Dar Lagta hai (Hindi)

डर लगता है उस घूरते हुए चेहरे से,
कभी मेरे हँसने पर तो कभी उदास होने पर,
कभी मेरे गाने पर तो कभी बाहर जाने पर,
वो चेहरा मुझे घूरता रहता है,
न जाने क्यूँ वो हँसता नहीं,
मुझसा है, पर मुझसा नहीं,
वो जब चाहे, जहाँ चाहे मुझे घूरता है,
और कल जब उसे हँसते देखा,
तो उस भद्दी हँसी में उसका काला चेहरा
और भी डराने लगा,
डर लगता है उस घूरते हुए चेहरे से,
तो कल मैंने उसे घूर लिया,
तो मेरे इस साहस को दबाने के लिए
वो बोला,
मैं तुम्हें डराना नहीं, बचाना चाहता हूँ,
तुम्हारे कोमल मन को कोई ठेस न लगे,
ये ही कार्य है मेरा,
मैंने माना और मुँह फ़ेर लिया,
पर फिर सोचने लगी...
ये वही घूरने वाला चेहरा तो है,
जो हर बार अलग-अलग तरीके से,
ठेस लगाता है मेरे कोमल मन को,
हाँ, बहुत डर लगता है,
उस घूरते हुए चेहरे से,
जो हर घड़ी मेरा पीछा भी करता है
और मेरा इंतज़ार भी।



Shikaar... (Hindi)

जो शिकार होता है, वो ‘शिकार’ होता है,
क्यूँकि वो कमज़ोर है...

उसमें नहीं है ताक़त अपने आप से लड़ने की,
उसमें नहीं है ताक़त डर को पीछे छोड़ आगे बढ़ने की,
उसमें नहीं है ताक़त सच को स्वीकार करने की,
उसमें नहीं है ताक़त स्वयं को नियंत्रित रखने की,

पर जाने क्यूँ दुनिया,
उम्मीद करती है उससे ताक़त की,
जाने क्यूँ सोचती है कि वो होते तो ऐसा करते,
वो होते तो वैसा करते,

अरे वो होते ही नहीं ना...
क्यूँकि जो शिकार होता है,
वो ‘शिकार’ होता है,
क्यूँकि वो कमज़ोर है...

और ‘दुनिया’ में तो बहुत ताक़त है,
‘दुनिया’ ना तो तनहा है
और ना ही कमज़ोर...
और ‘दुनिया’ के पास ज़ुबान भी है,
इसीलिए तो वो ‘शिकार’ नहीं है,

पर जब वो अपने डर को पीछे छोड़
अपनी क्षमताओं से भी आगे बढ़ जाता है...
एक छोटा मेमना शेर से लड़ जाता है...
या सहमने की जगह भीड़ में चढ़ जाता है...

तो छीन लाता है वो एक ज़िंदगी और एक ख़ुशी,
एक नई सोच और एक नया तज़ुरबा...
जो बनाते हैं उसे भीड़ से अलग एक मिसाल,
नहीं करती दुनिया उससे फिर कोई सवाल,

और वो नहीं रह जाता ‘शिकार’|



Maine Chod Diya... (I left...) (Hindi)

मैंने छोड़ दिया पतंगों को लपकना,
कि चंद लड़के पतंगों से ज्यादा मेरी छलांगों को देखने लगे थे,
मैंने छोड़ दिया खुलकर खिलखिलाना,
कि चंद होठ उसे देख अजीब सी शक्लें बनाने लगे थे,
मैंने छोड़ दिया छत पर गाने गुनगुनाना,
कि पड़ोस के लड़के बिन चाहे करने लगे थे तारीफ़ उसकी,
मैंने छोड़ दिया नज़रें मिलाना,
कि समझना ही नहीं चाहती थी मैं उनकी नापाक शक्लें,
मैंने छोड़ दिया बिना चुन्नी के सड़क पर जाना,
कि चंद घूरती निगाहें अजीब लगती थीं मुझको।

क्यों कल तक जो कर कर ख़ुशी मिलती थी मुझे,
आज वो हरकतें करते हुए, मैं देखती हूँ चारों तरफ,
क्यों आज अपनी खुशी से पहले डर जाती हूँ,
कि कोई आँखें देख न लें मुझे यूँ खुशियाँ मनाते,
पता नहीं वो कौनसा अनजाना साया डराता है,
वो कौन है जिससे छुपती फिर रही हूँ मैं,
चंद अखबार की ख़बरें हैं या परिवार की नसीहतें,
जो डरा देती हैं मुझे रोज़ाना,
वो जो भी हैं... पर अब इतना तो मैं समझती हूँ,
कि मेरा अपना देश मेरे लिए सुरक्षित नहीं है।

यहाँ न्याय की देवी के घर में अंधेर भले ही न हो,
पर देर अवश्य है...
गुनहगारों के मन में डर नहीं,
पर बच जाने का यकीन है।
नेता को नेतागिरी से और बलवान को दादागिरी से,
फ़ुरसत ही नहीं...
और सफेदपोशों के काले हाथ अंधों को दिखते ही नहीं।
वैसे किसी को यहाँ किसी दूसरे के फटे में हाथ नहीं देना,
लेकिन आँख, कान और मुँह वहीं घुसाए रखने हैं।
धृष्ट से लेकर भ्रष्ट तक सब मौसी के लड़के हैं,
और बिना अपने उल्लू को सीधा किये कोई लाचार का सगा नहीं है।

अपनी जाति को रोज़ अखबारों में लाचारी से मरते-घुटते देख,
तिल-तिल कर जो मैं मरती-डरती जाती हूँ,
ये जो हवा खराब हो गई है मेरे देश की,
उसमें जब मैं सांस1



Nazaren :: Eyes (Hindi)

एक नज़र कहती रुक जा,
एक नज़र कहती बढ़ जा,
हर एक नज़र से देख नज़ारे,
अब भूल रही अपनी नज़रें,
हैं इन नज़रों में ख्वाब कई,
कुछ रंग भरे मेरे मन के हैं,
फिर क्यूँ कहतीं ये नज़रें हैं,
तू भूल उन्हें, मत देख वहाँ।

क्यूँ मुझको जो मंज़िल लगती है,
उसे राह का पत्थर कहतीं नज़रें,
बूढ़ी नज़रें, अपनी नज़रें,
हैं रही डरा मेरी नज़रों से,
जो नज़र मेरी दे रही धोखा,
है सच वो नहीं जो मैंने देखा,
तो भी मैं रहूंगी साथ सदा,
मेरी नज़रों और नज़ारों के।

जो ये नज़रें नहीं होतीं तो,
कैसे दिखतीं बाकी नज़रें,
है नमी आज भी नज़रों में,
पर डर है नहीं किसी नज़रों से,
मेरे अपनों से मिली नज़र,
है नाज़ मुझे इन नज़रों पे,
देखने दो मुझे, अब मत रोको,
जो ख़्वाब बसे मेरी नज़रों में,
बस रखो यकीं मेरी नज़रों पर
ना झुकाऊँगी, ना झुकने दुँगी।

आपकी ही नज़र, है मेरे भीतर,
बतलाती सब सही गलत मुझे,
है मुझको बस उसपर ये यकीं,
लाएगी बचा वो हर मुश्किल से,
नज़र तो है वही मेरी भी,
बस नजरिया ज़रा थोड़ा बदला है,
मेरे नज़रिये से देखो जरा,
क्यों नज़र नज़र में हैं फर्क कई।

तेरी नज़रें, मेरी नज़रें,
करती रहतीं हैं बात कई,
पर मेरे ख्वाबों से कटती हैं,
नज़रों-नज़रों में रात कई,
इसीलिए आगे अब मैं हूँ बढ़ती,
ले साथ लिए सबकी नज़रें,
पर नज़रिया आज भी हूँ रखती,
मेरे ख्वाबों का, मेरे नजारों का…

There are a lot of issues Today's Woman is facing and I want to share her voice with you guys... Kindly read it.

Human eye speaks a lot and reads a lot. Sometimes it shows happiness, sometimes anger and sometimes grievances... It judges situation and other person. In India, girls are still in a misery and restricted condition. They do not have1