Janak Ki Vyatha... (Hindi)

ये धरती पुरुषविहीन हुई, हे जानकी!
क्या रहना पड़ेगा जनक के घर में तुम्हें सदा?
कभी सोचा न था,
मेरी प्रतिज्ञा ही बाधक बनेगी,
तेरे कन्यादान में, मेरी प्रिये!

हे सीते! देखी है तुझमें दुर्गा की मूरत मैंने,
कैसे दे दूँ किसी कायर के हाथ में तुझको।
जिस धनुष को एक हाथ में उठा,
बचपन से तरुणाई तक खेली है तू तेरी सखियों संग,
उसी धनुष को हिलाने मात्र में भी असमर्थ है आज ये नृपजन।

हे वैदेही! देखी है तुझमें लक्ष्मी सी चपलता सदा,
कैसे दे दूँ किसी पुरुष-पुरातन के हाथों में तुझको।
आये हैं नरेश विश्व के हर छोर से,
किन्तु पाना चाहते हैं सब तुझे हाथों के ज़ोर से।

वो पुरुष ही क्या जो दुर्बल को दबाये,
बलशाली तो हिंसक पशु भी होते हैं।
वो बुद्धि ही क्या जो दूसरों को सताये,
अविवेकी पूत पर तो सदा ही कुल रोते हैं।

हे पुत्री! तू माँ गौरी सी सीधी,
कैसे सौंपूं तुझे किसी बली-हठी को,
जो तेरे इस स्त्री रूप से परे धवल मन को,
न देखना चाहता है और न सुनना।

हे विशालाक्षी! सरस्वती सी तेज है तेरी बुद्धि,
कैसे; कैसे दे दूँ तुझे किसी ऐसे दुर्बुद्धि को,
जो उसके उपयोग के स्थान पर, उसे दबाये,
स्वयं अहंकार के मद में।

इसीलिए हे जानकी! धनुष विखंडन की ये शर्त रखी थी मैंने,
बिना विवेक, सदविचार और आशीष के, केवल बाहुबल से,
इस धनुष को हिलाना भी असंभव है जानकी।
किन्तु ये न पता था कि अब पुरुष रहे ही नहीं इस धरा पर।

जिस धरती ने तुझ जैसी सुशील कन्या को जना,
उसकी गोद में एक भी सुकुमार न हुआ...
हे सुहासिनी! तो क्या जीवन भर अब हंसी भूलकर,
संभालनी पड़ेगी सत्ता तुझे?
नहीं-नहीं मैं इतना निष्ठुर पिता नहीं,
जो छीन ले तेरी खुशियां तुझसे।

हे कान्ता! छोड़ दे तू मेरे प्रण को...
जिसे वरना चाहे वर1