कर रही मैं पुकार,
हे नाथ, जय नाथ, जय जय हे नाथ,
बोलो हे नाथ, जय नाथ,
बोलो जय जय हे नाथ।

नारायण के रूप तुम्हीं हो,
चौसठ कलाओं के भूप (राजा) तुम्हीं हो,
तुम ही रक्षक, तुम ही हो पालक,
तुम ही लक्ष्मीपते नारायण कहाते,
शत्रु-विनाश को, भक्त की पुकार पर,
नारायण गरुड़ लेकर शीघ्र-शीघ्र आते,
जय नारायण, लक्ष्मी-नारायण,
बोलो जय जय जय हे नारायण।

वासुदेव-देवकी की आँखों के तारे,
जसोदा-नन्द के लाल, गोपियों के प्यारे,
भाद्रपद अष्टमी की काली रात में तुम आये,
सबके प्राणों (वसु) के रक्षक, वासुदेव-नंदन कहलाये,
जय वासुदेवाय, जय वासुदेवाय,
बोलो जय जय हे वासुदेवाय।

श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारे
हे नाथ नारायण वासुदेवाय।।

श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारे
हे नाथ नारायण वासुदेवाय।।



Swatantra - Independent (Hindi)

'स्वतंत्र' कोई संज्ञा नहीं... एक विचार है।
स्वतंत्र कोई तन से नहीं मन से होता है।
अत्याचार तो राजतंत्र, परतंत्र और जनतंत्र तीनों में हुए,
'तन' तो सदा घायल ही रहा... 'तेरा' भी और 'मेरा' भी।
'तू' और 'मैं' कल भी चिल्लाये थे 'मरा-मरा' और आज भी,
ना कल 'हमने' कुछ किया था, ना आज किया है।
कल चौपालों पर बैठे बतियाते थे,
आज सोशल मीडिया पर...
पर समस्या कल भी थी और आज भी है।

कल चन्द लोग चिल्लाये थे...
'हम' स्वतंत्र होकर रहेंगे, और 'वो' स्वतंत्र हुए भी।
'परतंत्रता' के विचारों को पीछे छोड़,
वो बतियाये नहीं... लड़े।
कुछ जिये... कुछ मरे... पर कुछ कर गए।
'हमने' कुछ नहीं किया, बस चिल्लाये...
'हम तुम्हारे साथ हैं'।
उनके साथ नारे लगाए, उनके साथ अत्याचार सहे,
पर 'सोच'... सोच ही तो ना पाए कि क्या किया जाए।

और 'स्वतंत्र' कोई संज्ञा नहीं... एक विचार है,
बिना 'सोचे' कैसे पूरा हो सकता है।

कल हम 'सेवक' बनाये गए, तो 'सेवा' देने लगे,
'सोच' नहीं थी वहाँ..., सिर्फ 'निर्देश' थे,
आज हमें 'जनसेवक' दिए गए,
पर मालिक की सोच तो होनी चाहिए,
बिना सोच, बिना निर्देश सेवक काम नहीं करते,
हमें तो खुद नहीं पता की हम क्या चाहते हैं...
कैसे पूरा कर सकते हैं अपने सपनों को...

कल कुछ अत्याचारी मालिकों के अधीन थे,
आज कुछ मनमाने 'सेवकों' के।
हम डरते हैं और कुछ नहीं करते हैं,
इसीलिए खैरात में स्वतंत्रता मिलने के बाद भी,
हम परतंत्र हैं।

क्योंकि 'स्वतंत्रता' कोई तोहफ़ा नहीं,
जो दिया या लिया जा सके...
वो एक विचार है...
जो 'मेरे' और 'तेरे' अंतर्मन में निहित है।

बस वो है एक विचार और मैं उसकी 'विचारक'।



Teej Ki Sawaari (Hindi)

लहर-लहर लहराये लहरियो,
बरसे बदरा, बोले मोरियो,
गाये पपीहा, कोयल कुहुके,
आतीं हैं मैया रुक-रुक के...

पालकियों की शान है आई,
बघ्घियाँ भी सजी हैं भाई,
स्वर्ण-रजत से भरे हैं थाल,
मुक्ताहार, और भी माल...

आगे-आगे चलते हैं हाथी माता के,
ऊंट-घोड़े सजे खड़े हैं जीवनदाता के।

देखो इनकी चुनरी प्यारी,
देखो इनका घघरा भारी,
घघरे पर क्या है चित्रकारी,
सब अनमोल भये हैं...

सोलह सावन झूल लिए हैं,
सखियों से सब भेंट लिए हैं,
सोलह श्रृंगार माँ ने किये हैं,
मेंहदी से हाथ सजा लिए हैं...

उनके दर्शन पाने आये, शीश झुकायें, सब माता के,
सच्चा सुख मिलता है, अपने जीवनदाता से।

माता मेरी, माता भवानी,
शिव से है ये प्रीत पुरानी,
कथा नहीं जाए ये बख़ानी,
शिवपुर को हैं चलीं भवानी...

मांग भर रहे हैं त्रिपुरारी,
साथ खड़े शिवगण भयकारी,
गौरी माँ की शोभा भारी,
सब के सब मगन भये हैं...

आओ-आओ दौड़ के आओ पाने दर्शन माता के,
सच्चा सुख मिलता है, अपने जीवनदाता से।

इसी कथा के प्रतीक में अभी,
मना रहे तीज-त्यौहार सभी,
आतीं हैं मैया तीजों में,
जब बरखा छींट पड़े हैं...

माँ की लीला अपरम्पारी,
देख-देख हरषे नर-नारी,
नर-नारी हरषे अति सुन्दर,
माँ दे रहीं सबको इच्छित वर...

सारा जग है उमड़ पड़ा पाने आशीष माता के,
सच्चा सुख मिलता है, अपने जीवनदाता से।

आओ देखें माँ की सवारी,
उनकी शोभा है अति प्यारी,
खायें झूले, मचाएं धूम,
मस्ती में सब रहे हैं झूम...

मैया के आगे हम नाचें,
खूब बजाएं ढोल-नताशे,
कर प्रणाम गौरी मैया को,
बांटो बच्चों में तुम बताशे...

सज-धज कर सब आये देखो, भक्त माता के,
सच्चा सुख मिलता है, अपने जीवनदाता से।

करो आरती, गाओ स्तुति,
मंगलकारी गीत सुनाओ,
अपने सुहाग की करो प्रार्थना,
और अमर वर पाओ...
गाओ गाओ गाओ सभी, मंगलगीत गाओ,
हाँ गाओ गाओ गाओ सभी, मंगलगीत गाओ।

परणाम कर लो सभी, तीज माता के,1



Andher Nagari (Hindi-Poetry)

छाया है अँधेरा चहुँ ओर, चहुँ ओर,
चाहें हम कोई आके काटे बंधनों की डोर,
आम आदमी त्रस्त बिचारा, ना ठिया, ना ठोर,
अफ़सर-नेता सबको लूटें, घूमें बन के मोर,

फ्री है इनका बिजली-पानी, मकान-गाड़ियाँ-सैर,
फिर भी लेते रिश्वत मोटी, उलटे इनके पैर,
जनसेवक नहीं करते सेवा, करते अपनों की खैर,
इनका मालिक भूखा-नंगा, उससे रखते बैर,

बिदेसों से सीख के आते, कैसे चलायें देस,
लेकिन क्यों नहीं मिटने देते जांति-पाँति के क्लेस,
बिदेसों में योग्य को पॉवर, नो आरक्षण फेस,
भारत के ये रक्षित नेता नहीं बढ़ने देते देस,

डॉक्टर-इंजीनियर थर्ड डिवीज़न, आरक्षण है बेस,
कैसे मेरा देस बढ़ेगा जब टीचर का भी ये ही भेस,
ऊपर से नीचे तक सारे सिस्टम का यही केस,
आज इसीलिए पिछड़ा भारत, लगी है लम्बी रेस,

भारत में आम आदमी घायल, नेता का रेला सड़क पर,
एक नहीं कई गाड़ियां जातीं, इतना क्यों है नेता को डर,
सारी पब्लिक रोक दी जाती, क्यों नहीं रहता वो घर पर,
गलत धंधों को वो है करता, पुलिस का डंडा जनता पर,

बाढ़ में जनता नीचे रोये, नेता दिखे आसमां पर,
मदद जो करनी, दुःख जो बाँटना, तो क्यों नहीं आता जमीं पर,
दंगल करे फिर भी जेल में सुविधा, उसका जेल स्वर्ग से सुन्दर,
आम आदमी को सब ही नचायें बना रखा है बन्दर,

जो विरोध नेता का कर दे, उसके मुँह पर टेप,
नेता का चहेता खुला घूमता, चाहे किया हो रेप,
आज़ाद भारत की जनता बंदी, मीडिया पर पाबंदी,
नेता का गुणगान करे वो जिन्दा, ये है राजनीति गंदी,

रातों-रात आदेश हों पारित, मिसाइल गिरे जनता पर,
सरहद के सैनिक हैं मरते, पर तब चुप रहे सिकंदर,
जहाँ देश की स्त्री आशंकित, कैसे सोये ये घर के अंदर,
त्राहि-त्राहि जनता है करती, नेता है मस्त-कलंदर,

कुछ भी हो अच्छा देस के अंदर, उसका क्रेडिट ये खाये,
और बुरा हो या बात बिगड़े1



Vastvikta ka Swapn (Hindi-Poetry)

कल रात मैंने देखा स्वप्न में,
कैसे ईश्वर..., कैसी मैं हूँ।

वो पुरुष बड़े थे बलशाली,
विशालकाय और अतिभारी,
ना आदि दिखा, ना अंत दिखा,
पर अपना स्वरुप निश्शंक दिखा,

मैं थी रक्त की इक बून्द सम,
बह रही थी उसके अंगों में,
वो अंग क्या था मुझे नहीं पता,
ईश्वर था कैसा, ये मुझे नहीं दिखा,

पर हाँ मैं अनुभव कर पाई,
उसकी हर साँस, उसकी धड़कन,
वो बाहर था, वो भीतर था,
था चला रहा मेरा जीवन,

मैं हिलती थी, मैं बहती थी,
पर नहीं थी इच्छा वो मेरी,
थी समझ रही, थी मैं जान रही,
पर बस ना था उस होनी पर,

मेरे करने को कुछ ना था,
वो ईश्वर था मुझे हिला रहा,
उसके अंगों भीतर बहती,
इक रक्त-बून्द को चला रहा,

हुआ क्षोभ यही, मैं थी जड़ सी,
वो मुझको चेतन बना रहा,
मुझसे मेरे 'मैं' को हर,
मुझको था स्वयं में मिला रहा,

मेरा अपना कोई नाम नहीं,
अस्तित्व नहीं, पहचान नहीं,
कोई रूप नहीं, आकार नहीं,
मन से कर लूँ ऐसी बात नहीं,

एक प्रक्रिया का क्षणिक भाग,
मन में ना कोई इच्छा, ना कोई राग,
सब जैसी साधारण सी मैं थी,
ना जाने किस कार्य के लिए बनी,

नहीं देख कभी मैं पाऊँगी,
मेरा ईश्वर दिखता कैसा,
है पुरुष या कि स्त्री स्वरुप,
कैसा मोहक है उसका रूप,

मैं हतप्रभ थी ये जान वहाँ,
मैं थी ईश्वर का भाग वहाँ,
कह सकती थी, मैं हूँ ईश्वर,
बसता वो मेरे बाहर-भीतर,

मेरे भीतर, तेरे भीतर,
वो बसा हुआ सबके भीतर,
या कहना यही उचित होगा,
कि हम सब थे उसके भीतर,

वो पुरुष-पुरातन चला रहा,
था हम सबको वो नचा रहा,
हम मृत होकर फिर जन्म गए,
ले रहे कभी थे स्वरुप नए,

इक क्षण भी नहीं इसमें लगता,
जिसमें सबका जीवन चलता,
जीवन जीने की कोई ख़ुशी नहीं,
कोई भय था नहीं1



Kis Vidhi Aau Dwaar Tihaare (Hindi-Poetry)

किस विधि आऊँ द्वार तिहारे...

कुबुद्धि, कुसंगी, हूँ मैं कुमार्गगामी,
नहीं मानूँ तेरा कहना, करती हूँ मैं मनमानी,
अपनी सोच से ही उपजाए, मैंने ये मायाजाल,
पहले तो मनभाये, पर अब हैं जी का जंजाल,
जी का जंजाल हैं ये, अब हैं जी को जलाते,
हैं ये पाप के घड़े, पर हैं मन को लुभाते।

दुर्व्यसनों को छोड़, मैं आऊँ कैसे बंधन तोड़,
हे नाथ! करो सहाय, बताओ आप ही कोई उपाय,
उपाय हो ऐसा कि मन पवित्र हो जाए,
ना रहे कोई इच्छा अधूरी, ये जीव तृप्ति पाए।

नित-नित आऊं द्वार तिहारे, तेरी ज्योति से करूँ मन पावन,
मन-मंदिर में बिठाऊँ तुझको, जो पूर्ण स्वस्थ हो मेरा अन्तर्मन,
अंतर्मन से आती ध्वनि तेरी, उसे साफ़-साफ़ सुन पाऊँ,
मन के भीतर, जग में बाहर, मैं तुझको पा जाऊँ।

ना कुछ बुरा दिखे जग भीतर,
ना मन कुत्सित मार्ग पर जाए,
मोह-माया-व्यसन जिन्हें तुमने छुड़ाया,
उनसे लो अब मेरे मन को बचाये।

तेरी शक्ति, तेरी इच्छा बिन,
ये सब संभव नहीं हे नाथ!
अब देर ना कर, तू मेरे द्वारे आजा,
ले चल मुझको अपने ही साथ,
ले चल, ले चल, अब तू ले चल,
ले चल मुझको अपने ही साथ।



Yuva Abhyuday Mission (Hindi)

अँधियारा क्यों करता है आकर्षित,
आता है आनंद भूतिया कहानियों में,
परी कथा तो आजकल बच्चे भी नहीं सुनते,
बिना लोभ के काम की शुरुआत ही नहीं होती,
जो खिलाता है चॉकलेट, बच्चे भी उसे ही हैं चुनते।

तंत्र-मंत्र और डराने वाले ग्रह हैं हाई डिमांड में,
भगवत-भजन से क्या होगा,
जब पड़ोसियों के टोटके हैं कमान में।
संसार की छोड़ो, अपनों के लिए भी दुआ नहीं निकलती,
बस दूसरे का बुरा हो जाए... इसी सोच में जिंदगी है चलती।

बॉलीवुड का मसाला, पड़ोसी की बुराई,
भूतों की स्टोरी और सास-बहू की चुगली खाई,
फिर भी समय मिला तो नेताओं को कोसना,
और बाकी समय में सेल्फ़ी खेंच, सोशल मीडिया पर परोसना।

धार्मिक सीरियलों में भी इंद्र का अहंकार,
विद्वान् राक्षसों पर साज़िशी पलटवार,
शनिदेव के न्याय में दलित राक्षसों पर नेह,
राधा की चिता पर रोते कृष्ण का स्नेह।

शूरवीर के इतिहास में, प्रेमपाश के वार,
रसिक और बेवक़ूफ़ राजाओं की इतिहास में भरमार,
बुद्धिमान मंत्री से ज्यादा, मूर्खों की कहानी,
मीरां की भक्ति को कहते कि मीरां थी कृष्ण की दीवानी।

आख़िर क्या है जो बनेगा आने वाली पीढ़ी का आधार,
साजिशों से भरी संस्कृति और टोटकों से भरे विचार,
इसी से इतर आज युवा चाहता है शांति,
पर अपने में मदहोश हो फैला रहा है भ्रांति,
ख़ुश नहीं है वो, डरा हुआ है,
सच और झूठ को परख़ने से दूर खड़ा हुआ है,
कोई उसका मिसयूज ना करले,
ये सोच अनयूजफुल बना हुआ है।

ब्रेन है पर ब्रेन स्टॉर्मिंग से डरता है,
बचपन में मोबाइल, जवानी में लड़कियों पर मरता है,
'क्रांति' शब्द तो सिर्फ तनख़्वाह बढ़वाने,
और माँ-बाप को सुनाने के ही काम आता है,
गलती कोई उसकी बता दे,
तो मन गुस्से से भर जाता है,
करप्शन हटाने और आरक्षण रोकने में
वो है आगे,
पर कोई उसे ऐसी फैसिलिटी दे दे तो फिर
क्यों1



Krishna Kaun Hai... (Hindi)

कृष्णवर्णी 'कान्हा' या 'कृष्ण' सम काला

कृष्ण तो है वो जो करता है आकृष्ट,
समस्त इन्द्रियों को वश में कर, करवाये काम अभीष्ट।
निश्छल भक्ति का जो है दाता, वही जगत में कृष्ण कहाता,
शिव-विष्णु का रूप वही है, पूर्ण ऊर्जा के साथ जो आता।
साक्षात् परम ब्रह्म वही है, वही है अतुलित बुद्धि का स्वामी,
गौ-गोपियों का प्राणप्रिय वही है, वही है सच्चा अन्तर्यामी।
जगतरूप-जगदीश्वर वो है, वही सृष्टि का आधार,
प्रकृति में बीजस्वरूप वही है, सगुण और साकार।

ये है कृष्ण, तो 'कृष्ण वर्ण' क्या है...
जो 'कृष्ण' के गुण हैं...
क्या 'काला रंग' भी रहा उन्हें समा है?

'कृष्ण' सम 'काला' भी करता है आकृष्ट,
समस्त रंगों को अवशोषित कर बनता है विशिष्ट।
ज्यों सब को समाहित कर, नहीं करे कोई अभिमान,
ऐसे ही अंधकारमय बन, 'काला' नहीं कराता होने का भान।
जहाँ कुछ नहीं, वहाँ भी वो है, बन प्रकृति का अभिन्न अंग,
जब कुछ न था इस धरा पर, तब भी फैला था ये ही रंग।
आज भी जिस अनजान शक्ति से ब्रह्माण्ड है बँधा हुआ,
उसके केंद्र में है काल-छिद्र विकराल रूप में पड़ा हुआ,
उसने ही बाँध रखा है, दूर-दूर के पिण्डों को,
वो ही उनके सृजन का कारण और लील जायेगा वो सबको।

क्या ब्रह्मा-विष्णु-महेश सा नहीं उसका व्यवहार,
क्या पूर्ण ऊर्जा का स्रोत वो नहीं, कृष्ण रूप अवतार?
तो क्या कृष्ण कथा है उपमान-उपमेय से रची हुई,
ब्रह्माण्ड की कथा क्या है, अलंकारों से सजी हुई?

'कृष्ण' के अवतार को मन में विचार लो,
इस ब्रह्माण्ड में उनकी कथा को सार लो,
तो 'कृष्ण', रंग से कहीं आगे एक व्यक्तित्व बन जायेगा,
'कृष्ण' को समझने का आनन्द तब ही तो आयेगा।
'कृष्ण' के 'काले' और 'राधा' के 'प्रकाश' से तब,
तुम्हारा मिलन छन भर में ही हो जायेगा।

कृष्ण के काले और राधा के प्रकाश से तब,
तुम्हारा मिलन छन भर1



Ankahe Ansune Sawal (Hindi)

जब कुछ नहीं तो क्यूँ बोलती हैं तेरी निगाहें...
करतीं हैं मुझसे दो-चार बातें,
जुबां तेरी भी चुप है, जुबां मेरी भी चुप है,
तो कैसे बोलते-बोलते कटती हैं रातें...

मेरे हर सवाल पर तेरी खामोशी कहती है,
मैं नहीं तेरा, तू नहीं मेरी...
तो फिर भी क्यूँ ये लगता है कि जैसे चोरी से,
तेरी इज़ाजत के बग़ैर...
करने लगती हैं, तेरी निगाहें कई बातें...

क्यूँ आ जाती है शऱारत तेरे मन में,
जो सामने मैं हूँ होता...
क्यूँ लगती है तू मुझे मेरी हमदम, मेरी छाया...

क्या ये मोहब्बत है... मेरे मन की..., मेरे मन में...,
या सच में तू भी उसी पशोपेश में है... जहाँ मैं हूँ...,
और चाहती है तू भी जानना उत्तर...
चंद उन अनकहे-अनसुने सवालों के।



Tarang :: Be Live (Hindi)

आज ज़रा गाड़ी को रहने दो गैराज़ में,
कि दिल पैर निकालने को कर रहा है,
आज ज़रा मोबाइल को फिक्स्ड कर दो,
कि मन कुछ कहने को मचल रहा है।

आज कोई ना चलाओ एसी. ,
कि वादियों की खानी हैं हवाएँ,
आज सब इयरफोन निकाल दो,
और सुनो जो भँवरे गुनगुनायें।

आज कोई टीवी को बंद कर दो,
कि मुझे है तुमसे दो बात करनी,
आज कोई दिन में ना सोने जाओ,
कि दिखानी है मेरे सपनों की जरनी।

आज सब फेसबुक को भूल जाओ,
कि लाइव देखना है फेस तुम सबका,
आज सब बंद कमरों से बाहर आओ,
चलो मिलकर करें मन हल्का।



Darpan Men Tum Nazar Aaye... (Hindi)

दर्पण में तुम नज़र आये...

हे प्रभु! देखा जो दर्पण तो तुम नज़र आये,
प्यारी सी मूरत में तुम मुस्काये,
मेरी सूरत में तो ढूँढ न पाई तुमको,
पर दर्पण को देख नव-विचार मन में आये।

दर्पण धवल से भी धवल, मुझको सब कुछ दिखाए,
झूठ नहीं बोले, मेरी सच्ची सूरत बताये,
कहीं दिखे ब्रह्माण्ड उसमें, लगे सबकुछ समाये,
फिर भी दर्पण श्वेत नहीं, श्याम वर्ण कहलाये।

तुम भी श्यामवर्णी कृष्ण! करते सबको आकर्षित,
तुम्हें देख जन खुद को पा जाते, होते सभी हर्षित,
तेरे मुख भीतर भी है ब्रह्माण्ड समाया,
कहीं दर्पण सा रूप तो तूने नहीं पाया?

तुम्हारे ही सम दिखती, सबकी सूरत उसमें,
जैसा रूप बनाकर देखो, वैसा ही दिखे उसमें,
ना कभी तुम डिगे सत्य से, ना कभी दर्पण झूठ बोले,
जो जैसा हो और जितना हो, बिल्कुल बराबर ही तोले।

हे श्याम! तुम्हारा रंग साँवला, फिर भी निराला,
कहीं वो पारद सा तो नहीं था, जो चमके आला-आला,
पारद का आकार कुछ नहीं, सब द्रव्यों में वो भारी,
एक ही पल में पारद में मुझे तेरी खूबी मिलीं सारी।

आ जाओ श्याम! अब देओ बतलाये,
कैसी सूरत थी तेरी जो सबके मन को भाये,
एक बार आकर तुम मेरे ये सारे भ्रम मिटा दो,
आओ आओ श्याम अब अपनी सूरत तुम दिखा दो...
... आओ आओ श्याम अब अपनी सूरत तुम दिखा दो।



Nandlala Karte Hain Aguwai (Humor)

बाला ने देखा आज एक ग्वाला,
याद आया उसको ब्रज का नंदलाला।

हृष्ट-पुष्ट सुन्दर, मन-मोहन मुरली वाला,
मोरमुकुटधारी और श्यामल वर्ण निराला,
वर्ण तो श्यामल प्रभु ने इसे भी दे डाला,
पर थोड़ा दुबला था ये श्यामल रंग वाला।

मुरली नहीं थी, हाथ में था सिगरेट-तम्बाकू-मसाला,
पीताम्बर की जगह इसने तन पर पैंट-शर्ट डाला,
सुन्दर आँखों पर लगाया था रंगीन चश्मा आला,
समझ रहा था खुद को हीरो, ये उल्टी टोपीवाला।

यमुना सा बहता था इसके घर के पास एक नाला,
दूध में पानी मिला इसने था अपनी दशा को संभाला,
दिव्य रथ तो नहीं था, पर था वाहन रफ़्तार वाला,
एक घंटे में पहुँचाता था वो, बस्सी से सोडाला।

रास रचैया ना सही, रसिक मिज़ाज कम नहीं था,
हीरोइनों के पोस्टरों से उसका कमरा रंगीं था,
एक नहीं तीन-तीन को, उसने था माना राधा,
बंशी बिन अपनी सीटी से ही, उसने था ये तीर साधा।

द्वारिका ना बसाई, पर कल्पना की दुनिया थी उसकी प्यारी,
राजनीतिज्ञ न था, पर थी राजनेताओं से उसकी यारी,
मोबाइल तरंगों से ही वो था अपनी दुनिया को चलाता,
शेयर-लॉटरी-सट्टे में दिन-रात अपने दिमाग को जलाता।

उसका ये अंदाज़ देख मैं बाला मुस्काई,
आज भी करते हैं नंदलाला इस दुनिया की अगुवाई...
आज भी करते हैं नंदलाला इस दुनिया की अगुवाई।



Tere Hone Se (Hindi)

तेरे होने से...

जीवन में बहार है, लगता प्यारा ये संसार है,
मन में आशा है, इच्छा है, सपने हैं,
लगता है इस दुनिया में सभी लोग अपने हैं।

तेरे होने से...

लड़ने की ताकत है, जीतने का साहस है,
भाग्य है और भाग्य पर भरोसा है,
गलती पर क्षमा की आशा है।

तेरे होने से...

दुर्घटना से सुघटना तक और मृत्यु से अमरत्व तक,
जाने की सीढ़ी है,
तेरे होने से ही संस्कार और संस्कृतियाँ,
चलते पीढ़ी-दर-पीढ़ी हैं।

तेरे होने से...

पापियों में भय है, असत्य पर सत्य की विजय है,
अंत में बुराई का अंत है,
प्रलय के पश्चात फिर, जीवन अनंत है।

तेरे होने से...

प्रज्ञा है, विद्या है, मस्तिष्क में बुद्धि है,
और बुद्धि से परे संसार में, अनेकों सिद्धि हैं,
आकाश में तारे हैं, तो धरती पर पुष्प बहुत सारे हैं,
अण्ड से ब्रह्माण्ड और अणु से परमाणु तक रहस्य बहुत प्यारे हैं।

तेरे होने से...

प्रेम है, प्रकृति है,
और प्रकृति में सृजन और संहार की शक्ति है,
मौन है और मौन की अपनी अभिव्यक्ति है,
और उस मौन में वाक् से भी अधिक शक्ति है।

तेरे होने से...

मन में विचार हैं, कलम में धार है,
कोरे कागज़ पर होती, रंगों की बहार है,
आचार है, व्यवहार है और मन का संसार है।

ये अच्छा है कि तू है,

और अगर प्रार्थना में शक्ति है, तो हे प्रभु!
आज अपने लिए और सबके लिए,
एक यही प्रार्थना करुँगी कि तू हमेशा रहे...
सबके पास, सबके साथ...

क्योंकि हम हैं तो सिर्फ तेरे होने से...



Aao Ab Sheeghra Aao (Hindi-Poetry)

हे नाथ! ढूंढते तो तुम्हें सभी हैं,
बस सबके रास्ते अलग-अलग हैं...

कुछ को तुम सपने में देते हो दिखाई,
कुछ को तुम जागते में पड़ते हो सुनाई,
कुछ तुम्हें मंदिरों में जाते हैं ढूंढने,
कुछ की मस्जिदों में होती है सुनवाई,

कुछ को तुम ग्रंथों के पन्नों में मिल जाते,
कुछ तुमको सूली पर लटका हुआ पाते,
कुछ ढूंढते आग-हवा-पानी में तुमको,
कुछ ढूंढते संतों की वाणी में तुमको।

कल गई मैं मंदिर दिखी सूरत तुम्हारी,
पर बंद थे लोगों के नेत्र...
मन पर पड़े थे परदे भारी,

मस्ज़िद में मैंने देखा...
लाउड स्पीकर से लोगों ने पुकारा,
जैसे दूर तुम थे बैठे,
और सुनने का मन ना था तुम्हारा,

आज के मनुज ने,
तेरे कुछ कर्म अपना लिए थे,
नीति भुला दी थी तेरी,
पर कुछ अधर्म अपना लिए थे,

होली पर मैंने देखा, सब जय राधे-कृष्ण गा रहे थे,
और राधा की इच्छा के विरुद्ध, उसे छेड़े जा रहे थे,
शिवरात्रि में भांग पीकर, सारे बन बैठे तेरे बाराती,
और शरद पूनों को डांडिया में, गोपियों से रास रचा रहे थे,

जो तुमने पशु रूपी किसी असुर को था मारा,
तो आज भी उसकी बलि के पीछे था जग सारा,
जो देव रूप में तुमने कभी सोमरस पिया था,
तो उसे सुरा समझकर, मनुज उसी से जिया था,

आज का अर्जुन, 'अपने' कृष्ण की राहों पर,
अपने परिवार से ही करता है लड़ाई,
लोगों को मारकर, छल-कपट से जीतकर,
तेरी ही कही गीता की देता है दुहाई,

और वो यहाँ रुकता नहीं है...

अपने ही मुख से खुद को,
कहता तेरा पच्चीसवां अवतार,
स्वर्ण सिंहासन पर हो आसीन,
दिखाता नित-नए चमत्कार,

कहीं छल से, तो कहीं बल से, बस चाहता है
कि लोग तुझे भुला उसे भजें,
तू मूरत बन पड़ा रहे एक कमरे में,
और तेरी मुकुट-माला से वो सजें,

इसीलिए हे कृष्ण! अब और देर1



Prabhu Milan (Hindi)

हे प्रभु! स्वप्न लोक की नगरी है ये,
सुन्दर, मायावी, लुभावने वाली,
जानती हूँ सच नहीं, ये स्वप्न है,
और अंत में रह जाएंगे हाथ खाली,

पर निद्रा के वश में प्रभुजी!
बस नहीं चलता मेरा,
तुझसे मिलन मेरा हो नहीं पाता,
जब होता सुबह सवेरा,

कब तुम आते, कब चले जाते,
मुझको एहसास नहीं है,
बस रहती है शिकायत स्वप्न में,
क्यों तू मेरे पास नहीं है,

हे मुरली-मनोहर! करो कुछ ऐसा,
ये रात आने न पाए,
भोर समय मैं रहूँ जागती,
ना कोई स्वप्न सताये।

बोले श्याम - जो ऐसा हो तो,
तुम थक जाओगे दिन में,
स्वप्न ना होंगे तो उल्लास ना होगा,
फिर क्या करोगे मन में,

भोर में जब आऊँगा मैं तो,
कौन कथा बांचोगे...
कुछ रचने को नहीं जो होगा तो,
कौनसा वर सांचोगे?

जो न मिलन होगा तम-सत का तो,
दीपक कहाँ रखोगे,
जो न परीक्षा होगी तेरे मन की तो,
आगे कैसे बढ़ोगे?

जो मैं रहुँगा साथ सदा ही तो,
कौन पुकारेगा मुझको,
कैसे सुनाओगे सपनों के किस्से,
जब साथ रखोगे मुझको,

ये कर्मभूमि है मित्र ओ मेरे,
तो कर्म पड़ेगा करना,
सपनों के संग भोर का ध्यान भी,
पड़ेगा तुमको ही रखना,

फिर आऊँगा मिलन को मैं भी,
जो झड़ा होगा तेरा आँगन,
सुनुँगा तेरी सारी कथाएँ,
और करुँगा मन को पावन,

करुँगा मन को पावन,
कि तू मुझे रोज़ बुलाना,
तभी तो भक्त और भगवान् का,
बुनेगा तानाबाना।

तभी तो भक्त और भगवान् का,
बुनेगा तानाबाना।

भावार्थ शब्दार्थ :

स्वप्न लोक की नगरी = इच्छाओं से भरा संसार,
सत्य = मोक्ष,
निद्रा = माया,
सवेरा = मृत्यु और नवजीवन की शुरुआत,
प्रभु का आना = मोक्ष,
रात = मायामयी संसार,
दिन-रात = जीवन (दिन - कर्म प्रधान, रात्रि - माया, स्वप्न - इच्छा),
कथा = जीवन-वृत्तांत,
तम = इच्छाएँ - आसक्तियाँ - मन,
सत = कर्म - शरीर - वास्तविकता,1



Kis Vidhi Poojun Nath (Hindi)

किस विधि पूजूँ नाथ... आप आये मेरे द्वारे...,
मैले सारे आसन... कैसे दूँ मैं बिठा रे...

मैंने ही कहा था कल तुम आना,
साफ़ रखुँगी अपना अँगना,
पर निद्रा में स्वप्न जो आये,
मुझको दिया पीछे भगा रे...,
इँह ते उँह तक भगा-भगा के,
मुझको दिया थका रे...

भोर भई, तुम थे आने को,
अमृत वायु मिली थी मुझको,
पर पीने भर की शक्ति नहीं थी,
वो पल दिए गंवा रे...

तुम आये तो मैला था मन,
झूठे पड़े थे रात के बर्तन,
कहाँ बिठाऊँ, क्या मैं खिलाऊँ,
नैनों में अश्रु भरा रे...,

अश्रु बहे, बहा ले गए तुमको,
अब तुम पास नहीं थे,
कल तेरे आने की आस थी मन में,
हम भी निराश नहीं थे,
धुल गया था आँगन,
पावन था मन,
पर तुम चले गए थे,
कल भोर में आने का, फिर से वचन दे,
तुम मुझे छोड़ गए थे,

कभी तो ऐसा भी होगा ओ प्रभुजी!
सपनों से मैं बाहर रहुँगी,
भोर के अमृत से झाड़ कर आँगन,
तेरा ही नाम जपुँगी,
उदयकाल की मिलन वेला में,
तुझसे मिलन करुँगी,
कुछ अपनी कह, कुछ तेरी सुन,
मन में धीर धरुँगी।



Hanson Ka Joda :: The Swans (Hindi)

हंसों का जोड़ा

यूँ ही एक दिन टहलने गई जब मैं सागर किनारे,
आसमां में उड़ता देखा एक हंसों का जोड़ा।

आँखों में उमंग, पंखों में शक्ति, मन में था साहस,
उस अथाह जलराशि से टकराने का,
अठखेलियाँ करते एक-दूसरे के आगे-पीछे,
चले जा रहे थे वे निरंतर अपने लक्ष्य की ओर।

कि तभी बोझिल होने लगी हंसिनी की चाल,
ख़त्म होने लगी उसके पंखों की शक्ति,
एक पल के लिए खो बैठी वो अपनी चेतना,
और जाने लगी उसी अथाह जलराशि में विलीन होने,
जिससे टक्कर लेने का प्राण उन दौनों ने लिया था कभी...

पर जैसे ही हंस ने पाया अपनी प्रिया को काल के गाल में जाते,
रोक न पाया...
अगले ही पल एक नीची उड़ान भर,
ले आया अपनी जीवन-तरंग को अपने पंखों पर बिठा...
उड़ता रहा उसे भी अपने साथ लेकर,
बिना सोचे कि कभी तो उसकी भी हार होगी...
जब न वो बच पायेगा और न उसकी प्रिया।

तभी लौट आई उस हंसिनी की चेतना,
अपने प्रिय को अपने समीप पाकर...
भूल गई उस लील जाने वाले शान्ति के कोलाहल को,
जो निगलने को आतुर था, उस नन्हें बेज़ान पंछी को,
अपने प्रिय की बाहों ने दी उसे पूरे संसार की ऊर्जा,
और फिर चल पड़ी वह, उसी के पीछे, उसी उमंग से,
जिस उमंग के साथ उन दौनों ने शरू की थी वो यात्रा।

मैं जितनी दूर तक देख पाई, दोनो उड़ते रहे,
देते हुए एक-दूसरे को सहारा...
बनते हुए अपने साथी की शक्ति,
पता नहीं वे अपने लक्ष्य को प्राप्त कर पाए या नहीं...
पर अनायास ही मेरे हाथ जुड़ गए,
करने लगी नमन मैं उन देवदूतों को,
जिनके अगाध प्रेम की शक्ति और कर्मठता,
दे रही थी प्रेरणा सम्पूर्ण मानव-जाति को,
जो अपने तुच्छ स्वार्थ की ख़ातिर,
दूसरे को मिटाने के लिए,
ख़ुद मर-मिटने को तैयार रहती है।

इतना सोचते-सोचते ही1



Patthar :: The Stone (Hindi-Humor)

एक दिन रास्ते में मेरा पैर किसी चीज से टकराया और मैं ठिठक कर रुक गया,
झुक कर देखा, तो कुछ ख़ास ना था, यह था एक पत्थर...
एक निर्मम, निर्जीव, निरीह पत्थर।

उस पत्थर की हिम्मत पर मुझे आश्चर्य हुआ और रोष भी,
एक अदना सा पत्थर और इंसान से टकराने का साहस...
पर वो चुप था, कुछ ना बोला, क्योंकि वो था एक पत्थर...
एक निर्मम, निर्जीव, निरीह पत्थर।

मेरे इस विचार-मंथन के बीच, कुछ लोग आये,
उसे उठाया और एक कार के शीशे पे दे मारा,
फिर पुलिस आई, दो को धरा, चार को साथ ले गई,
पर अभी भी, मेरी आँखों के सामने, पास की मिट्टी में, पड़ा था, वही एक पत्थर...
एक निर्मम, निर्जीव, निरीह पत्थर।

तभी एक ढोंगी आया, साधु-वेश बना, उसने उसी पत्थर को उठाया,
फिर नल के जल से पवित्र कर, उसे फूलों का हार पहनाया,
भीड़ जुटी, आरती हुई और ढेर सा चढ़ावा उस पत्थर ने पाया,
चढ़ावा समेट साधु के जाने के बाद,
मेरे सामने, फूलों का हार पहने, पड़ा था, वही एक पत्थर...
एक निर्मम, निर्जीव, निरीह पत्थर।

अब उस पत्थर का महात्मय समझ आने लगा था,
जिसे जाना था तुच्छ, उसी को मैं सिर नवाने लगा था,
फिर पास जाकर उसके, शुरू की मैंने मेरी प्रार्थना -

हे पत्थर देवता! आप भाग्य-विधाता,
कहीं विध्वंस का कारण, कहीं सृष्टि निर्माता,
किसी को देते दंड, किसी को देते दाना,
विधना की सृष्टि का, तुम ही बुनते ताना-बाना,
तुम्हारे बिना विधाता का नहीं कोई आकार,
तुमने ही उसे बनाया, सगुण और साकार।

हे पत्थर देवता! आपके प्रति दुर्भावना के लिए, मैं क्षमाप्रार्थी हूँ,
अपने घर के गल्ले पर, सदा करता आपकी ही आरती हूँ,
अभी एक छोटा कवि हूँ, मुझे आप महान बनाना,
इसीलिये चढ़ा रहा हूँ ये, ग्यारह रूपये और चार आना।

ऐसा कहकर मन में श्रद्धा भाव लिए, मैं1



Khushi :: Happiness (Hindi)

पंछी की तरह उड़ने में, कूद-कूद कर चलने में,
आता है कितना मज़ा ओ प्रभुजी।
इसीलिए रोज़ फुदक-फुदक मैं आती हूँ तेरे द्वारे,
कि हे प्रभुजी! ऐसे ही मुझे फुदक-फुदक आने देना,
कूद-कूद चलने देना,
क्योंकि जो मज़ा इंसान बनकर फुदकने में है,
वो चिड़िया बन उड़ जाने में कहाँ।
चिड़िया बनकर तो कोई भी उड़ सकता है,
पर इंसान बन, हर कोई कहाँ फुदक पाता है।
इसीलिए हे प्रभु! मुझे यूँ ही इंसान बने फुदकते रहने देना,
चिड़िया सा मत बना देना।



Pita ka Dard (Father's Pain) (Hindi)

बचपन से तेरी जवानी तक,
तुझे पाला-पोसा बड़ा किया,
बाइक से मोबाइल तक,
तेरी हर ख्वाहिश को मैंने जिया,

तूने माँगा चाहे मना किया,
पर मैंने अपना बेस्ट दिया,
तेरे पहले बिज़नेस से ले,
हर फैसले तक,
तेरी जीत से जीतकर,
तेरी हार में हारकर,
कभी समझाकर, कभी डांटकर,
अपने मन से तुझे सही किया,

और आज तू कहता है पापा!
तुम समझे नहीं मुझे, मैंने क्या चाहा...,
तुम अपनी इच्छा थोपते रहे मुझपर...,
और मुझपर ना कभी यकीं किया...,

अरे बेटा! चिर गया दिल मेरा,
कब साथ तेरे मैं रहा ना खड़ा,
कब तुझको रोका कुछ करने से,
कब परिवार का बोझ मैंने पड़ने दिया,
और आज तू कहता है पापा,
तुमने मुझपर न यकीन किया...,

मेरी हार में, बीच मझधार में,
समय की मार में, चाकू की धार में,
वो ताकत ना थी, जो तेरे 'पापा' को चीर देती,
पर तेरे शब्दों ने आज ये एहसास कराया,
कि तू अब बड़ा हो गया है और मैं पुराना,
शायद इसे ही कहते हैं बदला ज़माना,

'सॉरी बेटा'!!
बस ये शब्द तुझे कभी यूज़ न करने पड़ें,
ये दुआ है मेरी,
अलविदा सयाने बेटे,
अब ये जिंदगी है तेरी।



Janak Ki Vyatha... (Hindi)

ये धरती पुरुषविहीन हुई, हे जानकी!
क्या रहना पड़ेगा जनक के घर में तुम्हें सदा?
कभी सोचा न था,
मेरी प्रतिज्ञा ही बाधक बनेगी,
तेरे कन्यादान में, मेरी प्रिये!

हे सीते! देखी है तुझमें दुर्गा की मूरत मैंने,
कैसे दे दूँ किसी कायर के हाथ में तुझको।
जिस धनुष को एक हाथ में उठा,
बचपन से तरुणाई तक खेली है तू तेरी सखियों संग,
उसी धनुष को हिलाने मात्र में भी असमर्थ है आज ये नृपजन।

हे वैदेही! देखी है तुझमें लक्ष्मी सी चपलता सदा,
कैसे दे दूँ किसी पुरुष-पुरातन के हाथों में तुझको।
आये हैं नरेश विश्व के हर छोर से,
किन्तु पाना चाहते हैं सब तुझे हाथों के ज़ोर से।

वो पुरुष ही क्या जो दुर्बल को दबाये,
बलशाली तो हिंसक पशु भी होते हैं।
वो बुद्धि ही क्या जो दूसरों को सताये,
अविवेकी पूत पर तो सदा ही कुल रोते हैं।

हे पुत्री! तू माँ गौरी सी सीधी,
कैसे सौंपूं तुझे किसी बली-हठी को,
जो तेरे इस स्त्री रूप से परे धवल मन को,
न देखना चाहता है और न सुनना।

हे विशालाक्षी! सरस्वती सी तेज है तेरी बुद्धि,
कैसे; कैसे दे दूँ तुझे किसी ऐसे दुर्बुद्धि को,
जो उसके उपयोग के स्थान पर, उसे दबाये,
स्वयं अहंकार के मद में।

इसीलिए हे जानकी! धनुष विखंडन की ये शर्त रखी थी मैंने,
बिना विवेक, सदविचार और आशीष के, केवल बाहुबल से,
इस धनुष को हिलाना भी असंभव है जानकी।
किन्तु ये न पता था कि अब पुरुष रहे ही नहीं इस धरा पर।

जिस धरती ने तुझ जैसी सुशील कन्या को जना,
उसकी गोद में एक भी सुकुमार न हुआ...
हे सुहासिनी! तो क्या जीवन भर अब हंसी भूलकर,
संभालनी पड़ेगी सत्ता तुझे?
नहीं-नहीं मैं इतना निष्ठुर पिता नहीं,
जो छीन ले तेरी खुशियां तुझसे।

हे कान्ता! छोड़ दे तू मेरे प्रण को...
जिसे वरना चाहे वर1



Maine Chod Diya... (I left...) (Hindi)

मैंने छोड़ दिया पतंगों को लपकना,
कि चंद लड़के पतंगों से ज्यादा मेरी छलांगों को देखने लगे थे,
मैंने छोड़ दिया खुलकर खिलखिलाना,
कि चंद होठ उसे देख अजीब सी शक्लें बनाने लगे थे,
मैंने छोड़ दिया छत पर गाने गुनगुनाना,
कि पड़ोस के लड़के बिन चाहे करने लगे थे तारीफ़ उसकी,
मैंने छोड़ दिया नज़रें मिलाना,
कि समझना ही नहीं चाहती थी मैं उनकी नापाक शक्लें,
मैंने छोड़ दिया बिना चुन्नी के सड़क पर जाना,
कि चंद घूरती निगाहें अजीब लगती थीं मुझको।

क्यों कल तक जो कर कर ख़ुशी मिलती थी मुझे,
आज वो हरकतें करते हुए, मैं देखती हूँ चारों तरफ,
क्यों आज अपनी खुशी से पहले डर जाती हूँ,
कि कोई आँखें देख न लें मुझे यूँ खुशियाँ मनाते,
पता नहीं वो कौनसा अनजाना साया डराता है,
वो कौन है जिससे छुपती फिर रही हूँ मैं,
चंद अखबार की ख़बरें हैं या परिवार की नसीहतें,
जो डरा देती हैं मुझे रोज़ाना,
वो जो भी हैं... पर अब इतना तो मैं समझती हूँ,
कि मेरा अपना देश मेरे लिए सुरक्षित नहीं है।

यहाँ न्याय की देवी के घर में अंधेर भले ही न हो,
पर देर अवश्य है...
गुनहगारों के मन में डर नहीं,
पर बच जाने का यकीन है।
नेता को नेतागिरी से और बलवान को दादागिरी से,
फ़ुरसत ही नहीं...
और सफेदपोशों के काले हाथ अंधों को दिखते ही नहीं।
वैसे किसी को यहाँ किसी दूसरे के फटे में हाथ नहीं देना,
लेकिन आँख, कान और मुँह वहीं घुसाए रखने हैं।
धृष्ट से लेकर भ्रष्ट तक सब मौसी के लड़के हैं,
और बिना अपने उल्लू को सीधा किये कोई लाचार का सगा नहीं है।

अपनी जाति को रोज़ अखबारों में लाचारी से मरते-घुटते देख,
तिल-तिल कर जो मैं मरती-डरती जाती हूँ,
ये जो हवा खराब हो गई है मेरे देश की,
उसमें जब मैं सांस1



Pranaam to Guru Ji and Guru Maa (Hindi)

गुरू जी मेरे सरल-सुहृदय,
गुरु माँ चपल-चन्द्रिका सी,
गुरु जी शांत समुद्र विशाल,
गुरु माँ बहती गंगा सी।

गुरु जी सिखलाते जीवन,
पर जीवंत बनाती गुरु माँ ही,
गुरु जी ध्यान कराते हैं,
पर ध्यान रखती हैं गुरु माँ ही,
सारा रस, जीवन-तरंग,
हम तक पहुंचाती गुरु माँ ही,
मन से मिलते हम गुरूजी से,
साक्षात् करातीं गुरु माँ ही।

गुरू जी मेरे सरल-सुहृदय,
गुरु माँ चपल-चन्द्रिका सी...

गुरूजी मेरे ये हैं कैसे,
ये मुझे बतातीं गुरु माँ ही,
नित्य रात्रि करते इन्तजार,
पाती भिजवाती गुरु माँ ही,
हम सब पीछे श्री गुरूजी के,
सही राह सुझातीं गुरु माँ ही,
नैया पार कराते श्री गुरूजी मेरे,
पर उसमें छेद बतातीं गुरु माँ ही।

गुरू जी मेरे सरल-सुहृदय,
गुरु माँ चपल-चन्द्रिका सी...

आदर करते सब गुरूजी का,
पर लाड़ लड़ातीं गुरु माँ ही,
व्यक्तित्व बहुमुखी गुरूजी का,
जिसे पूर्ण बनातीं गुरु माँ ही,
गुरु जी-गुरु माँ को नमन मेरा,
गुरु तक पहुंचा दो गुरु माँ जी,
गुरु जी जैसे तो बन न सकेंगे,
स्वयं सा निर्मल बना दो गुरु माँ जी।

गुरू जी मेरे सरल-सुहृदय,
गुरु माँ चपल-चन्द्रिका सी...



Adhoori Khwahishen... (Hindi)

जिंदगी में जरुरी नहीं कि हर ख्वाहिश पूरी हो,
कोई जरुरी नहीं कि हर रात नूरी हो,
वो तो नजरिया इंसां का है, जो है उसे देखता,
बदलता, ढालता, ढलता और सहेजता,
अंधियारे में सायों से ही वो बनाता नए चित्र,
अधूरी ख्वाहिशों में भी भरता रहता रंग विचित्र,
इन्हीं चित्रों में ढूंढ ख़ुशी, पूरी करता ख्वाहिशें,
क्या हुआ ख्वाहिशें बदलीं और मिल गई नई मंज़िलें,
जो ख्वाब पूरे न हों तो उनके पीछे क्या भागना,
ख्वाब लो तुम बदल अपने, जिंदगी जी लो यहाँ,
ना बीते पर बस है अपना, ना आने वाले का यकीं,
जी सको तो जी लो हर पल, मानो जैसे ये ही है आखिरी,
लाख गम हैं जमाने में, मैं क्यूँ दूँ इक और मिला,
कारवां क्यूँ न शुरू कर दूँ, अपना मैं इक कदम बढ़ा,
फ़लसफ़े तो बन ही लेंगे, जब दिल में है इतना हौसला,
सारे ख्वाब भी पूरे होंगे, बस अब शरू है सिलसिला,
आँख मेरी आज नम है, दिल में है छाया ज़लज़ला,
चंद अधूरी ख्वाहिशें, चुभती हैं दिल में, करतीं गिला,
कर दूंगी उनको भी मैं ठंडा, अपनी नज़मों के रंग मिला|



Aaj Man Khamosh Hai... (Hindi)

आज मन खामोश है, तो क्या ख़ामोशी में खनकार न होगी,
आज कलम भी रुकी हुई है, तो क्या रुकी कलम से बात न होगी,
आज रात में है बहुत अँधेरा, तो क्या उजियारे की आस न होगी,
आज सुस्त है कवि मन मेरा, तो क्या कविता की बरसात न होगी,
आज हूँ तनहा गुमशुदा सी, तो क्या खुद की कोई तलाश न होगी,
आज सोच रही हूँ कि मैं क्या हूँ, तो क्या खुद से मेरी मुलाकात न होगी,
बहुत दूर हूँ साहिल से तो क्या, मझधारों में कोई बात न होगी।



Andhi Galiyan (Hindi)

अंधी गलियां,
जिन्हें नहीं मिलती कोई चौड़ी सड़क,
ग़ुम हो जाती हैं,
जाकर चंद दरवाजों पर,
जो अपनी ही अकड़ में,
खुलने से मना कर देते हैं,
और फिर एक दिन,
बाढ़ के पानी से तरबतर हो,
खुद भटक औरों को भी भटका देती हैं ये - अंधी गलियां।



Two Liners (Hindi)

कोई क्या इतने प्यार से भी रो जाता है,
जो उसकी हर आह पर वाह ही निकल पाता है,
सुनती हैं दीवारें, पर क्यूँ आज इन्सान चुप है,
पूछता है वो कि क्या दीवारों से भी कुछ कहा जाता है।


कोई प्याला हो तो पी के भी मैं ख़ुश हूँ यारों,
मरी दुनिया में ऐसे ही जिया जाता है,
वो साँस ही क्या, जिसमें आवाज़ ना हो यारों,
इसीलिए मरते दम तक ऐसे ही पिया जाता है।


पसंद जब चाहत बने और चाहत बने जूनून,
तब दिक्कत बढ़ जाती है, जब पल को नहीं सुकून।
सुकून ढूँढू मैं गलियों में, सुकूं तो मन का मोर,
ज्यूँ चकोर उड़ता फिरे, ढूंढे चाँद चहुँ ओर।


औरों से अब क्या कहूँ, कैसे कहूँ मैं बात,
खुद में ही खामोश हूँ, मन में है उल्लास।


मितवा तुम किसी और के, नहीं करते मुझसे बात,
कल जाकर ले आये तुम, उसके लिए सौगात।


फ़ुरसत के दो लम्हे जिंदगी में मिलें... तो शायद मर जाएँ...
एक नज़र वो हमें और हम उन्हें देख लें, तो शायद प्यार कर जाएँ।



Haan Main Tumhaare Liye Kuch Nahi Laai Hun (Hindi)

आँखों में जुगनू, मुट्ठी में धूप भर के लाई हूँ,
हाँ, मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं लाइ हूँ ...

अपनी सारी दुआएं, किस्मत के सारे तारे लाई हूँ,
हाँ, मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं लाइ हूँ ...

पहली बारिश की ख़ुशबू, अपनी पहली गुड़िया लाई हूँ,
हाँ, मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं लाइ हूँ ...

अपने अनदेखे सपने, सारी हँसी लाई हूँ,
हाँ, मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं लाइ हूँ ...

जिन किताबों में लिखा था तुम्हारा नाम और ईद का चाँद, लाई हूँ,
हाँ, सही कहा तुमने...... मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं लाइ हूँ ...



Mera Bhagya, Mera Karm (Hindi)

नहीं-नहीं तुम नहीं हो नाथ, नहीं हो मेरे ईश्वर,
नहीं-नहीं तुम नहीं हो नाथ, नहीं हो मेरे ईश्वर।

बचपन से जो मेरे साथ खेला, मेरे साथ जागा और मेरे साथ सोया,
जिसने मुझे बढ़ाया और जीवन-दर्शन सिखलाया,
रास्ते में रोड़ा बन वो अड़ा नहीं, मेहनत करने पर वो जड़ा नहीं,
वो मेरे साथ रहा, मेरी हंसी में हँसा और मेरे दुःख में रोया,
जिसने मेरी हार पर मुझे संभाला और अगली जीत की ओर बढ़ाया,
जो संसार की सारी खुशियां, मेरे लिए बटोर कर लाया,
वो तुम न थे, कोई और था...

और जो तुम कहते हो खुद को ईश्वर,
तो तुम तब कहाँ रूठे थे,
जब पुकार रही थी मैं, झूझ रही थी इन तूफानों से,
जब सामना हो रहा था मेरा मौत से,
तब तुम किसी और पर मेहरबानी बरसाने में व्यस्त थे,
पर तब भी जो मेरे साथ था, वो तुम न थे, कोई और था...

और आज भी जिंदगी के इस मोड़ पर,
ओ भाग्य के छल-देवता ! क्या भरोसा, फिर छल जाओ,
आज साथ दो, तो कल वापिस न आओ,
लेकिन, मेरा कर्म मेरे साथ था, है और रहेगा,
वो मेरा है, तो मुझसे दूरी कैसे सहेगा,
मेरे जन्म से, मेरी मृत्यु तक और उसके बाद भी...
मेरे समस्त यश-अपयश, वेदना-संवेदना का कारण,
ईश्वर का दिया वो उपहार, जो मेरे हाथ में है,
वो तुम नहीं, कोई और है...

वो हाथ की लकीरों में नहीं, पर मेरे हाथ में है,
वो माथे की तकदीरों में नहीं, पर उससे बहते नमक के स्वाद में है,
वो मुझे जीने का और जी जाने का सुकून देता है,
वो मुझे कुछ कर जाने का जूनून देता है,
न वो खुद रुकता है, न मुझे रुकने देता है,
लेकिन भला ये है कि मुझे कभी नहीं झुकने देता है,
इसीलिए तुम नहीं हो मेरे नाथ... नहीं हो मेरे ईश्वर।1



Meri Har Muskurahat Ke Peeche... (Gazal) (Hindi)

मेरी हर मुस्कुराहट के भी पीछे आह होती है,
मुझे गम है क्या, इसकी किसे परवाह होती है,
मैं रातों को नहीं सोता, मैं डरता हूँ क्यूँ ख्वाबों से,
न जाने क्यूँ मेरे जगने की भी अब वाह -वाह होती है।

हर महफ़िल की रौनक हूँ, तो क्यूँ ज़हनी है खालीपन,
क्यूँ उठता है धुआं बिन आग, भीतर से जलाता है,
जब रहता हूँ मैं गुमसुम-गुमशुदा सारे नज़ारों में,
तो क्यूँ हर नज़र, हर सफ़र में मेरी ही बात होती है।

अब तो आदत सी हो गई है मुझे भी मुस्कुराने की,
किसे परवाह मेरे गम की, तो क्या ज़रूरत दिखने की,
पर रातों को जो सोता हूँ तो उसकी याद होती है,
जो सोने नहीं देती, ऐसी कुछ बात होती है।

मेरी हर मुस्कुराहट के भी पीछे आह होती है,
मुझे गम है क्या, इसकी किसे परवाह होती है|



Khar (Enmity) (Hindi)

बहुत ख़ार है तेरे भीतर, कुछ ख़ार यहाँ है बाकी,
लहरें-तूफ़ां अनेकों, मेरे मन के भी ये साथी।
इतने तूफानों में भी, है मौन खड़ा तू जैसे,
वैसी ही मौन हूँ मैं भी, पर शांत कहूँ मैं कैसे ...

ये हवा नहीं, ना ही मौसम, जो मन को हिला-मिला दें,
कुछ रिश्तों के बंधन हैं, जहाँ शिकवे और गिला हैं।
तुझसी नहीं बलशाली, जो सबको मैं अपना लूँ,
या तो अपने रंग में रंग दूँ, या छोड़ कर उन्हें दया दूँ ...

फिर भी शांति की तलाश, ले आई मुझे यहाँ आज,
उमड़े-घुमड़े और बरसे मेरे बादल, पिघल गई मैं आज,
आँखों से आँसू बन निकला, ख़ार मिला तुझ भीतर,
तेरे मौन से मेरे मौन को मिले अनेकों उत्तर...
तेरे मौन से मेरे मौन को मिले अनेकों उत्तर।



Pita Aur Ishwar (Father and God) (Hindi)

तेरा तेरे नन्हे क़दमों से चल,
पापा की गोद में चले जाना,
और प्यारी सी मुस्कान से,
अपनी विजयगाथा को सुनाना,
वो मम्मी-पापा की पकड़ पर तेरा यकीं,
कि हवा में पैर रखने से भी तू अब डरती नहीं,
तुझे पता है कि वो हैं यहीं-कहीं,
तेरे हर गलत कदम को, सही दिशा पाने का यकीं,
और क्या जो गिर भी गए तो …
एक किलकारी और मम्मी की गोद प्यारी-प्यारी,
हाय ये बचपन …
कितना उन्मुक्त, कितना प्यारा,
ना फिक्र, ना कोई गम और जीवन प्यारा-प्यारा|

काश ता-उम्र हम ईश्वर पर भी कर पाते यही विश्वास,
तो हँसते ही रहते जब तक रहती तन में श्वाश,
करते तो हम भी हैं वही...
दो कदम चलने पर, अपनी विजयश्री का यकीं,
फिर सुनाते हैं अपनी विजयगाथा,
और रो-रो कर बुलाते हैं ईश्वर को,
जो जीवन में कोई तूफ़ान आता,
लेकिन बस वो यकीं नहीं दिखा पाते,
हर कदम को थामेगा ईश्वर,
ये सोच ही नहीं पाते,
सोचो …
उस ईश्वर को भी होती होगी कितनी ख़ुशी,
हमारे हर सही फैसले पर हमारे बड़े होने का यकीं,
और बड़े हो अपनी दुनिया में मगन,
और ईश्वर को भुला दिए जाने का गम भी,
लेकिन कोई नहीं...
वो जानता है...
फिर इक तूफां आएगा,
जब याद उसे किया जाएगा,
और बिना किसी बैर, किसी स्वार्थ के,
इक पिता की तरह ही वो हमें बचायेगा …
वो शर्तिया हमें बचाएगा…



A few lines by Heart (Hindi)

कभी-कभी खुद के अन्दर की ख़ामोशी सुनने के लिए ज़िन्दगी का शोर ज़रूरी होता है,
कभी-कभी एक लम्हा जीने के लिए सदियों तक हर रोज़ मरना ज़रूरी होता है,
क्या चाहा... क्या पाया... इसका हिसाब करने के लिए कभी-कभी फ़कीर होना ज़रूरी होता है,
और ...
जीत और हार दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं...
इसीलिए ...
किसी को जिताने के लिए कभी-कभी अपना सब कुछ हार जाना ज़रूरी होता है......



Prayer to Goddess Durga :: 2 (Hindi)

हे माँ तुझे चढाने को मैं फूल कहा से लाऊँ,
ऐसा क्या मैं दूँ तुझे मैया, जिसको अपना बताऊँ,
जग की हर वस्तु है तेरी, तो क्या, तेरा तुझे समर्पित,
क्या है कुछ भी ऐसा जग में, जो कर पाऊँ मैं अर्पित,

हे मेरी माँ! वैसे तो ये तन-मन-धन सब है तेरा,
तेरी बुद्धि से ही बनी पापी, तो कभी किया जग में उजेरा,
तो हे मेरी माँ! ये उपज थी मेरी, करती आज समर्पित,
मेरा पाप-पुण्य सब तेरा, तेरा तुझको अर्पित।

हे माँ! कल्पना से ही मैंने जाना, कि तू दिखती है कैसी,
तो करती कल्पना आज समर्पित, मिल जा मुझको वैसी,
जहाँ कल्पना चल ना पाई, वहां जिज्ञासा थी मैंने लगाई,
नरक-स्वर्ग सब दिखे उसी से, सो आज उसे भी लाई,
मेरी जिज्ञासा, ज्ञान-अज्ञान ये मेरा, करती तुझको अर्पण,
विनय और बड़े प्रेम भाव से, स्वीकार करो ये समर्पण।

हे माँ! इच्छा उपजी भीतर, जिसने मुझे फंसाया,
कभी काम बन, कभी क्रोध बन, मन को खूब नचाया,
कभी सौंदर्य बोध ने बांधा, कभी ये मन ललचाया,
तो कभी ख़ुशी ने खिला-खिला के तुझसे दूर कराया,
तो हे मेरी माँ! उस काम-क्रोध को भी करती आज समर्पित,
कभी ये तुझसे मिलन का कारण, कभी करता मुझको गर्वित।

हे मेरी मैया! वैमनस्य ही था मेरा, भीतर से मुझको काटे,
तू बाहर थी खड़ी द्वार पे, पर ये मुझको था बांटे,
तो हे मेरी माँ! करूँ आज समर्पण, मेरे सारे द्वेष और बैर,
तू भीतर अब आजा मैया, धर हृदय में पैर।

ध्यान, इच्छा, बुद्धि, जिज्ञासा, और मेरा सब ज्ञान,
हे माँ! करती आज समर्पण मेरा सारा मान,
सारी कलाएं थीं दी तूने मुझे, मैंने कर दीं विकृत,
पुनि करती हूँ आज मैं अर्पित, कर दे उनको सुकृत।

हे मेरी माँ! नहीं फूल हैं कोई, बस कांटे हैं मेरे पास,
इन्हीं काँटों को करके अर्पित, है मिलन की मेरी आस,
सबसे1



Nazaren :: Eyes (Hindi)

एक नज़र कहती रुक जा,
एक नज़र कहती बढ़ जा,
हर एक नज़र से देख नज़ारे,
अब भूल रही अपनी नज़रें,
हैं इन नज़रों में ख्वाब कई,
कुछ रंग भरे मेरे मन के हैं,
फिर क्यूँ कहतीं ये नज़रें हैं,
तू भूल उन्हें, मत देख वहाँ।

क्यूँ मुझको जो मंज़िल लगती है,
उसे राह का पत्थर कहतीं नज़रें,
बूढ़ी नज़रें, अपनी नज़रें,
हैं रही डरा मेरी नज़रों से,
जो नज़र मेरी दे रही धोखा,
है सच वो नहीं जो मैंने देखा,
तो भी मैं रहूंगी साथ सदा,
मेरी नज़रों और नज़ारों के।

जो ये नज़रें नहीं होतीं तो,
कैसे दिखतीं बाकी नज़रें,
है नमी आज भी नज़रों में,
पर डर है नहीं किसी नज़रों से,
मेरे अपनों से मिली नज़र,
है नाज़ मुझे इन नज़रों पे,
देखने दो मुझे, अब मत रोको,
जो ख़्वाब बसे मेरी नज़रों में,
बस रखो यकीं मेरी नज़रों पर
ना झुकाऊँगी, ना झुकने दुँगी।

आपकी ही नज़र, है मेरे भीतर,
बतलाती सब सही गलत मुझे,
है मुझको बस उसपर ये यकीं,
लाएगी बचा वो हर मुश्किल से,
नज़र तो है वही मेरी भी,
बस नजरिया ज़रा थोड़ा बदला है,
मेरे नज़रिये से देखो जरा,
क्यों नज़र नज़र में हैं फर्क कई।

तेरी नज़रें, मेरी नज़रें,
करती रहतीं हैं बात कई,
पर मेरे ख्वाबों से कटती हैं,
नज़रों-नज़रों में रात कई,
इसीलिए आगे अब मैं हूँ बढ़ती,
ले साथ लिए सबकी नज़रें,
पर नज़रिया आज भी हूँ रखती,
मेरे ख्वाबों का, मेरे नजारों का…

There are a lot of issues Today's Woman is facing and I want to share her voice with you guys... Kindly read it.

Human eye speaks a lot and reads a lot. Sometimes it shows happiness, sometimes anger and sometimes grievances... It judges situation and other person. In India, girls are still in a misery and restricted condition. They do not have1



Prayer to Goddess Durga (Hindi)

बसो मैया मेरे भीतर, सदा-सर्वदा वास करो।
मन की गति बन, मेरी सुमति बन, सदा मेरा तुम विकास करो।

मेरे मन की शक्ति तुम हो, हृदय में बसी भक्ति तुम,
वाणी की मधुरता तुम हो, सुर-साम्राज्ञी देवी तुम।

तुम से ही माँ, दश विद्याएं, नौ निधि सब तेरे आधीन,
अष्ट-सिद्धि की दाता मैया, व्याधि-विनाशिनी दोष विहीन।

ओ मेरी मैया, सामने आना, साथ में मेरे रहना सदा,
सब अपराध क्षमा कर मैया, मेरी तुम विनती सुनना।

कुमार्गगामी, मैं खलकामी, तुमको ना पहचानी माँ,
पर तुम मेरी शक्ति-स्वरूपा, तुम हो अंतर्यामी माँ।

तुमने ही संसार बनाया, सब रचना तेरे आधीन,
मेरी रचना का विकास कर, बना मुझे तू पूर्ण स्वाधीन।

तेरे ही चित्र उकेरूँ प्रतिपल, तेरा ही गान मैं गाऊँ माँ,
जग में कुछ ऐसा कर पाऊँ, कहलाऊँ तेरी 'आभा'।

तेरे ही कार्यों में शोभा पाऊँ, बना रहे सदा साथ तेरा,
इस जनम और हर एक जनम में, सिर पर हो माँ हाथ तेरा,

माँ बना रहे विश्वास मेरा, माँ सिर पर हो सदा हाथ तेरा...



Atal :: Expressions of Heart (Hindi)

बालपन से तरुणाई,
और तरुणाई से जवानी,
हर कदम पिछले से आगे,
यादगार और मुश्किल,
फिर घिरी हूँ संघर्षों में,
पहले से और सघन हैं ये बादल,
पर यकीन है बरसेगा सावन,
यकीन होता जा रहा है,
खुद पर और ईश्वर पर,
वो न हारेगा, न हारने देगा,
संघर्ष मेरी नीयती है,
और उससे बाहर लाना,
ईश्वर का फैसला,
और मैं मेरे संघर्ष पर और ईश्वर अपने फैसले पर,
अटल हैं और रहेंगे।