Jara Si Baat... (Hindi)

ज़रा सी बात थी और...
मैंने मन में सोच सोच उलझा लिया
मैं चाहती थी कि तुम सुलझाओ,
पर सच में उलझन कहाँ है,
ये क्या जान पाते तुम,
पर तुम्हारी चाहते हुए भी,
ना कि गई कोशिश से,
मेरे ग़ुस्से ने जो उस पर ताला लगाया,
उसने मुझे अब बहुत दूर ला दिया,
ज़रा सी ही तो बात थी...

मैं जानती हूँ,
तुम ग़लत नहीं, अनजान थे,
और मैं परेशान,
बस बिन कहे क्यूँ नहीं समझ पाए तुम?
ज़रा सी ही तो बात थी...

अब चाहती हूँ,
जो हुआ उसे भुला आगे बढ़ जाना,
पर क्या तुम आज भी दोगे मेरा साथ?
फिर उलझ रही हूँ अपने सवालों में,
अपने ही मन में,
क्यूँ नहीं ख़ुद से खोल देती,
मेरे मन की गाँठें,
क्यूँ नहीं तुम्हें बोल देती,
जो मेरा मन चाहे,
आख़िर ज़रा सी ही तो बात थी...



Indian Oldage Love (Hindi)

साठ पार कर चुके थे दौनों,
फिर भी कहासुनी सारी थी,
इक दूजे बिन रह नहीं पायें,
पर दौनों को ज़िद प्यारी थी।

ज़िद थी भी इतनी प्यारी,
जो करती थी रिश्तों को गहरा,
इक दूजे को समझते दौनों,
इसीलिए था पहरा।

पहरा था गहरा,
नहीं देतीं मिठाई उनको सीधे,
पर उनके हिस्से की फ़्रिज में,
छोड़ देतीं थी धीरे,
पर उनके खा लेते ही,
मचता रोज़ बवाल,
साठ पार खाते हो मिठाई,
होगा तुम्हारा क्या हाल,
अब जाओ दौड़ने और
पीछे से मैं भी आती हूँ,
कहीं बीच में बैठ ना जाओ,
पूरा पता लगाती हूँ।

पता लगा लो तुम पूरा,
और पीछे मेरे आओ,
जो साठ पार मिठाई तुमने खाई,
उसको तुम भी पचाओ,
आख़िर तुम बिन कोई नहीं अब
इस दुनिया में मेरा,
तेरी ज़िदों के बिना
नहीं पचेगा खाना मेरा।

अच्छा तो ये प्यार नहीं,
इसमें भी तेरा स्वार्थ,
जो कोई और होता दुनिया में
तो करते भी नहीं बात।

करता नहीं जो बात,
तो क्या तुम चुप हो जाती,
सालों हो गए सुनते,
बस तुम अपनी गातीं,
कभी ज़बरन काम पर भेजतीं,
देकर गाली हज़ार,
रोज़ नई चीज़ों की फ़रमाइश,
इतना ही था प्यार।

हाँ इतना ही था प्यार,
बनाया तुमको लायक़,
घर संसार बसाया तेरा,
पर तुम तो रहे खलनायक,
जो भी ख़रीदा, तेरे लिए था,
नहीं अपने लिए बचाया,
फिर भी देखो तुमने मुझको,
इतना कुछ है सुनाया,
जो इतनी बुरी थी लगती,
तो क्यूँ रोज़ गज़रा थे लाते,
क्यूँ कम पैसों में भी तुम
मुझको हर वीक घुमा कर लाते।

लाता था हर वीक घुमा कर,
और तेरे लिए गज़रा,
ठंडी रहे तू, सजी रहे तू,
ये ही स्वारथ बस था,
पर मेरे प्यार को तू समझ ना पाई,
हाय री मेरी क़िस्मत,
हो चला हूँ बुड्ढा, अब तो बक्श दे,
मौत दे रही दस्तक।

मौत दे दस्तक दुश्मन के,
मैं सदा1



Ankahe Ansune Sawal (Hindi)

जब कुछ नहीं तो क्यूँ बोलती हैं तेरी निगाहें...
करतीं हैं मुझसे दो-चार बातें,
जुबां तेरी भी चुप है, जुबां मेरी भी चुप है,
तो कैसे बोलते-बोलते कटती हैं रातें...

मेरे हर सवाल पर तेरी खामोशी कहती है,
मैं नहीं तेरा, तू नहीं मेरी...
तो फिर भी क्यूँ ये लगता है कि जैसे चोरी से,
तेरी इज़ाजत के बग़ैर...
करने लगती हैं, तेरी निगाहें कई बातें...

क्यूँ आ जाती है शऱारत तेरे मन में,
जो सामने मैं हूँ होता...
क्यूँ लगती है तू मुझे मेरी हमदम, मेरी छाया...

क्या ये मोहब्बत है... मेरे मन की..., मेरे मन में...,
या सच में तू भी उसी पशोपेश में है... जहाँ मैं हूँ...,
और चाहती है तू भी जानना उत्तर...
चंद उन अनकहे-अनसुने सवालों के।



Stri-Purush Sanvaad (Hindi)

स्त्री-पुरुष संवाद ------ ये एक काल्पनिक लघु परिदृश्य है, जिसका किसी भी ऐतिहासिक या पौराणिक घटना से कोई सम्बन्ध नहीं है। ये बस मेरे विचारों का नाट्य रूपांतरण है।

तो बात उस समय की है, जब ब्रह्मा जी ने प्रकृति के विकास और संतुलन के लिए मानव की रचना की। पुरुष और स्त्री को बनाया और उनको कहा कि आपसी सामंजस्य से जीवनयापन करें। तो पुरुष और स्त्री ने संवाद शरू किया ---

पुरुष - हे देवी! मैं पुरुष अपने पौरुष, अर्थात परिश्रम और योजना से, आपके लिए प्रकृति प्रदत्त समस्त संसाधनों से धरती पर रहने और जीवनयापन करने की उत्तम से उत्तम व्यवस्था करूँगा।

स्त्री - हे देव! मैं भी वचन देती हूँ कि मैं भी अपने स्त्री धर्म का पालन करते हुए उस स्थान को अपनी रचनात्मकता और आयोजन क्षमता से स्वर्ग सा विकसित करुँगी और आपके साथ धर्मपूर्वक जीवनयापन करुँगी।

पुरुष - हे देवी! मैं आपको प्रसन्न करते हुए, आपकी सहमति से, आपके साथ योग द्वारा अपनी ऊर्जा को आपमें स्थापित करूँगा।

स्त्री - देव! प्रेम से परिपूर्ण हो मैं भी उस ऊर्जा को धारण कर, अपनी ऊर्जा का उसमें समावेश कर, ब्रह्मा द्वारा रचित प्रकृति के विकास में अपनी भूमिका निभाऊंगी।

पुरुष - हे देवी! मैं आपको वचन देता हूँ कि धरती पर मैं आपके और आपके द्वारा उत्पन्न मेरी संतानों के भरण-पोषण की समस्त व्यवस्था करूँगा।

स्त्री - हे देव! मैं भी आपको वचन देती हूँ कि आपके द्वारा परिश्रम से संग्रहित वस्तुओं से मैं स्वयं संतुष्ट होऊंगी और आपको और आपके द्वारा उत्पन्न मेरी संतानों को भी संतुष्ट रखूंगी।

पुरुष - हे देवी! मैं आपको और हमारी आने वाली संतानों को पूर्ण सुरक्षा का वचन देता हूँ। मैं आप सभी की सुरक्षा के लिए दैवीय, शारीरिक और प्राकृतिक बाधाओं से बिना डरे युद्ध करूँगा और उनसे सुरक्षा हेतु योजना बनाऊँगा।

स्त्री - देव! मैं1